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शादी के साइड इफेक्ट! हरजीत सिंह 'तुकतुक' लगा रहे हैं 'दूल्हों की सेल'

प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार अशोक चक्रधर ने हरजीत सिंह की तुकबंदी सुनकर उन्हें 'तुकतुक' नाम दिया.

प्रसिद्ध हास्य कवि और व्यंग्यकार अशोक चक्रधर ने हरजीत सिंह की तुकबंदी सुनकर उन्हें 'तुकतुक' नाम दिया.

हरजीत सिंह 'तुकतुक' हास्य और व्यंग्य की दुनिया में एक चर्चित नाम हैं. वे एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कवि, लेखक, कुशल वक्त ...अधिक पढ़ें

प्रलेक प्रकाशन से हरजीत सिंह ‘तुकतुक’ का एक हास्य कविता संग्रह ‘तुकतुक की रेल’ प्रकाशित हुआ है. यह संग्रह सात अध्यायों में बंटा हुआ है. इसका तीसरा अध्याय है- शादी के साइड इफेक्ट.

हरजीत सिंह ‘तुकतुक’ के शादी के साइड इफेक्ट में जहां ‘दूल्हों की सेल’ लगी है तो वहीं ‘लुगाई की खोज’ हो रही है. ‘लड़का या लड़की’, ‘मेरा भगत सिंह’ और ‘प्राइमरी की पढ़ाई’ ऐसे व्यंग्य हैं जो शादी बाद शुरू होने वाले जीवन चक्र का बड़ा ही सुंदर वर्णन करते हैं. तो तुकतुक की रेल में हंसी-ठिठोली का सफर करते हुए आप भी चलें दूल्हों की सेल में और जानें शादी के साइड इफेक्ट. इस साइड इफेक्ट के बारे में तुकतुक खुद लिखते हैं-

यह अध्याय हमारी शादी से शुरू होता है. इसमें हमारे वैवाहिक जीवन का वर्णन है और सारे साइट इफेक्ट्स का कच्चा चिट्ठा भी है. मजे की बात यह है कि ये सारी कविताएं हमने शादी से पहले ही लिख ली थीं.

हरजीत सिंह ‘तुकतुक’ लिखते हैं कि ‘दूल्हों की सेल’ वह पहली कविता है जो उन्होंने टेलीविजन पर पढ़ी थी. और कविता को टीवी पर सुनकर और हमें देखकर हमारी पत्नी ने हमें पसंद किया था.

दूल्हों की सेल

एक बार हमें शादी करने का ख्याल आया
हमने तुरन्त जाकर पिता जी को बताया।

पिता जी ने अगले दिन ही,
बिना दहेज के शादी के लिए,
अखबार में इश्तिहार छपवाया,
महीने भर तक घर पर कोई नहीं आया।

तब पिता जी ने अपनी समस्या,
एक प्रॉपर्टी डीलर को बताई।
उसने तुरन्त एक तरकीब सुझाई।

बोला, झुमरी तलैया में दूल्हों की सेल लगी है,
वहां लड़कियों की बहुत लम्बी लाईन लगी है।
आप तुरन्त वहां चले जाइये,
जैसी चाहें वधू पाइये।

पिता जी बोले,
पर मुझे दहेज नहीं लेना।
वो बोला, लड़की तुम रख लेना,
दहेज मुझे दे देना।

पिता जी को उसके बोल समझ में आ गये।
अगले दिन वो हमें ले के झुमरी तलैया आ गये।

हमने सेल को डिफरेन्ट काउंटरों में बंटा पाया,
दस परसेंट डिस्काउंट,
बीस परसेंट डिस्काउंट,
चालीस परसेंट डिस्काउंट,
अस्सी परसेंट डिस्काउंट।

पिता जी ने हमें सौ परसेंट डिस्काउंट वाले,
काउंटर पर लाकर बिठाया।
काउंटर क्लर्क बोला,
आपको क्या प्रोब्लम है फरमाईये।

पिता जी बोले,
हमें दहेज नहीं चाहिये।
वो बोला,
लड़के में खोट बताइये।

पिता जी ने प्रॉपर्टी डीलर से पूछा,
भई, लड़के में क्या खोट बताया जाये।
प्रॉपर्टी डीलर अंग्रेजी का विद्वान था,
बोला, लड़के को ओवरलोड बताया जाये।

