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श्रद्धांजलि: समाज के सामने कई सवाल छोड़ गए हैं जब्बार भाई

Rakesh Kumar Malviya | News18 Madhya Pradesh
Updated: November 15, 2019, 2:06 PM IST
श्रद्धांजलि: समाज के सामने कई सवाल छोड़ गए हैं जब्बार भाई
अब्दुल जब्बार ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया लेकिन इस व्यवस्था से वे हार गए.

भोपाल जैसे शहरों ने अपने आंगन में इतनी लाशें एक साथ कभी न देखीं होंगी. जब्बार भाई के घर से भी मां-पिता भाई के जनाजे उठे. पर इसके बाद न तो भोपाल चुप बैठा न जब्बार भाई.

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भोपाल. जब्बार का मतलब होता है जिसमें असीमित ताकत हो. भोपाल (Bhopal) के जब्बार (Abdul Jabbar) का मतलब भी शायद यही है. वह शख्स जिसे बीते चार दशकों में बेइंतहा संघर्ष करते देखा. 1984 की तीन-चार दिसंबर की काली रात उस भयंकर हादसे का खुद शिकार हुआ और उसके बाद अपना पूरा जीवन ही गैस त्रासदी के संघर्ष में खपा दिया. सत्ता से संघर्ष किया ही, अदालतों में लंबी लड़ाईयां लड़ीं और लोगों को जमा किया. वास्तव में इतना लंबा संघर्ष वही कर सकता है जिसमें असीमित ताकत हो. जब्बार भाई में सब तरह की ताकत थी सिवाय उस ताकत के जिसके पीछे दुनिया लगी रहती है.

जब्बार भाई के लिए बीते दिन इतनी मुफलिसी के थे. उनके पास एक अदद चालू बैंक अकाउंट भी नहीं बचा था. जब उनसे इत्तेफाक रखने वाले लोग मदद की पहल कर रहे थे तो पता चला कि उनका बैंक अकाउंट ही बैलेंस न होने के चलते बंद कर दिया गया था. आनन-फानन में एक नया बैंक अकाउंट खुलवाया गया. वह अकाउंट तो एक्टिव हो गया, पर जब्बार भाई हमेशा के लिए रूखसत हो गए. वह संघर्ष की मिसाल तो स्थापित कर गए, लेकिन बहुत सारे सवाल भी छोड़ गए हैं इस समाज के लिए. जब्बार भाई ने समाज के लिए, भोपाल के लिए और पीड़ितों के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे, पर समाज ने उनके लिए क्या किया और सरकार ने उनके लिए क्या किया? क्या समाज के लिए संघर्ष करने वालों का जीवन कुछ यूं भी होता है कि उन्हें अपनी बीमारियों में अदद इलाज भी न मिले.

दुनिया में भोपाल का नाम होने की एक वजह भोपाल गैस त्रासदी भी है. इस त्रासदी का असर सालों-साल बाद तक भी भोपाल की फिजा में, भोपालियों के चेहरों पर, हवा में, मिट्टी में और पानी में दिखाई पड़ता है. वह एक रात थी, लेकिन उसके बाद न जाने कितनी भयंकर रातें थीं, जिनमें भोपालियों का दर्द रह-रह कर उठता था. भोपाल जैसे शहरों ने अपने आंगन में इतनी लाशें एक साथ कभी न देखीं होंगी. जब्बार भाई के घर से भी मां-पिता भाई के जनाजे उठे. पर इसके बाद न तो भोपाल चुप बैठा न जब्बार भाई.


बीते तीस चालीस सालों में मध्य प्रदेश की धरती ने कई अहिंसक संघर्ष देखें हैं उनमें से यह भी एक है. गांधी के मूल्यों के साथ जहां नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सत्याग्रह की मिसाल रची है, वहीं भोपाल में भी गैस पीड़ितों के इस संघर्ष को भुलाया नहीं जा सकेगा जबकि इन दोनों जगहों पर अन्याय और अत्याचार की सारी सीमाएं पार हुई सी लगती हैं. हैरानी की बात यह भी है कि इस दौरान राजनीतिक नेतृत्व भी बदला, मुख्यमंत्री बदले, पर फिर भी उतना न हो सका जितना कि अन्याय को भुलाया जा सके.

Abdul Jabbar Bhopal Gas Tragedy
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए अब्दुल जब्बार ने एक लंबी लड़ाई लड़ी.


इसे और कैसे समझें कि इस आंदोलन का जो नेता था वहीं अपने अंतिम दिनों में बेहतर इलाज को तरस रहा था. जब्बार अभी और जीते. उनका काम पूरा कहां हुआ था. व्यवस्था ने उन्हें मार दिया. उनको विदा दे रही महिलाओं की आंख में आंसू जरूर हैं लेकिन उन्हें फक्र है अपने भाई पर. कहती भी हैं कि हमारा भाई न रुका, न झुका और न किसी के आगे हाथ फैलाए. वह लड़ता रहा और इसलिए चला भी गया कि अपने लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े. इसीलिए वह केवल जब्बार ही नहीं था उतना ही खुद्दार भी था. पर सवाल तो इस समाज से है जिसके संघर्षों से भोपाल को तकरीबन दो हजार करोड़ की मुआवजा राशि मिली, क्या वह समाज उनकी देख रेख कर सकता था.

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First published: November 15, 2019, 2:06 PM IST
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