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दो नाव के सहारे 6 गांव के लोगों की ज़िंदगी, बाढ़ और रात में यह रास्ता भी बंद

Rishu Naidu | News18 Madhya Pradesh
Updated: September 18, 2019, 9:22 AM IST
दो नाव के सहारे 6 गांव के लोगों की ज़िंदगी, बाढ़ और रात में यह रास्ता भी बंद
नाव पर अटकी छह गांवों के लोगों की ज़िंदगी.

राजडोह घाट (Rajdoh Ghat) पर कई बार छोटे-बड़े हादसे होना आम बात है. यहां के लोगों ने कई बार प्रशासन और सरकार से पुल बनाने की मांग की, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी.

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बैतूल. भोपाल के खटलापुरा और आंध्र प्रदेश के गोदावरी ज़िले में हुए नाव हादसों के बावजूद सरकार और प्रशासन की नींद नहीं खुली है. इसकी बानगी बैतूल के सारनी में देख सकते हैं. यहां पांच हज़ार लोगों की ज़िंदगी केवल दो बेहद जर्जर हो चुकी नावों के भरोसे है. सैकड़ों लोग रोज़ अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाते हैं. यहां नाव का इस्तेमाल क्यों और कैसे होता है ये देखकर कोई भी हैरान रह जाए.

नए भारत में ऐसी जोख़िम भरी तस्वीर भी एक कड़वी हक़ीक़त हैं. एक जर्जर हो चुकी नाव पर तीन चार बाइक, साइकिल, बोरियां और लोग जिनके पास खुद को बचाने के लिए न कोई लाइफ जैकेट है और न कोई दूसरा इंतजाम. ऐसा नज़ारा बैतूल में सारनी के पास राजडोह नदी में रोज देखा जा सकता है. नदी में पूरे साल पानी रहता है. इस नदी के दूसरे छोर पर छह गांव हैं. गांव में रहने वाले लोगों को रोज़मर्रा के काम के लिए सारनी आना पड़ता है, लेकिन इनकी मजबूरी यह है कि इसके लिए केवल नदी का ही एकमात्र रास्‍ता है और ज़रिया सिर्फ नाव. उस पर लोग अपनी मोटरसाइकिल से लेकर राशन तक लादकर नदी पार करते हैं. यह कोई एक-दो दिन या महीने भर की बात नहीं, बल्कि रोज़ की आम बात है.

छह गांव के लोग रोज इसी तरह नदी पार करते हैं.


हर दिन जोख़िम

आज़ादी के बाद से आज तक ग्राम पंचायत लोनिया, राजेगांव सहित आधा दर्जन गांव टापू बने हुए हैं. राजडोह नदी ने इन्हें अलग थलग कर रखा है. सारनी और बैतूल पहुंचने के लिए नाव के अलावा कोई दूसरा साधन नहीं है. सारनी से लोनिया और लोनिया से सारनी या अन्य जगह जाने वाले शिक्षक छात्र, व्यापारी, मजदूर और नौकरीपेशा लोग रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर राजडोह नदी को पार करते हैं. बारिश के मौसम में तो इनकी ज़िंदगी ही थम जाती है.



बाढ़ और रात में संकट
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सबसे बड़ी परेशानी यहां तब होती है जब भारी बारिश हो जाए या फिर रात के समय नाव नहीं चल रहा हो. ऐसे में अगर कोई बीमार हो जाए या किसी गर्भवती को अस्पताल पहुंचाने की नौबत हो तो यहांं के लोग सिर्फ भगवान को ही याद करते हैं.



पहली बारिश में बहा पुल
आज़ादी के बाद पहली बार साल 2012 यहां एक पुल बनकर तैयार हुआ था, लेकिन वो पहली ही बारिश झेल नहीं पाया और बह गया. इसके बाद लोगों की ज़िंदगी दोबारा इन नावों के भरोसे आ गई. यहां केवल दो नाव हैं और वो भी बेहद जर्जर. इनके कारण कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है.



हो चुके हैं कई हादसे
राजडोह घाट पर कई बार छोटे बड़े हादसे होना आम बात है. यहां के लोगों ने कई बार प्रशासन और सरकार से पुल बनाने की मांग की लेकिन जब किसी ने नहीं सुना तो इन्होंने खामोशी से इन दो नावों को ही हमराह मानकर अपना लिया.

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First published: September 18, 2019, 8:54 AM IST
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