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MP का गांव बना पूरे देश के लिए मिसाल, 97 साल से इतनी है जनसंख्‍या

Rishu Naidu | News18 Madhya Pradesh
Updated: October 17, 2019, 2:53 PM IST
MP का गांव बना पूरे देश के लिए मिसाल, 97 साल से इतनी है जनसंख्‍या
1922 से लेकर अब तक 1700 से कम ही है जनसंख्‍या.

बढ़ती जनसंख्या (Population) दुनिया के समस्‍या बन चुकी है. जबकि सर्वाधिक जनसंख्या के मामले में भारत (India) दुनिया का दूसरा देश बना हुआ है. हालांकि मध्‍य प्रदेश के बैतूल जिले (Betul District) के धनोरा गांव में 1922 से अब तक यानी पूरे 97 सालों से जनसंख्या स्थिर बनी हुई है. यकीनन यह गांव परिवार नियोजन का ब्रांड एम्बेसडर है.

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बैतूल. पूरी दुनिया के सामने आज जनसंख्या (Population) विस्फोट की विकराल समस्या है और सर्वाधिक जनसंख्या के मामले में भारत (India) दुनिया का दूसरा देश बना हुआ है. हालांकि देश का एक ऐसा अनोखा गांव भी है जहां 1922 से अब तक यानी पूरे 97 सालों से जनसंख्या स्थिर बनी हुई है. मध्‍य प्रदेश के बैतूल जिले (Betul District) के धनोरा गांव (Dhanora Village) की जनसंख्या कभी नहीं बढ़ती, जिसकी मुख्य वजह है हर परिवार द्वारा देशहित में परिवार नियोजन (Family Planning) को अपनाया जाना. बेटों की चाहत रखने वालों के लिए भी ये गांव एक मिसाल है, क्योंकि यहां ऐसे काफी परिवार हैं जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद परिवार नियोजन अपना लिया. जबकि गांव के किसी भी परिवार में एक या दो से ज़्यादा बच्चे नहीं हैं.

ये है रोचक कहानी
हर गांव और हर शहर की अपनी खूबी होती है, लेकिन बैतूल जिले के आठनेर ब्लॉक का धनोरा गांव एक खास वजह से पूरे देश में विख्यात है और एक मिसाल भी है. इस गांव की जनसंख्या पिछले 97 सालों से स्थिर बनी हुई है. यानी इन सालों में गांव की जनसंख्या 1700 से आगे नहीं बढ़ी. ये कैसे हुआ इसकी भी एक रोचक कहानी है. सन 1922 में यहां कांग्रेस का एक सम्मेलन हुआ था जिनमें शामिल होने कस्तूरबा गांधी आई थीं. उन्होंने ग्रामीणों को खुशहाल जीवन के लिए छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा दिया था. कस्तूरबा गांधी की बात को ग्रामीणों ने पत्थर की लकीर माना और फिर गांव मे परिवार नियोजन का सिलसिला शुरू हो गया.

परिवार नियोजन की जागरूकता से बनी बात

सन 1922 के बाद गांव में परिवार नियोजन के लिए ग्रामीणों में जबरदस्त जागरूकता आई. लगभग हर परिवार ने एक या दो बच्चों पर परिवार नियोजन करवाया, जिससे धीरे-धीरे गांव की जनसंख्या स्थिर होने लगी. बेटों की चाहत में परिवार बढ़ने की कुरीति को भी यहां के लोगों ने खत्म कर दिया और एक या दो बेटियों के जन्म के बाद भी परिवार नियोजन को अपना लिया. जबकि गांव में कई ऐसे परिवार हैं जहां किसी की केवल एक या दो बेटियां हैं और वो बेहद खुश हैं और इसे देशहित में अपना योगदान समझते हैं.

बेटी-बेटा एक समान
बेटी हो या बेटा लेकिन दो बच्चों के बाद परिवार नियोजन को अपनाने से यहां लिंगानुपात भी बाकी जगहों से काफी बेहतर है.जबकि बेटी-बेटे में फर्क जैसी मानसिकता यहां देखने नहीं मिलती.
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बहरहाल, धनोरा के आसपास ऐसे भी कई गांव हैं जिनकी जनसंख्या 50 साल पहले यहां से आधी थी लेकिन अब वहां की जनसंख्या 4 से 5 गुना बढ़ चुकी है, लेकिन धनोरा गांव की जनसंख्या अब भी 1700 से कम बनी हुई है. गांव के स्वास्थ्य कार्यकर्ता जगदीश सिंह परिहार बताते हैं कि उन्हें कभी ग्रामीणों को परिवार नियोजन करने के लिए बाध्य नहीं करना पड़ा.

इस बात का है मलाल
यकीनन पूरे देश और दुनिया के सामने परिवार नियोजन की मिसाल बने चुके धनोरा गांव के लोगों को एक मलाल भी है. इस गांव को आज तक जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं मिला है. जबकि सरकार और जिला प्रशासन खुद इस गांव को देश के लिए एक प्रेरणा मानता है. सच कहा जाए तो ये गांव अपने आप में परिवार नियोजन का ब्रांड एम्बेसडर है.

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First published: October 17, 2019, 2:49 PM IST
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