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प्रेमचंद की कहानी 'अलग्योझा', जहां जाड़े के मौसम में चल रही है लू, बगीचे में गिर रहे हैं आम

प्रेमचंद की कहानी 'अलग्योझा' पर एक चर्चा.

प्रेमचंद की कहानी 'अलग्योझा' पर एक चर्चा.

अपने दौर के लेखकों में प्रेमचंद ही वह कथाकार थे, जिन्होंने दबे-कुचले और हाशिये पर पड़े समाज के अस्तित्व के लिए अपनी कहानियों से बहस पैदा की. उन्हें समाज की मुख्यधारा का अनिवार्य हिस्सा बताया. बहरहाल, आज प्रेमचंद की कहानी 'अलग्योझा' पर एक चर्चा -

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प्रेमचंद के शुरुआती लेखन के बारे में बताया जाता है कि वह आदर्शोन्मुख यथार्थवादी था. उनकी कहानियों से गुजरते हुए यह बात साफ तौर पर नजर आती है. उनकी हर कहानी अपने समय के यथार्थ की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन साथ ही उनमें एक आदर्शवाद की भी स्थापना है. इस लिहाज से कहें तो प्रेमचंद की कहानियों में खुशहाल आदर्शवादी समाज की प्रस्तावना मिलती है, यानी बेहतर भविष्य को लेकर एक सुझाव भी. इसी दृष्टि से इनकी कहानियों को ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ के निकष पर नहीं देख पाता. नहीं देख पाने की एक वजह तो यही है कि साहित्य को समाज का दर्पण मानना मुझे साहित्य की प्रकृति के अनुरूप नहीं लगता. मुझे लगता है कि दर्पण किसी भी चीज का उल्टा प्रतिबिंब दिखलाता है जबकि साहित्य अपने समय को रचता है, उसका प्रतिनिधित्व करता है. इस लिहाज से साहित्य को अगर हम इन्हीं प्रतीकों के जरिए बताना चाहें तो साहित्य को समाज का ‘प्रतिबिंब’ कहना ज्यादा बेहतर होगा. इस क्रम में हम चाहें तो वह तर्क भी याद कर सकते हैं कि कवि नकल की नकल करता है और उस तर्क को कथाकारों पर भी लागू कर कहा जा सकता है कि कथाकार नकल की नकल करता है. लेकिन इन तर्कों से अलग हट कर देखें तो मुझे लगता है कि साहित्य को समाज का न तो दर्पण होना चाहिए और न ही प्रतिबिंब, बल्कि उसे तो समाज का दूरबीन होना चाहिए. प्रेमचंद की कहानियां इस दूरबीन का काम करने की कोशिश करती हैं. यह बहस का विषय हो सकता है कि इस दूरबीन से जो रास्ते, नदी, नाले, पहाड़ और झरने हमें दिख रहे हैं, वह हमारी पसंद हैं या नहीं.

