सरदार सरोवर बांध की डूब में फंसे राजघाट के 30 परिवार, कैसे होगी नैया पार ?
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सरदार सरोवर बांध की डूब में फंसे राजघाट के 30 परिवार, कैसे होगी नैया पार ?
चारों तरफ पानी से घिरा राजघाट डूब के कगार पर है

डूब प्रभावितों ने मध्य प्रदेश सरकार से लगातार मांग की है कि उन्हें गुजरात के बजाए मध्यप्रदेश में ही खेती के लिए जमीन व रहने के लिए प्लाट उपलब्ध कराया जाए

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  • Last Updated: September 11, 2019, 2:27 PM IST
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बड़वानी. सरदार सरोवर डैम (Sardar Sarovar Dam) के डूब क्षेत्र में आने वाले 30 परिवारों का एक छोटा सा गांव राजघाट जो अब टापू में तब्दील हो चुका है. इन विस्थापितों को सरकार ने गुजरात में जमीन दी है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वो जमीन न तो रहने लायक है और न ही खेती लायक. ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें मध्य प्रदेश में ही कहीं अन्यत्र बसने के लिए जमीन उपलब्ध कराई.

news18 की पड़ताल
प्रभावितों की समस्या जानने ग्राउंड जीरो पर पहुंची news18 की टीम के सामने डूब प्रभवितो ने अपने दर्द को बयां किया, अपना दर्द बयां करते समय डूब प्रभावितों की आंखों से बार-बार आंसू छलक जा रहे थे. प्रभावितों ने प्रशासन पर भी लापरवाही बरतने के आरोप लगाए. इस मामले में news18 कि टीम ने जब एसडीएम अभय सिंह ओहरिया से बात की तो उनका कहना है कि प्रशासन द्वारा समय रहते सभी परिवारों और उनके पशुधन को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाएगा.

सरदार सरोवर डैम का बैक वाटर जैसे-जैसे बढ़ रहा है वैसे- वैसे टापू में तब्दील हो चुके राजघाट गांव के ग्रामीणों कि बेचैनी बढ़ती जा रही है एक तरफ प्रशासन उन्हें सुरक्षित निकाल लेने का दावा कर रहा है वहीं ग्रामीणों में सरकार द्वारा खुद को छले जाने का आरोप है. नर्मदा के पानी के उफान के साथ ही ग्रामीणों कि आंखों से भी आंसुओं का सैलाब बह रहा है. वहीं प्रभावितों का कहना है कि जब तक उनकी मांगे पूरी नहीं होंगी तब तक वो राजघाट खाली नहीं करेंगे. वहीं गांव कि एक महिला ने प्रशासन और डूब को अपने पति की मौत का जिम्मेदार ठहराया.



चारों तरफ पानी का सैलाब


news18 टीम को चारों तरफ पानी का सैलाब नजर आया उनमें चारों तरफ से पानी में घिरा राजघाट, नर्मदा में डूबे पेड़, डूब प्रभवितों के आशियानों की ढही दीवारें और डूब प्रभवितों की आंखों से बहते आंसू हालांकि प्रशासन का दावा है कि सभी परिवारों और उनके मवेशियों को सुरक्षित स्थान पर समय से पहुंचा दिया जाएगा. ग्रामीणों का कहना है कि इस डूब में उनके सारे अरमान भी डूब चुके हैं और अब उनके डूबने कि बारी है उनका आक्रोश भी अब हताशा में बदल चुका है. प्रभावितों का कहना है कि उन्हें खेती की जमीन ओर रहने के लिए जो प्लाट गुजरात में दिया गया जब उन्होंने (डूब प्रभावितों ने) बारिश में वहां का हाल जाना तो मालूम पड़ा कि उन्हें वहां मिले प्लाट और खेती की जमीन हर साल ही डूब जाती है सिर्फ यही नहीं खेती के लिए उन्हें मिली जमीन भी खारी है जिसमें फसल तो दूर घास भी नहीं उगती ऐसे में आजीविका और आशियाना दोनों ही मिलने के बाद भी नहीं मिलने जैसा है.

प्रभावितों की ये है मांग ?
इन समस्याओं को लेकर डूब प्रभावितों ने मध्य प्रदेश सरकार से लगातार मांग की है कि उन्हें गुजरात के बजाए मध्यप्रदेश में ही खेती के लिए जमीन व रहने के लिए प्लाट उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि डूब तो उनके मकान को छू रही है. ऐसे मैं यहां अगर वो जगह खाली कर भी देंगे तो रहने के लिए कहां जाएंगे. गांव में सैकड़ों मवेशी हैं उनके चारे-पानी की भी परेशानी खड़ी हो गई है. छोटे-छोटे मासूम बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. news18 से बातचीत में एक स्कूली छात्र ने बताया कि वो लोग पिछले एक माह से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. उनका कहना है कि नाव में बैठकर इतने पानी में से गुजरने से डर लगता है.

वैशाली अपने पति की मौत का जिम्मेदार सरदार सरोवर बाँध की डूब और प्रशासन को मानती हैं


राजघाट की निवासी भावना सोलंकी ने बताया कि लगभग एक माह से गांव की बिजली भी काट दी गई है ऐसे में रात में जहरीले जानवरों सांप-बिच्छु का डर और मच्छरों के दंश झेलने को लोग मजबूर हैं. प्रशासन भी कोई सुनवाई नहीं कर रहा है. गांव की ही एक और महिला वैशाली ने अपने पति कि मौत के लिए भी इन्हीं वजहों को जिम्मेदार ठहराया.

डूब ने ले ली जान
आंखों में आंसू और माथे पर भविष्य कि चिंता लिए वैशाली बताती हैं कुछ दिनों पहले उनके पति बड़वानी आटा पिसाने गए थे क्योंकि पानी ने चारों तरफ से राजघाट को घेर रखा था जिसके कारण लाइट भी काट दी गई थी. इसलिए उन्हें बड़वानी जाना पड़ा लेकिन बड़वानी का पहुंच मार्ग भी पानी में डूबा था और संचार का एकमात्र सहारा नाव ही थी जिसके चलते वो छोटी सी नाव के सहारे आटा पिसाने गए थे लेकिन पानी के ऊपर से गुजर रहे बिजली के तारों में करंट दौड़ रहा था जिसकी चपेट में आकर उनके पति चिमन सोलंकी व एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई.

वैशाली के पति के मौत के मुआवजे के रूप में उन्हें 8 लाख रुपए तो मिल गए. लेकिन उसकी आंखों से बहते आंसू इस बात का सबूत है की 8 लाख उसके पति की कमी पूरी नहीं कर सकता और ना ही उसके दो मासूम बच्चों को यह पैसा पिता का प्यार दे पाएगा. एसडीएम अभय सिंह ओहरिया का कहना है कि समय रहते सभी ग्रामीणों और उनके मवेशियों को सुरक्षित निकाल लिया जायेगा लेकिन इनका भविष्य क्या होगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि सरकार कब इनकी सुध लेती है.

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