होम /न्यूज /साहित्य /हिंदी-मैथिली लेखिका विभा रानी 'लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान' से सम्मानित

हिंदी-मैथिली लेखिका विभा रानी 'लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान' से सम्मानित

'लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान' का आरम्भ लेखक श्रीधरम ने अपने माता-पिता महालक्ष्मी और हरिदास की स्मृति में किया है.

'लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान' का आरम्भ लेखक श्रीधरम ने अपने माता-पिता महालक्ष्मी और हरिदास की स्मृति में किया है.

‘कनियां एक घुंघरुआवाली’ पर बात करते हुए मैथिली के युवा रचनाकार और कार्यक्रम के संचालक शुभेंदु शेखर ने कहा कि यह उपन्यास ...अधिक पढ़ें

  • News18Hindi
  • Last Updated :

नई दिल्ली: हिंदी और मैथिली की चर्चित लेखिका तथा कलाकार विभा रानी को इस वर्ष के ‘लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान’ से सम्मानित किया गया है. नई दिल्ली के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम में विभा रानी के मैथिली उपन्यास ‘कनियां एक घुंघरुआवाली’ को यह सम्मान प्रदान किया गया. ‘कनियां एक घुंघरुआवाली’ (Kaniya ek ghunghruawali)का प्रकाशन अंतिका प्रकाशन ने किया है.

कार्यक्रम की शुरुआत हरिदास की चर्चित मैथिली आत्मकथा ‘जनम जुआ मति हारहु’ के एक अंश के पाठ से हुई. इस अंश का पाठ रंगकर्मी नीलेश दीपक ने किया. पठित अंश में कोसी की विभीषिका और विस्थापन की समस्या का वर्णन किया गया है. अंश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्य अतिथि ज्ञानतोष कुमार झा ने कहा कि ‘जनम जुआ मति हारहु’ मात्र एक आत्मकथा नहीं बल्कि यह एक टिप्पणी है समय और सामाजिक व्यवस्था पर. उन्होंने कहा कि एक समय था कि बाढ़ से गांव के गांव विस्थापित हो जाया करते थे. बाढ़ के बाद उत्पन्न हुई महामारी में गांव के गांव साफ हो जाया करते थे. इस विभीषिका का जीवंत दस्तावेज यह आत्मकथा है. उन्होंने कहा कि यह आत्मकथा दरअसल उसूलों के साथ संघर्ष करने की गाथा है. यह आत्मकथा मठों-जमींदारों के अत्याचार और राजशाही व्यवस्था की पोल खोलती है. साथ ही जातिवाद और संप्रदायवाद के विद्रूप चेहरे को सामने लाने में भी यह आत्मकथा कामयाब हुई है.

मैथिली और हिंदी के समालोचक देवशंकर नवीन ने कहा कि आदमी के जीवन में वैचारिकता की रक्षा करने का समय एकाध बार ही आता है. हरिदास की आत्मकथा पढ़ने से लगता है कि हरिदास का जीवन वैचारिकता की रक्षा करने में व्यतीत हुआ है. आत्मकथा को पढ़ने से पता चलता है कि कर्मयोग क्या है और कर्मयोग की तरफ कैसे जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि मैथिली में आत्मकथा का लेखन कम ही हुआ है. इस लिहाज से भी यह पुस्तक काफी महत्वपूर्ण है.

