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भिंड संसदीय सीट: दलित बनाम सवर्ण हुआ चुनाव, वसुंधरा राजे को भी करना पड़ा था हार का सामना

News18 Madhya Pradesh
Updated: May 9, 2019, 10:47 AM IST
भिंड संसदीय सीट: दलित बनाम सवर्ण हुआ चुनाव, वसुंधरा राजे को भी करना पड़ा था हार का सामना
फाइल फोटो

1984 से पहले सिंधिया राजवंश के राजमाता विजयाराजे और माधवराव में जहां से भी और जिस पार्टी से चुनाव लड़ा वो वहां से जीत गए. लेकिन, इस राजवंश की राजकुमारी वसुंधरा राजे 1984 में भिंड से लोकसभा का चुनाव हार गईं.

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मध्य प्रदेश के भिंड लोकसभा सीट पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है. कांग्रेस ने देवाशीष जरारिया को अपना उम्मीदवार बनाया है तो वहीं बीजेपी ने इस बार संध्या राय पर भरोसा जताया है. पिछले विधानसभा चुनाव में जिस एट्रोसिटी एक्ट के कारण बीजेपी को सवर्णों की नाराजगी झेलनी पड़ी थी, उसका असर आज भी भिंड लोकसभा सीट पर दिखाई दे रहा है. लेकिन, इस बार उस एक्ट की मार कांग्रेस को झेलनी पड़ सकती है. सोशल मीडिया में ऐसे कंटेंट की भरमार है, जिसमें 2 अप्रैल 2018 को ग्वालियर-चंबल में हुई दलित हिंसा के लिए कांग्रेस उम्मीदवार देवाशीष जरारिया को जिम्मेदार बताया जा रहा है. ऐसे में सवर्ण जातियों का बड़ा तबका कांग्रेस के खिलाफ जा सकता है.

पूर्व आईएएस डॉ. भागीरथ प्रसाद वर्तमान में यहां से बीजेपी सांसद हैं. उत्तर प्रदेश के इटावा से लगे इस संसदीय क्षेत्र में बसपा का भी काफी प्रभाव है. बीते आठ लोकसभा चुनाव से बीजेपी यहां जीतती आई है. वहीं कांग्रेस अभी तक यहां सिर्फ तीन लोकसभा चुनाव ही जीत सकी है.

भिंड संसदीय क्षेत्र साल 1962 में अस्तित्व में आया. यहां हुए पहले चुनाव में कांग्रेस के सूरज प्रसाद ने जीत दर्ज की. पहले इस सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया था, लेकिन 1967 में चुनाव से पहले हुए परिसीमन इस सीट को सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया गया.

कांग्रेस प्रत्याशी देवाशीष जरारिया व बीजेपी प्रत्याशी संध्या राय


1971 में हुए लोकसभा चुनाव में राजमाता विजयाराजे सिंधिया भिंड से जनसंध के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरीं और उन्होंने कांग्रेस के नरसिंह राव दीक्षित को मात दी. 1984 से पहले सिंधिया राजवंश के राजमाता विजयाराजे और माधवराव में जहां से भी और जिस पार्टी से चुनाव लड़ा वो वहां से जीता. लेकिन, राजनीति के मैदान में पहली बार उतरी इस राजवंश की राजकुमारी वसुंधरा राजे 1984 में यहां से लोकसभा का चुनाव हार गईं. इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति से तौबा कर लिया. वसुंधरा राजस्थान चली गई और फिर वहां की दो बार मुख्यमंत्री बनी. 1971 विजयाराजे सिंधिया भी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.

राजमाता विजयाराजे सिंधिया


1980 में यहां से कांग्रेस प्रत्याशी कालीचरण शर्मा चुनाव जीते. 1984 में बीजेपी ने ग्वालियर की राजकुमारी वसुंधरा राजे सिंधिया मैदान में उतारा और वह कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णा सिंह से हार गईं. 1989 में कांग्रेस के दिग्गज नेता नरसिंह राव दीक्षित कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज की. 1991 में बीजेपी ने योगानंद सारस्वती को टिकट दिया. उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार कांग्रेस प्रत्याशी उदयान शर्मा शिकस्त दी. 1996 में बीजेपी ने रामलखन सिंह को टिकट दिया. वे जीते और उन्होंने 1998, 1999 और 2004 के चुनाव में भी जीत हासिल की.
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First published: May 9, 2019, 10:17 AM IST
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