काउंटर क्लर्क की समझ में,
ओवर लोड का मतलब नहीं आया।
उसने हमें अस्सी परसेंट डिस्काउंट
वाले काउंटर पर लाकर बिठाया।

थोड़ी ही देर में,
वहां एक चालीस वर्षीय बाला आई।
पिताजी को देख के हौले से मुस्काई।

फिर प्रॉपर्टी डीलर से बोली,
इनकी ऐज कितनी है,
जो आपके बराबर में खड़े हैं?

प्रॉपर्टी डीलर बोला,
माशा अल्लाह जवान हैं,
दिखते बड़े हैं।

वो बोली, तो फिर इनसे मेरी बात चलाइये,
जरा इनका रेट मुझे बताइये।
प्रॉपर्टी डीलर ने पिता जी से बात चलाई,
पिता जी ने उसे कर्री करके डांट पिलाई।

उसके बाद पिताजी हमें ले के भागे,
एक किस्सा देखा हमने थोड़ा आगे।

लड़के के पिता, लड़की के पिता का,
वाइवा ले रहे थे,
लड़की के पिता,
पसीने-पसीने हो रहे थे।

फिर जब सौदेबाजी की बात आई,
लड़के के पिता ने रेट लिस्ट दिखाई।

लड़की के पिता बोले,
आप रेट बहुत ज्यादा लगा रहे हैं।
वह बोले, क्या कहते हो,
अभी तो बीस परसेंट डिस्काउंट पर बता रहे हैं।

लड़की के पिता बोले,
पर आपका लड़का तो बहुत सीधा-सादा है।

जवाब मिला,
देखिये जी,
हमारी मशीन ने एक ही पीस बनाया है
इसीलिए ओवरऑल कोस्ट कुछ ज्यादा है।

इतना सुनते ही,
पिताजी को चेता आया।
उन्होंने हमें नो डिस्काउंट वाले,
काउंटर पर लाकर बिठाया।

थोड़ी ही देर में, हमारे भाग जागे,
एक सज्जन आये भागे भागे।
उन्होंने हमारे चारों ओर एक चक्कर लगाया,
फिर पिताजी की ओर फेस घुमाया।

बोले,
कितना चलेगा?

पिताजी बोले,
ये तो आपकी बेटी पर डिपेंड करेगा।
किफायत से चलायेगी
तो सालों-साल चलेगा।

वो बोले,
आपके लड़के में ऐसी क्या खासियत है,
जो रेट इतना ज्यादा बता रहे हैं,
ऊपर से नो डिस्काउंट का बोर्ड लगा रहे हैं।

पिताजी बोले, मेरा लड़का ईमान रखता है,
जो आजकल करोड़ों में बिकता है।

वो बोले, पर आपका यह ईमानदार बेटा,
घर की रोटी कैसे चलायेगा,
खुद भूखा मरेगा तो,
मेरी बेटी को क्या खिलायेगा।

आप इसे यहां से ले जाइये,
पहले इसे किस्तों में ईमान बेचना सिखाइये।
जिस दिन इसे किस्तों में,
ईमान बेचना आ जायेगा,
उस दिन इसे इससे भी ज्यादा रेट पर,
कोई भी ले जायेगा।

पिताजी को उसके बोल समझ में आ गये,
अगले दिन वह हमें ले कर घर पर आ गये।

तब से हमारे पिताजी,
निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
हमें सिखाने हेतु,
अपना ईमान बेचने का प्रयास कर रहे हैं।

परंतु हमें नहीं लगता, कि वो दिन कभी आयेगा
कि उनका ईमान बिक पायेगा।
इसलिए यह तुकतुक,
कुंवारा पैदा हुआ है, कुंवारा ही मर जायेगा।

पुस्तक- तुकतुक की रेल
लेखक- हरजीत सिंह तुकतुक
प्रकाशक- प्रलेक प्रकाशन
मूल्य- 225 रुपये
(प्रकाशक से संपर्क- 70212-63557)

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