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अंतहीन त्रासदी के 35 बरस : अर्थियों का कारवां गुज़र गया,आंसुओं का सैलाब देखते रहे...   

News18 Madhya Pradesh
Updated: December 3, 2019, 11:27 AM IST
अंतहीन त्रासदी के 35 बरस : अर्थियों का कारवां गुज़र गया,आंसुओं का सैलाब देखते रहे...   
भोपाल गैस त्रासदी के 35 बरस

कुछ सवाल उस रात मौतों की चीत्कार सुनकर ठिठक कर खड़े हो गए थे, वे अब तक वहीं खड़े हैं. आखिर ये ‘भोपाल’ क्यों घटा? (vhopal gas tragedy) किसने घटने दिया? और किसने दोषियों को ‘कवच कुंडल’ दिए? प्रश्नों के उत्तर जहां से आने हैं, वहां चुप्पी के ताले हैं और उस रात शुरू हुआ सतत हादसे का अंतहीन दौर अब तक जारी है.

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सतीश एलिया (वरिष्ठ पत्रकार)

भोपाल.35 बरस पूरे हो गए हैं विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी (Industrial tragedy) यानी भोपाल गैसकांड (Bhopal Gas tragedy) हुए. दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी स्याह और सर्द रात को भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने (Union carbide factory) से निकली प्राणघातक गैस (Poisonous gas) के नासूर को रिसते तीन लाख छह हजार चालीस घंटे से ज्यादा अर्सा बीत गया है, लेकिन तंत्र की तंद्रा अब तक भंग नहीं हुई है.

कौन देगा इन सवालों के जवाब
कुछ सवाल उस रात मौतों की चीत्कार सुनकर ठिठक कर खड़े हो गए थे, वे अब तक वहीं खड़े हैं. आखिर ये ‘भोपाल’ क्यों घटा? किसने घटने दिया? और किसने दोषियों को ‘कवच कुंडल’ दिए? प्रश्नों के उत्तर जहां से आने हैं, वहां चुप्पी के ताले हैं और उस रात शुरू हुआ सतत हादसे का अंतहीन दौर अब तक जारी है. न्याय की बात तो कौन करे, जिंदा बच गए लोग अपने सीने में दफ्न गैस पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपने को अभिशप्त हैं. उन्हें संवेदनहीन तंत्र ने पल-पल मौत का संत्रास झेलते-झेलते मौत की आखिरी पेशी की आवाज़ सुनने के लिए अभिशप्त कर दिया है.

हादसे की लंबी उम्र
कोई नहीं जानता कि इस हादसे की उम्र कितनी लंबी होगी. संततियां विकलांग और बीमार पैदा होने की बात तो आईसीएमआर की पहली रिपोर्ट ने हादसे के तीन बरस बाद ही 1987 में बता दिया था. हादसे में रिसी गैस मिक गैस को इंगित करने वाली यह रिपोर्ट बताती है कि  गर्भवती स्त्रियों में से 24.2 गर्भपात का शिकार हो गई थीं. जो जन्मे उनमें से 60.9 प्रतिशत शिशु भी ज्यादा  दिन जीवित नहीं रह सके. मौत के पंजे से बच निकले शिशुओं में से भी 14.3 प्रतिशत शिशु दुनिया में शारीरिक विकृति लेकर आए. यह विकृति भी उन शिशुओं में ज्यादा पाई गयी जो गैस रिसाव के समय गर्भ में तीन से लेकर नौ माह तक की अवस्था में थे. इतना ही नहीं हादसे के वक्त पांच बरस के रहे बच्चों पर भी गैस का घातक असर हुआ. वे उम्र बढ़ने के साथ ही सांस की तकलीफ के बढ़ने का शिकार भी हुए. यानी आज जो 34 बरस से 39 बरस की उम्र के गैस पीड़ित हैं, उनकी तकलीफें मुसलसल जारी हैं.

ज़हरीली गैस का पीढ़ियों पर असरबीते हफ्ते ही विदिशा में एक असामान्य शिशु का जन्म हुआ. इसके लिए भी यूनियन कार्बाइड से रिसी ज़हरीली गैस का आनुवांशिकी असर बताया गया. यूनियन कार्बाइड प्लांट के कैंपस में स्थित टैंकों में अब भी उस रात रिसा वो ज़हरीला रसायन और उसका अपशिष्ट यानि रासायनिक कचरा मौजूद हैं. उसे ठिकाने लगाने का सवाल अब तक अनुत्तरित है. कई बार स्थान तलाशने और विदेशों तक में इसे डंप करने के उपाय खोजे जा चुके हैं. मगर अब तक स्थाई निदान नहीं हो पाया है. यह भी दहला देने वाली हक़ीक़त है कि राज्य सरकार के मेडिको लीगल संस्थान में गैस हादसे के पीड़ितों के सैंपल तक सुरक्षित नहीं रह पाए.

