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तेजेंद्र शर्मा ने 'टेम्स नदी के तट से' लिखा- 'ये कैसा पंजाब हैं लोग'

कवि तेजेंद्र शर्मा कहते हैं कि कविता को दिमाग से कहीं अधिक वे दिल के करीब मानते हैं.

कवि तेजेंद्र शर्मा कहते हैं कि कविता को दिमाग से कहीं अधिक वे दिल के करीब मानते हैं.

तेजेंद्र शर्मा चर्चित साहित्यकार हैं, भावुक और चिंतनशील कवि भी हैं. कहानीकार और संपादक तेजेंद्र शर्मा लंदन में रहते हैं ...अधिक पढ़ें

तेजेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘टेम्स नदी के तट से’ प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. चार खंडों में बंटे इस संग्रह में तेजेंद्र शर्मा ने विभिन्न विषयों पर अपनी कलम चलाई है. पुस्तक में एक जगह तेजेंद्र शर्मा अपने बारे में लिखते हैं- पेशे से ट्रेन ड्राइवर हूं. कभी-कभी तो शेर लिखने की इतनी तलब उठती है कि किसी स्टेशन पर यदि गाड़ी पांच मिनट के लिए भी रुकती है तो मैं रफ कागज पर अपने ख्याल उतार देता हूं. वह लिखते हैं- कविता एक बुखार की तरह उतरती है, उसे रोक पाना संभव नहीं है. प्रस्तुत हैं इस संग्रह की कुछ कविताएं-

ये कैसा पंजाब हैं लोग….

पढ़ने से जो समझ न आए
ऐसी बनी किताब हैं लोग।

इज्जत जिससे नहीं झलकती
अब ऐसा आदाब हैं लोग।

दूजे का नुकसान करे जो
ऐसा बने हिसाब हैं लोग।

बालों को बदरंगा जो कर दे
ऐसा बने खिजाब है लोग

चढ़े नशा न कभी भी जिसका
ऐसी बनी शराब हैं लोग।

कोई करे न किसी की चिंता
ऐसे हुए खराब हैं लोग।

ढोल बजे और पांव न थिरकें
ये कैसा पंजाब हैं लोग?

झोंपड़ियां अंधेरी क्यों हैं

तुम उजियाला पाकर देखो
सोच का दीप जलाकर देखो।

रोटी-दाल नहीं मिलती है
यह मसला सुलझाकर देखो।

छाना है तो मेरे मन पर
बदली जैसा छाकर देखो।

महल के बाहर भी दुनिया है
उससे बाहर आ कर देखो।

जीत तुम्हारी हो सकती है
हार का दर्द भुला कर देखो।

झोपड़ियां अंधेरी क्यों हैं
कभी वहां तुम जा कर देखो।

रिश्तों में घुस गया है पैसा
नाते कभी निभा कर देखो।

गम को अगर भुलाना है तो
गीत खुशी के गाकर देखो।

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मकड़ी बुन रही है जाल!

मकड़ी बुन रही है जाल

ऊपर से नीचे आता पानी
जूठा हुआ नीचे से
बकरी के बच्चे का
होगा अब बुरा हाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

विनाश के हथियार छुपे
होगा जनसंहार अब
बचेगा न तानाशाह
खींच लेंगे उसकी खाल
मकड़ी बुन रही जाल।

जमाने का मुंह चिढ़ाकर
अंगूठा सबको दिखाकर
तेल के कुओं की खातिर
बिछेंगे अब नरकंकाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

बादल गहरा गए हैं
चमकती हैं बिजलियां
तोप, टैंक, बम लिए
चल पड़ी सेना विशाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

मित्र साथ छोड़ रहे
भयभीत साथी हैं
गलियों पे सड़कों पे
दिखते जुल्म बेमिसाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

लाठी है मकड़ी की
भैंस कहां जाएगी
मदमस्त हाथी के
सामने खड़ा कंगाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

बच्चों की लाशें हैं
औरतों के शव पड़े हैं
बमों की है गड़गड़ाहट
आया जैसे भूचाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

संस्कृति लुट रही है
अस्मिता पिट रही है
मकड़ी को रोकने की
किसी में नहीं मजाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

मकड़ी के जाले को
तोड़ना जरूरी है
विश्व भर में दादागिरी
यही है बस उसकी चाल
मकड़ी बुन रही है जाल।

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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