प्रेमचंद की कहानियों से गुजरते हुए ऐसे कई शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्ति आपको मिल जाएंगे, जिसकी आज आलोचना की जा सकती है. आप यह नजरअंदाज करते हुए कि आज ओटीटी प्लेटफॉर्म से लेकर साहित्य रचना तक में गालियों की भरमार है और जिन्हें आप बहुत चाव से सपरिवार पढ़ते, देखते और सुनते हैं, प्रेमचंद की कहानियों में आए जातिसूचक शब्दों और टिप्पणियों के लिए उनकी भरपूर आलोचना कर सकते हैं. आप कह सकते हैं कि प्रेमचंद की कहानियों में एक तरह की भाषाई हिंसा है और इसके लिए प्रेमचंद के साहित्य से ऐसे तमाम उद्धरण निकाल सकते हैं. लेकिन इन सब के बावजूद प्रेमचंद का कद छोटा नहीं हो जाता. जिस तरह आज की फिल्म और साहित्य में आई हिंसक स्थितियों और अश्लील संवादों को हम यथास्थिति चित्रण बोल कर स्वीकार लेते हैं, तो प्रेमचंद की कहानियों में यथास्थिति चित्रण को क्यों भूल जाते हैं. तब के समाज और तब की भाषा को हम आज की स्थितियों-परिस्थितियों के मुकाबले क्यों खड़ा करने लग जाते हैं? आपको ध्यान होगा कि तकरीबन दस बरस पहले एक राजनीतिक पार्टी ने प्रेमचंद के साहित्य को दलित विरोधी बताते हुए उसका विरोध किया था. विरोध करने वाली राजनीति को यह बात समझ में नहीं आई कि अपने दौर के लेखकों में प्रेमचंद ही वह कथाकार थे, जिन्होंने दबे-कुचले और हाशिये पर पड़े समाज के अस्तित्व के लिए अपनी कहानियों से बहस पैदा की. उन्हें समाज की मुख्यधारा का अनिवार्य हिस्सा बताया. बहरहाल, प्रेमचंद की कहानियों की सामाजिक भूमिका की चर्चा इस टिप्पणी का मकसद नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि लेखक चाहे जितना सधा हुआ हो उससे भी चूक हो सकती है. इसी क्रम में आज प्रेमचंद की कहानी ‘अलग्योझा’ पर एक चर्चा –

‘अलग्योझा’ कहानी में 10 साल के बच्चे रग्घू की मां की मौत के बाद उसके पिता भोला महतो दूसरी शादी कर लेते हैं. नई मां पन्ना रूपवती है. लेकिन रग्घू को अब घर के सारे काम करने पड़ते हैं और पिता भोला अपनी रूपवती पत्नी पन्ना की बातों पर ही भरोसा करते हैं. रग्घू जब 18 साल का हुआ, तो उसके पिता का निधन हो गया. यानी भोला महतो की मौत शादी के 8 साल बाद हो गई. इस बीच पन्ना 4 बच्चों की मां बनी. प्रेमचंद की इस कहानी में उम्र का हिसाब-किताब रखते हुए यह बात सामने आती है कि जब भोला महतो की मौत हुई तो दूसरी पत्नी से पैदा हुए उसके सबसे बड़े बेटे केदार की उम्र अधिकतम 7 साल रही होगी और सबसे छोटी संतान की उम्र अधिकतम 4 बरस. इस कहानी में रग्घू का चरित्र बेहद उदार शख्स का है. वह अपने पिता भोला महतो की मृत्यु के बाद घर का सारा बोझ उठा लेता है. अपने चारों छोटे भाई-बहनों का ख्याल रखता है. खेती बारी संभालता है. इस तरह 5 वर्ष और बीत जाते हैं. रग्घू अब 23 वर्ष का हो चुका है, जाहिर है इस लिहाज से केदार की उम्र 12 वर्ष हुई होगी.

23 वर्ष के रग्घू से पन्ना जिद करती है बहू को घर ले आने की. पर रग्घू इसके लिए राजी नहीं. उसका कहना है कि उसने अपनी पत्नी के बारे में पता कर लिया है. उसका व्यवहार कुछ ठीक नहीं. ऐसा न हो कि उसके आने से घर में फूट पड़ जाए. पर पन्ना अपनी जिद पर अड़ी है. वह रग्घू से कहकर उसकी पत्नी मुलिया को लिवा लाई.