यह भी पढ़ें- लेखनी के सुख का खूबसूरत मायाजाल है अखिलेश का ‘अक्स’

पुरस्कृत उपन्यास ‘कनियां एक घुंघरुआवाली’ पर प्रकाश डालते हुए फिल्मकार अकबर रिजवी ने कहा कि जीवन जीने के दो तरीके होते हैं. एक तरीका तो यह है कि सीताराम-सीताराम कहिए और जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए. और दूसरा तरीका यह है कि राम जिस विधि से रखना चाहते हैं उस विधि से नहीं रहेंगे. लेकिन इस उपन्यास में जीवन को जीने की तीसरी विधि है, तीसरा नजरिया है. उपन्यास की नायिका उम्मीदों के सहारे जीवन जीती है. उन्होंने कहा कि यह कृति उपन्यास लेखन की परंपरागत शैली में तोड़फोड़ करने का काम करती है. ऐसी तोड़फोड़ हिंदी उपन्यासों में भी कम ही देखने को मिलती है. यह उपन्यास स्त्री विमर्श की नई जमीन तलाशने का प्रयास करता है और इस प्रयास में इसे सफलता भी मिलती है.

‘कनियां एक घुंघरुआवाली’ पर बात करते हुए मैथिली के युवा रचनाकार और कार्यक्रम के संचालक शुभेंदु शेखर ने कहा कि यह उपन्यास घाव पर मलहम लगाने का काम नहीं करता, बल्कि यह घाव पर टीनचर आयोडिन लगाने का काम करता है. मलहम तो सुखद अनभूति देता है लेकिन टीनचर आयोडिन तकलीफ देता है. स्त्री विमर्श पर जब भी कोई उपन्यास आता है तो पितृसत्तात्मक समाज को तकलीफ होती ही है. उपन्यास के केंद्र में पितृसत्ता है और यह पितृसत्ता धर्मसत्ता और राजसत्ता से भी खतरनाक होती है. क्योंकि धर्मसत्ता और राजसत्ता सबके सामने होती है और पितृसत्ता आपके परिवार में होती है. यह आपके भाई, पिता, दादा, नाना आदि के रूप में होती है. उपन्यास की नायिका तारा के संघर्ष और उसकी जीजीविषा को कुचलने का काम उसके परिवार के लोग ही करते हैं. उन्होंने कहा कि यह उपन्यास मैथिली में लिली रे की परंपरा को आगे ले जाने का काम करता है.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि मिथिला ही नहीं, बल्कि संपूर्ण बिहार में ऐसी आत्मकथा देखने को नहीं मिलती है. आमतौर पर आत्मकथा को पढ़ना एक बोरियत का काम होता है लेकिन इस आत्मकथा के साथ ऐसा नहीं है. इसे आप पढ़ना शुरू करेंगे तो पूरा खत्म करने के बाद ही दम लेंगे.

पुरस्कार प्राप्त करने के बाद लेखिका विभा रानी ने कहा कि लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान ने उन्हें मैथिली में उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने कहा कि मैथिली में उनका यह पहला उपन्यास है. इससे पहले उनका एक उपन्यास हिन्दी में प्रकाशित हो चुका है. उन्होंने कहा कि ‘जनम जुआ मति हारहु’ में स्त्री की जिस स्थिति का वर्णन किया गया है, वस्तुत: स्त्री की स्थिति समाज में आज भी वैसी ही है. और अगर हमने अपनी सोच नहीं बदली तो युगों-युगों तक ऐसी ही स्थिति रहेगी.

विभा रानी
मैथिली और हिंदी लेखन में सक्रिय विभा रानी (Vibha Rani Writer) का जन्म 1959 में हुआ. वर्तमान में वह मुंबई में रहती हैं. कहानी, नाटक और अनुवाद में उनकी विशिष्ट पहचान है. उनकी मैथिली में प्रकाशित प्रमुख कृति हैं- ‘खोह स’ निकसैत’, ‘रहथु साक्षी छठ घाट’ (कथा-संग्रह), ‘मदति करू माई’, ‘भाग रौ आ बालचन्दा’ (नाटक). हिंदी में उनकी रचनाएं ‘प्रेग्नेंट फादर’ (नाटक), ‘कांदुर कड़ाही’ (उपन्यास), ‘अजब शीला की गज़ब कहानी’ (कथा-संग्रह) साहित्यिक मंच पर चर्चित रहे हैं.

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें