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शब्दानुरागी : चल संन्यासी शब्दकोश में, तेरी विद्या मेरा ज्ञान साथ-साथ खड़काएंगे

संन्यासी, सन्यासी और सन्न्यासी में सही वर्तनी क्या है, जानें इस कॉलम में.

संन्यासी, सन्यासी और सन्न्यासी में सही वर्तनी क्या है, जानें इस कॉलम में.

Correct Spelling in Hindi: आपने 'संन्यासी' शब्द के उच्चारण पर गौर किया है? एकबार मन ही मन इस शब्द का उच्चारण करके देखें ...अधिक पढ़ें

1975 में बनी फिल्म ‘संन्यासी’ आप में से कई लोगों ने देखी होगी और कई लोगों ने इस फिल्म की चर्चा सुनी होगी. लेकिन अनुमान है कि मनोज कुमार और हेमा मालिनी की जोड़ी वाली इस फिल्म का ‘चल संन्यासी मंदिर में…’ गीत जरूर सुना होगा. न सुना हो तो गूगल या यू-ट्यूब पर सर्च कर जरूर सुन लें. बड़ा प्यारा गीत है, फिल्मांकन भी बहुत प्यारी है. मुकेश और लता मंगेशकर के गाए इस गीत की शूटिंग मंदिर में हुई है.

इस गीत को सुनते हुए या इन पंक्तियों को पढ़ते हुए आपने ‘संन्यासी’ शब्द के उच्चारण पर गौर किया? एकबार मन ही मन इस शब्द का उच्चारण करके देखें. आप फ्लैट तरीके से ‘सन्यासी’ नहीं बोलते. बल्कि बोलते समय ऐसा अहसास होता है कि ‘स’ पर जोर लगा रहे हों. दरअसल, जब हम ‘संन्यासी’ बोलते हैं तो पहले हम ‘सन्न’ बोलते हैं, फिर ‘यासी’ का उच्चारण करते हैं, स-न्यासी नहीं बोलते. ‘स’ पर बिंदी वाले कुछ और शब्दों का उच्चारण करके देखें, मसलन – संशय, संदेह, संयोग, संभोग, संकीर्ण, संतप्त… अब फिर से ‘संन्यासी’ शब्द बोलकर देखें, आपको दोनों के उच्चारण में फर्क दिखेगा. संशय, संदेह, संयोग के तर्ज पर जब आप ‘संन्यासी’ बोलेंगे तो वह ‘संयासी’ हो जाएगा. ‘संन्यासी’ के दो ‘न्’ यानी एक ‘स’ पर नासिक्य के रूप में बिंदी (ं) और दूसरा ‘य’ से पहले आधा ‘न्’ का उच्चारण कठिन है. है न? इसीलिए शायद हम ‘सन्न्यासी’ उच्चारण करते हैं.

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वैसे यह जानना रोचक होगा कि कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय और मुकुंदीलाल श्रीवास्तव द्वारा संपादित ज्ञानमंडल का ‘बृहत् हिन्दी कोश’ ‘सन्न्यासी’ को शुद्ध बताता है. व्याकरण के एक जानकार ने बताया कि संस्कृत व्याकरण के मुताबिक अगर किसी शब्द में दो अर्द्ध अनुनासिक लगातार आ रहे हों, तो उसमें एक के लिए बिंदी और दूसरे के लिए अर्द्धवर्ण का इस्तेमाल व्याकरण सम्मत नहीं है. संस्कृत का व्याकरण कहता है कि दोनों नासिक्य को वर्ण रूप में ही लिखेंगे, मात्रा रूप में नहीं. इसी नियम के तहत ‘संबन्ध’ या ‘सम्बंध’ लिखना अशुद्ध है, इसे या तो ‘संबंध’ लिखेंगे या ‘सम्बन्ध’. इसी तरह ‘संन्यासी’ का शुद्ध रूप संस्कृत व्याकरण के मुताबिक ‘सन्न्यासी’ है ‘संन्यासी’ नहीं और ‘सन्यासी’ तो हरगिज नहीं. लेकिन मेरा मानना है ‘संन्यासी’ का यह रूप इतना अधिक प्रचलन में आ चुका है कि अब इसके लिए व्याकरण में संशोधन करके इस शब्द के इसी रूप को सही मान लिया जाना चाहिए.

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वैसे, प्रचलन के इस तर्क को मैं तब कमजोर पाता हूं जब अपने देश का राष्ट्रगान याद करता हूं. इसमें एक लाइन है ‘तव शुभ आशिष मांगे…’. गौर करें कि इस शब्द को गाते हुए आप उच्चारण भी ‘आशिष’ ही करते हैं, राष्ट्रगान में ‘आशिष’ ही लिखते हैं. मुमकिन है आप चकित रह जाएं यह जानकर कि कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय और मुकुंदीलाल श्रीवास्तव द्वारा संपादित ज्ञानमंडल का ‘बृहत् हिन्दी कोश’ शब्द ‘आशिष’ और ‘सन्न्यासी’ रूप को ही शुद्ध बताता है.

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वैसे, वक्त के साथ संन्यासियों का चरित्र बदलता दिख रहा है. अब विशद ज्ञानकोश समेटे या हिमालय की कंदराओं में तप करनेवाले संन्यासी विरले ही होंगे. तो अब जिस छद्म रूप को हमारा समाज संन्यासी के रूप में स्वीकार कर ले रहा है तो भाषा में ‘सन्न्यासी’ के बदले रूप ‘संन्यासी’ स्वीकार लेने में मुझे कोई हर्ज नजर नहीं आता.

Tags: Hindi, Hindi debate, Shabdanuragi

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