मुलिया और पन्ना के बीच चल रही खटपट के बीच प्रेमचंद बतलाते हैं कि केदार 14 वर्ष का हो चुका है. इस लिहाज से देखें तो रग्घू 25 वर्ष का हो चुका है. इसी समय की बात है कि पन्ना दिनभर खेत में काम करके लौटी है और घर आने पर देखती है कि खाना नहीं बना है. मुलिया ने खाना बना कर नहीं रखा इस बात से पन्ना आहत होती है. वह महसूस करती है कि मुलिया किसी भी हाल में घर का सुख-चैन कायम रखने में सहयोग नहीं करना चाहती. वह घर और बाहर के काम में हाथ बंटाने को राजी नहीं. यही बात पन्ना का बड़ा बेटा केदार भी महसूस करता है. यह घटना सितंबर-अक्टूबर महीने की रही होगी. क्योंकि इसके तुरंत बाद प्रेमचंद बताते हैं कि गांव के पास के पुरवे में दशहरे का मेला लगा है. बच्चे मेला घूमने जाना चाहते हैं. वे मेला जाने को तैयार हैं और पन्ना भी तैयार है पर पन्ना के पास पैसे नहीं हैं. दरअसल, मुलिया के साथ पन्ना कोई खटपट नहीं चाहती इसलिए उसने घर की चाबी मुलिया के हवाले कर दी थी. सारा पैसा और हिसाब-किताब मुलिया के पास ही रहता था. पन्ना केवल घर और खेत में रग्घू का सहयोग करती थी. रग्घू ने पन्ना और बच्चों को देने के लिए मुलिया से पैसे मांगे. पर मुलिया ने देने से इनकार कर दिया. तब रग्घू ने चाबी उठाई और संदूक खोलकर पैसे निकाल लिए और मुलिया के तमाम विरोध को दरकिनार कर बच्चों को मेला घूमने जाने के लिए पैसे दे दिए.

इस घटना पर बात इतनी बढ़ी कि उस रोज कोई मेला घूमने नहीं गया. बल्कि दो दिन तक घर में खाना नहीं बना. किसी तरह बच्चों का पेट भरा गया और बड़े लोग भूखे अपने-अपने दुख और चिंता में डूबे रहे. आखिरकार, दो दिन में परिवार बंट गए. एक ही घर में दो चूल्हे जले. मुलिया के मन में शांति आई, पन्ना और रग्घू बेचैन रहे.