कारवां गुज़र गया....
सियासत की बात करें तो उस वक्त सूबे और केंद्र की सरकारों ने क्या किया था. जबकि उन्हें करना क्या चाहिए था? यह सवाल अब तक अनुत्तरित हैं. दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार थीं. प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी और मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह. सरकारों ने यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष और इस हादसे के गिरफ़्तार आरोपी वारेन एंडरसन के सुरक्षित और सम्मान सहित अमेरिका जाने का इंतजाम किया था. इस पर सियासत से लेकर बौद्धिक बहसों के अनेक कारवां गुजर चुके हैं.

आज़ाद की जगह अर्जुन सिंह!
भोपाल में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा हटाकर अर्जुन सिंह की प्रतिमा लगाने का जो लोग विरोध कर रहे हैं, वो यही मुद्दा उठा रहे हैं. वो याद कर रहे हैं कि तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह ने ही वारेन एंडरसन को सुरक्षित यहां से निकाला था.भाजपा तो भोपाल में बकायदा गैस हादसे और पीड़ितों की समस्या को दो दशक तक चुनावी मुद्दा बनाती रही. गैस त्रासदी और उस वक्त के पूरे वार्डों यानी समूचे शहर को गैस पीड़ित मानने पर जोर देती रही.ये अलग बात है कि बीजेपी जब सत्ता में आयी और पूरे डेढ़ दशक प्रदेश की सत्ता में रही लेकिन तब गैस कांड वाले मुद्दे उसने पीछे छोड़ दिए.

दुनिया से विदा हुए आरोपी और सरकार के मुखिया
बीते चार चुनाव में किसी भी सियासी जमात ने गैस कांड पीड़ितों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा ही नहीं माना. हालांकि जब अदालती फैसले की वजह से गैस कांड और एंडरसन का मामला चर्चा में आया,तो  जांच के लिए कमेटियां बना दी गयीं. लेकिन अब न तो हादसे का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन इस दुनिया में है, न ही उसके भारतीय साझेदार और न ही उसके मददगार बने तत्कालीन सरकारों के मुखिया.

जितनी बरसी उतने नेता
गैस पीड़ितों की उस वक्त मदद करने वाले लोगों के संगठन भी छिन्न भिन्न हो गए. इन संगठनों के नेताओं की संख्या भी उतनी संख्या तक जा पहुंची है जितनी बरसियां बीतती जा रही हैं. न तो गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदारों को सज़ा ही मिली और न ही पीड़ितों को राहत महसूस कर सकने लायक न्याय. ‘भोपाल’ को लेकर सियासत बदस्तूर जारी है.

अब्दुल जब्बार का जाना
गैस पीड़ितों की लड़ाई को प्रमुखता से लड़ने वाले गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के नेता अब्दुल जब्बार का बीते महीने ही इंतकाल हुआ है. हजा़रों हजार गैस पीड़ितों के इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले प्रमुख नेता अब्दुल जब्बार खुद भी गंभीर बीमारियों के शिकार थे. लेकिन वो अपना इलाज गैस पीड़ितों के लिए बने भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर बीएमएचारसी में कराते रहे और मर्ज बिगड़ता गया. जब्बार की मौत गैस पीड़ितों के लिए बड़ा सदमा और व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान है.

कब सबक सीखेंगे?
यक्ष प्रश्न यह भी है कि हमने और दुनिया ने विश्व की भीषणतम युद्ध त्रासदी हिरोशिमा नागासाकी की ही तरह विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड से क्या सीखा? ये हादसा दुनिया के रहबरों के माथे पर शिकन पैदा नहीं कर पाया था, लेकिन इससे सबक लिए बिना दुनिया का भला नहीं हो सकता. गैस त्रासदी में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक एक रात में काल कवलित हुए साढ़े तीन हजार और 35 साल से लगातार जारी हादसे में तिल तिलकर मृत हुए करीब 35 हजार लोगों को सही मायने में श्रृद्धांजलि यही होगी कि जो बचे हैं उन्हें बेहतर इलाज और मुआवज़ा मिले. वर्ना हर साल बरसी में हम संख्या की एक एक गिरह बढ़ाते जाएंगे, होगा कुछ नहीं.

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First published: December 3, 2019, 11:22 AM IST
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