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गीतांजलि की ‘रेत समाधि’ ने एशियाई भाषाओं के लिए राह बनाई

‘रेत समाधि’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है जिसके अंग्रेजी अनुवाद को पिछले दिनों इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया था.

‘रेत समाधि’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है जिसके अंग्रेजी अनुवाद को पिछले दिनों इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया था.

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'रेत समाधि' का अंग्रेजी अनुवाद 'टॉम्ब ऑफ़ सैंड' शीर्षक से डेजी रॉकवेल ने किया है. इस अनुवाद को ही इस वर्ष के इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया है.

नई दिल्ली- वरिष्ठ लेखक गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ ने इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराकर पूरी दुनिया का ध्यान हिंदी साहित्य की तरफ आकर्षित किया है. यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसने वैश्विक स्तर पर हिंदी और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया है. ये बातें निकलकर आईं राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित ‘रेत समाधि : कृति उत्सव’ में जिसमें अशोक वाजपेयी, हरीश त्रिवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, वीरेन्द्र यादव और वंदना राग जैसे नामचीन लेखकों ने अपने विचार रखे. वरिष्ठ लेखक सईदा हमीद ने ‘रेत समाधि’ के एक खास अंश का पाठ किया.

‘रेत समाधि’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है जिसके अंग्रेजी अनुवाद को पिछले दिनों इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया था. हिंदी की यह पहली किताब है जो इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की सूची में शामिल की गई है. इस ऐतिहासिक उपलब्धि के उपलक्ष्य में राजकमल प्रकाशन ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के रोज गार्डन में एक समारोह का आयोजन किया जिसमें अनेक गणमान्य साहित्यकार और साहित्यप्रेमी शामिल हुए.

इस अवसर पर कथाकार वंदना राग ने कहा कि ‘रेत समाधि’ का ऐश्वर्य चंद बातों में नहीं समा सकता है. यह एक सियासी उपन्यास भी है हम इसे यूं ही ख़ारिज नही कर सकते कि यह रिश्तों की बात करता है. इस उपन्यास में सियासत पर टीका-टिप्पणी भी सहजता से होती है.

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वरिष्ठ लेखक हरीश त्रिवेदी ने कहा कि ‘रेत समाधि’ का बुकर पुरस्कार की लॉन्ग लिस्ट में शामिल होना एक अभूतपूर्व घटना है, यह एक नए जमाने की आहट है यह किताब जब 2018 में प्रकाशित हो कर आई तो लोग इसे देख कर अचम्भित हुए और इस उपन्यास का नाम तभी से लोगों की जुबां पर था.

आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि बुकर पुरस्कार ने अपनी सूची में किसी कृति को शामिल करने के लिए कई सरहदें बना रखी थीं. इन सरहदों को गीतांजलि श्री न केवल तोड़ा है बल्कि उन सरहदों को पार भी किया है. इस उपलब्धि ने वैश्विक स्तर पर हिंदी और अन्य दक्षिणी एशियाई भाषाओं के लिए मार्ग खोल दिए हैं.

वरिष्ठ लेखक पुरुषोतम अग्रवाल ने गीतांजलि श्री को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह गाथा हमारी संवेदना को समृद्ध करती है और दूसरी तरफ हमने जो पढ़ने की तरकीबें सीखी हैं और जो हमने भुला दी हैं उनको याद दिलाने की कोशिश करती है.

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वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि गीतांजलि ने यथार्थ की आम धारणाओं को ध्वस्त किया है और एक अनूठा यथार्थ रचा है और हमारे आस-पास के यथार्थ से मिलता जुलता है और उसके सरहदों के पार भी जाता है.

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राजकमल प्रकशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि बुकर लॉन्ग लिस्ट में आकर रेत समाधि ने दुनिया की सभी भाषाओं के सचेत पाठकों, लेखकों और प्रकाशकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. हिंदी में हाल के बरसों में किसी बड़ी रचना की जो प्रतिक्षा थी उसको रेत समाधि ने समाप्त किया है.

‘रेत समाधि’ की अंगेजी अनुवादक डेजी रॉकवेल ने इस अवसर पर भेजे अपने सन्देश में कहा कि यह एक शानदार वाइन की तरह, एक प्रतिभाशाली कृति की प्रतिभा की पहचान कभी–कभी देर से आती है. ‘रेत समाधि’ एक जटिल और समृद्ध उपन्यास है जिसे बार-बार पढ़ने पर भी आश्चर्य और रोमांच गहराता है.

रेत समाधि की फ्रेंच अनुवादक एनी मोताड ने अपने ऑडियो सन्देश में कहा कि ‘रेत समाधि’ की कहानी की गति एक और रहस्य है, कभी रुक जाती है पचास पृष्ठों तक, कभी अचानक बहुत तेज़ हो जाती है. कभी शांति नदी के तरह रहती है, कभी हांफती है, कभी बहुत लम्बे वंशों के साथ तो कभी बहुत छोटे. जिस तरह ये कहा जाता है कि महाभारत में सबकुछ मिलता है उसी ही तरह ये कहा जा सकता है कि सारा हिंदुस्तान रेत समाधि में निहित है.

बता दें इंटरनेशनल बुकर प्राइज अंग्रेजी में अनूदित और ब्रिटेन या आयरलैंड में प्रकाशित किसी पुस्तक को प्रति वर्ष दिया जाता है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘रेत समाधि’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘टॉम्ब ऑफ़ सैंड’ शीर्षक से डेजी रॉकवेल ने किया है. इस अनुवाद को ही इस वर्ष के इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में शामिल किया गया है.

किताब और लेखक के बारे में
‘रेत समाधि’ शीर्षक से लिखे गए इस मूल हिंदी उपन्यास का डेजी रॉकवैल ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है. यह एक 80 वर्षीय महिला की कहानी है जो अपने पति की मृत्यु के बाद बेहद उदास रहती है. आखिरकार, वह अपने अवसाद पर काबू पाती है और विभाजन के दौरान पीछे छूट गए अतीत की कड़ियों को जोड़ने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला करती है.

लेखक के बारे में
लेखक गीतांजलि श्री का जन्म 12 जून, 1957 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में हुई. बाद में उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया.

गीतांजलि श्री के उपन्यास—‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’, ‘रेत-समाधि’; और चार कहानी-संग्रह ‘अनुगूँज’, ‘वैराग्य’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘यहाँ हाथी रहते थे’ प्रकाशित हो चुके हैं. इनकी रचनाओं के अनुवाद भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में हुए हैं. गीतांजलि थियेटर के लिए भी लिखती हैं.

Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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