इस प्रसंग की चर्चा करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं – ‘…मुलिया पानी लेकर गई, खाना बनाया और रग्घू से बोली— जाओ, न्हा आओ, रोटी तैयार है।
रग्घू ने मानों सुना ही नहीं। सिर पर हाथ रखकर द्वार की तरफ ताकता रहा।
मुलिया— क्या कहती हूँ, कुछ सुनाई देता है, रोटी तैयार है, जाओ न्हा आओ।
रग्घू— सुन तो रहा हूँ, क्या बहरा हूँ? रोटी तैयार है तो जाकर खा ले। मुझे भूख नहीं है।
मुलिया ने फिर नहीं कहा। जाकर चूल्हा बुझा दिया, रोटियाँ उठाकर छींके पर रख दीं और मुँह ढाँककर लेट रही।
जरा देर में पन्ना आकर बोली— खाना तैयार है, न्हा-धोकर खा लो! बहू भी भूखी होगी।
रग्घू ने झुँझलाकर कहा— काकी तू घर में रहने देगी कि मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँ? खाना तो खाना ही है, आज न खाऊँगा, कल खाऊँगा, लेकिन अभी मुझसे न खाया जायगा। केदार क्या अभी मदरसे से नहीं आया?
पन्ना— अभी तो नहीं आया, आता ही होगा।
पन्ना समझ गई कि जब तक वह खाना बनाकर लड़कों को न खिलायेगी और ख़ुद न खायेगी रग्घू न खायेगा। इतना ही नहीं, उसे रग्घू से लड़ाई करनी पड़ेगी, उसे जली-कटी सुनानी पड़ेगी, उसे यह दिखाना पड़ेगा कि मैं ही उससे अलग होना चाहती हूँ, नहीं तो वह इसी चिन्ता में घुल-घुलकर प्राण दे देगा। यह सोचकर उसने अलग चूल्हा जलाया और खाना बनाने लगी। इतने में केदार और खुन्नू मदरसे से आ गये। पन्ना ने कहा— आओ बेटा, खा लो, रोटी तैयार है।
केदार ने पूछा— भइया को भी बुला लूँ न?
पन्ना— तुम आकर खा लो। उनकी रोटी बहू ने अलग बनायी है।
खुन्नू— जाकर भइया से पूछ न आऊँ?
पन्ना— जब उनका जी चाहेगा, खायेंगे। तू बैठकर खा, तुझे इन बातों से क्या मतलब? जिसका जी चाहेगा खायेगा, जिसका जी न चाहेगा, न खायेगा। जब वह और उसकी बीवी अलग रहने पर तुले हैं, तो कौन मनाये?
केदार— तो क्यों अम्माजी, क्या हम अलग घर में रहेंगे?
पन्ना— उनका जी चाहे, एक घर में रहें, जी चाहे आँगन में दीवार डाल लें।
खुन्नू ने दरवाजे पर आकर झाँका, सामने फूस की झोपड़ी थी, वहीं खाट पर पड़ा रग्घू नारियल पी रहा था।
खुन्नू— भइया तो अभी नारियल लिये बैठे हैं।
पन्ना— जब जी चाहेगा, खायेंगे।
केदार— भइया ने भाभी को डाँटा नहीं?
मुलिया अपनी कोठरी में पड़ी सुन रही थी। बाहर आकर बोली— भइया ने तो नहीं डाँटा अब तुम आकर डाँटों।
केदार के चेहरे का रंग उड़ गया। फिर जबान न खोली। तीनों लड़कों ने खाना खाया और बाहर निकले। लू चलने लगी थी। आम के बाग में गाँव के लड़के-लड़कियाँ हवा से गिरे हुए आम चुन रहे थे। केदार ने कहा— आज हम भी आम चुनने चलें, खूब आम गिर रहे हैं।
खुन्नू— दादा जो बैठे हैं?
लछमन— मैं न जाऊँगा, दादा घुड़केंगे।
केदार— वह तो अब अलग हो गये।
लक्षमन— तो अब हमको कोई मारेगा, तब भी दादा न बोलेंगे?
केदार— वाह, तब क्यों न बोलेंगे?
रग्घू ने तीनों लड़कों को दरवाजे पर खड़े देखा, पर कुछ बोला नहीं। पहले तो वह घर के बाहर निकलते ही उन्हें डाँट बैठता था, पर आज वह मूर्ति के समान निश्चल बैठा रहा। अब लड़कों को कुछ साहस हुआ। कुछ दूर और आगे बढ़े। रग्घू अब भी न बोला, कैसे बोले? वह सोच रहा था, काकी ने लड़कों को खिला-पिला दिया, मुझसे पूछा तक नहीं। क्या उसकी आँखों पर भी परदा पड़ गया है; अगर मैंने लड़कों को पुकारा और वह न आयें तो? मैं उनको मार-पीट तो न सकूँगा। लू में सब मारे-मारे फिरेंगे। कहीं बीमार न पड़ जायँ। उसका दिल मसोसकर रह जाता था, लेकिन मुँह से कुछ कह न सकता था। लड़कों ने देखा कि यह बिलकुल नहीं बोलते, तो निर्भय होकर चल पड़े।
सहसा मुलिया ने आकर कहा— अब तो उठोगे कि अब भी नहीं? जिनके नाम पर फाका कर रहे हो, उन्होंने मजे से लड़कों को खिलाया और आप खाया, अब आराम से सो रही हैं। ‘मोर पिया बात न पूछें, मोर सुहागिन नाँव।’ एक बार भी तो मुँह से न फूटा कि चलो भइया, खा लो।
रग्घू को इस समय मर्मान्तक पीड़ा हो रही थी। मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया। दु:खित नेत्रों से देखकर बोला— तेरी जो मर्जी थी, वही तो हुआ। अब जा, ढोल बजा!
मुलिया— नहीं, तुम्हारे लिए थाली परोसे बैठी हैं।
रग्घू— मुझे चिढ़ा मत। तेरे पीछे मैं भी बदनाम हो रहा हूँ। जब तू किसी की होकर नहीं रहना चाहती, तो दूसरे को क्या गरज है, जो तेरी खुशामद करे? जाकर काकी से पूछ, लड़के आम चुनने गये हैं, उन्हें पकड़ लाऊँ?
मुलिया अँगूठा दिखाकर बोली— यह जाता है। तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो।
इतने में पन्ना भी भीतर से निकल आई। रग्घू ने पूछा— लड़के बगीचे में चले गये काकी, लू चल रही है।
पन्ना— अब उनका कौन पुछत्तर है? बगीचे में जायँ, पेड़ पर चढ़ें, पानी में डूबें। मैं अकेली क्या- क्या करुँ?
रग्घू— जाकर पकड़ लाऊँ?
पन्ना— जब तुम्हें अपने मन से नहीं जाना है, तो फिर मैं जाने को क्यों कहूँ? तुम्हें रोकना होता, तो रोक न देते? तुम्हारे सामने ही तो गये होंगे?
पन्ना की बात पूरी भी न हुई थी कि रग्घू ने नारियल कोने में रख दिया और बाग की तरफ चला।

रग्घू लड़कों को लेकर बाग से लौटा, तो देखा मुलिया अभी तक झोंपड़े में खड़ी है। बोला— तू जाकर खा क्यों नहीं लेती? मुझे तो इस बेला भूख नहीं है।
मुलिया ऐंठकर बोली— हाँ, भूख क्यों लगेगी! भाइयों ने खाया, वह तुम्हारे पेट में पहुँच ही गया होगा।
रग्घू ने दाँत पीसकर कहा— मुझे जला मत मुलिया, नहीं अच्छा न होगा। खाना कहीं भागा नहीं जाता। एक बेला न खाऊँगा, तो मर न जाऊँगा। क्या तू समझती है, घर में आज कोई छोटी बात हो गई है? तूने घर में चूल्हा नहीं जलाया, मेरे कलेजे में आग लगाई है। मुझे घमंड था कि और चाहे कुछ हो जाय, पर मेरे घर में फूट का रोग न आने पावेगा, पर तूने मेरा घमंड चूर कर दिया।…’

कहानी के इस पूरे प्रसंग को पढ़ने के बाद यह ध्यान जाता है कि बच्चों के आम के बगीचे में जाने की घटना परिवार के अलग होने के ठीक दो दिन बाद घटी है. परिवार अलग हुआ था दशहरा मेला घूमने जाने को लेकर हुए हंगामे के बाद. दशहरा सितंबर से नवंबर के महीने में आता है. इस वक्त ठंड का मौसम होता है. तो सवाल होता है कि ठंड के मौसम में आम कहां से बगीचे में गिरने लगे? लू कहां से चलने लगी? प्रेमचंद के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि यह चैती दशहरा था. फिर जेहन में यह भी आता है कि चैत की कड़कती गर्मी में मेले का आयोजन नहीं होता. फिर भी माना जा सकता है कि किसी गांव-शहर में चैत में भी मेले का आयोजन हुआ होगा. रग्घू ने कहानी के इस हिस्से से ठीक पहले मुलिया से पूछा है ‘अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गये?’ तेलहन की खेती अमूमन गर्मी में होती है और फसल पकते-कटते-बेचते जाड़े का मौसम आ जाता है. जाहिर है कि प्रेमचंद ने शारदीय नवरात्र की ही बात लिखी थी, पर अपने लिखे का खुद ही ध्यान नहीं रख पाए और जाड़े के मौसम में लू चलवा दी, ध्यान रहता उन्हें तो शीतलहर चलाते.

कहानी के आगे के हिस्से में प्रेमचंद एक बार समय बीतने की चर्चा करते हुए लिखते हैं ‘पाँच साल गुजर गये। रग्घू अब दो लड़कों का बाप था। आँगन में दीवार खिंच गई थी, खेतों में मेड़ें डाल दी गई थीं और बैल-बछिए बाँट लिये गये थे। केदार की उम्र अब सोलह साल की हो गई थी।…’ प्रेमचंद अपने पात्रों के उम्र का हिसाब-किताब रखने में यहां भी चूक गए. जब पांच साल पहले घर के चूल्हे अलग हुए, उस वक्त प्रेमचंद के मुताबिक, केदार की उम्र 14 साल थी. लेकिन कहानी के इस पड़ाव पर जब 5 साल बीत गए तो भी केदार की उम्र प्रेमचंद ने 16 बताई है. उम्र का यह जोड़-घटाव https://epustakalay.com पर मौजूद प्रेमचंद के मानसरोवर भाग 1 की पीडीएफ कॉपी से किया गया है. किताब की पीडीए कॉपी बताती है कि इसके मुद्रक श्रीपतराय, सरस्वती प्रेस, बनारस हैं और यह छठवाँ संस्करण 1947 में छपा था, जिसकी कीमत 3 रुपये थी. इंटरनेट पर मौजूद प्रेमचंद की कहानियों में इतनी अशुद्धियां और गैरजिम्मेदारी दिखती है कि उनपर भरोसा नहीं किया जा सकता. हालांकि इस सरकारी वेबसाइट पर अपलोड मानसरोवर भाग एक की कहानी ‘अलग्योझा’ के लगभग दो पन्ने लापता हैं.

लेकिन इस जोड़-घटाव, गुणा-भाग और मौसम का हाल बताने के बाद फिर वही शास्वत सवाल कि क्या इन कमियों से प्रेमचंद का कद छोटा हो जाता है? जवाब होगा नहीं, प्रेमचंद का कद छोटा नहीं होता. हिंदी साहित्य और भाषा की दुनिया में प्रेमचंद का योगदान इतना विशाल है कि ये चूकें मात्रा, बिंदी की एकाध चूक सरीखी हैं. तो सवाल हो सकता है कि फिर इन चूकों के दिखाने का मकसद क्या है? दरअसल, इस टिप्पणी का मकसद महज इतना है कि लिखते वक्त ऐसी चीजें कई बार छूट जाती हैं. हम अपने छोटेपन में इन चीजों का मजाक बनाते हैं, उपहास उड़ाते हैं. हमें यह समझने की जरूरत है कि प्रेमचंद सरीखे कालजयी रचनाकार की रचनाओं में जब ऐसी असावधानी दिख सकती है, तो हमें लिखते वक्त और सतर्क होने की जरूरत है. दूसरी बात ये कि इन असावधानियों से प्रेमचंद की कहानी के कथ्य पर कोई फर्क नहीं पड़ा. प्रेमचंद ‘अलग्योझा’ कहानी के जरिए जिस आदर्श की स्थापना करना चाहते थे, जो कथ्य उनका अभीष्ट था – वहां वे बिना लड़खड़ाए पहुंच गए. और सबसे बड़ी बात कि आज की तारीख में जिस आसान भाषा में हमसब लिखना चाहते हैं, जो सहज प्रवाह हम अपनी कहानियों में देखना चाहते हैं और जिन उपेक्षित लेकिन समाज के लिए सबसे जरूरी लोगों के पक्ष में हम खड़ा होना चाहते हैं, मनुष्यता की जिस ऊंचाई पर हम खुद को देखना चाहते हैं, इन तमाम चीजों की स्थापना प्रेमचंद ने अपने लेखन के जरिए की है. उनकी किस्सागोई की रोशनी में आज का साहित्य पल्लवित-पुष्पित होता दिखता है.

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