वाजपेयी की ओर क्यों लौटना चाह रही है भाजपा

पार्टी में आज की युवा पीढ़ी अटलजी को सिर्फ एक इतिहास पुरूष के बतौर ही जानती है. उसने तो भाजपा का मोदी युग ही देखा है. अटलजी लोकप्रियता के ग्राफ में बहुत ऊपर थे.

Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: September 12, 2018, 3:55 PM IST
वाजपेयी की ओर क्यों लौटना चाह रही है भाजपा
फाइल फोटो
Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: September 12, 2018, 3:55 PM IST
अजेय भारत अटल भाजपा, इस आव्हान के साथ भाजपा अब 2019 के चुनावी समर में कूच करेगी. यह चौंकाने वाला तो नहीं लेकिन अप्रत्याशित है, कि भाजपा अब अटल बिहारी वाजपेयी की ओर लौटना चाह रही है. 2019 के चुनाव से पहले दिल्ली में भाजपा की आख़िरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह से अटलजी को याद करते हुए चुनावी नारे को गढ़ा गया है उसने मोदी- शाह की भाजपा का एक नया चेहरा सामने ला दिया है.

आज भी क्यों प्रासंगिक

करीब डेढ़ दशक तक भारतीय राजनीति के मुख्य परिदृश्य से अलग- थलग होने के बावजूद वाजपेयी आज भी क्यों प्रासंगिक हैं? इसका जवाब दिल्ली के एक स्टेडियम में सर्वदलीय श्रध्दांजलि सभा है. जिसमें सभी विरोधी दलों के नेता शामिल हुए. उन्होंने बहुत भावुकता से कहा - वाजपेयी लोगों के दिलों पर राज करते थे. भाजपा क्या अब उसी करिश्मे को पकड़ना चाहती है?

मोदी दुनिया के लोकप्रिय नेता

हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बहुत ही गर्वानुभूति से कहा है कि हमारे पास दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी हैं. उनके नेतृत्व में 2019 का चुनाव जीता जाएगा. मोदी ने 2014 के बाद कभी विश्राम नहीं किया है. हम निरंतर काम कर रहे हैं. 300 से ज़्यादा लोकसभा क्षेत्रों का दौरा वे अब तक कर चुके हैं. जनता परफॉरमेंस देखती है. इसलिए 2019 ही नहीं, आने वाले 50 साल तक भाजपा की सरकार रहेगी.

उन्हें भुलाया तो नहीं पर याद भी नहीं किया

आत्मविश्वास से भरी इसी भाजपा में 2009 और 2014 के चुनाव में अटलजी की भूमिका नैपथ्य में थी. उन्हें भुलाया तो नहीं गया था, लेकिन इस तरह कभी याद भी नहीं किया, क्या भाजपा इस नाम के साथ अपने साढ़े 10 करोड़ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं में नयी चेतना और ऊर्जा भरने जा रही है? हालांकि उनमें से अधिकांश कार्यकर्ता ऐसे हैं जिनके लिए अटलजी का युग किस्सों में है. भाजपा के आंतरिक माहौल में महसूस किया जा रहा है कि 2014 में जो फोर्स था, वह नदारद है. कई राज्यों में कार्यकर्ता निरूत्साह में है. जिससे पार पाना इतना आसान नहीं है.
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सर्वप्रिय थे लेकिन जीतन नहीं पाए

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता स्वीकार करते हैं कि पार्टी में आज की युवा पीढ़ी अटलजी को सिर्फ एक इतिहास पुरूष के बतौर ही जानती है. उसने तो भाजपा का मोदी युग ही देखा है. अटलजी लोकप्रियता के ग्राफ में बहुत ऊपर थे. लेकिन भाजपा का सफलता का पायदान तब इतना मज़बूत नहीं था. सिर्फ 25 फीसदी वोट बैंक पर 182 सीटों के साथ भाजपा एनडीए की सरकार कायम हुई थी. वे सर्वप्रिय नेता रहे लेकिन उनकी अगुवाई में भाजपा 2004 का दूसरा चुनाव हार गयी थी. आज 21 राज्यों और 38 फीसदी वोटबैंक के साथ भाजपा ने देश के अधिकांश हिस्से को केसरिया बाने से रंग दिया है.

मुख्यधारा से बाहर हैं नेता

अटलजी के वक्त के तमाम नेता भाजपा की मुख्यधारा से बाहर हैं. लालकृष्ण आडवाणी, जसवंतसिंह, मुरलीमनोहर जोशी, विजयकुमार मल्होत्रा, शांताकुमार,–कुछ तो दिवंगत हो चुके हैं - बाला साहब ठाकरे ,भैरोसिंह शेखावत, सुंदरलाल पटवा, कुशाभाउ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल, प्रमोद महाजन आदि. ऐसे में अटल भाजपा का नारा उन तमाम वरिष्ठ नेताओं को करीब लाने की ताकत रखता है जो तमाम मतभेदों के बावजूद पार्टी को बुलंदियों पर देखना चाहते हैं.

2018 के चुनाव

भाजपा इस बात को नहीं भूली है कि 2004 में जब शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था, उसकी वजह 2003 के हिंदी बेल्ट के तीन राज्यों के चुनाव में मिली ज़बरदस्त जीत थी. मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जहां उमा भारती, वसुंधरा राजे और रमन सिंह की जीत ने भाजपा को चमकते भारत की तस्वीर दिखाई थी. 2018 में इन तीनों राज्यों के चुनाव हैं. और भाजपा इन राज्यों की अहमियत और यहां पर अटलजी के करिश्मे की ताकत को पहचानती है. अजेय भारत अटल भाजपा का यह नारा इन तीनों राज्यों के चुनाव में असर पैदा करेगा.

गठबंधन से रिश्ते साधने होंगे

अटलजी के वक्त 13 पार्टियों की सरकार थी. अब मोदी –शाह की भाजपा में 46 दल हैं. और निसंदेह गठबंधन की राजनीति का वह समावेशी रूप अभी नहीं है. शिवसेना जैसा दल भाजपा की मुखालफत कर रहा है. चंद्रबाबू नायडु टीडीपी रिश्ता छोड़ चुकी है. अकाली दल से रिश्ते कुछ खास नहीं है. ममता जो अटलजी के वक्त करीबी थी. अब विरोध में हैं. पीडीपी से रिश्ते टूट चुके हैं. जम्मू कश्मीर से भाजपा –पीडीपी सरकार का गिरना बड़ा झटका है. 2019 में गठबंधन को नए समीकरणों में बांधना होगा. उस रणनीति में अटलजी का सबको साधने का मंत्र भाजपा के लिए ज़रूरी है.

सॉफ्ट हिंदुत्व चुनौती

चुनावी मुद्दों पर नजर गड़ाएं तो पता चलता है कि भाजपा के लिए एक नई मुसीबत कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व की खड़ी हो गई है. धर्मनिरपेक्ष का चोला पहने कांग्रेस ने 2019 तक आते-आते हिंदुत्व का रंग ओढ़ लिया है. यह एक नई धारा है जिसने न स्वीकार करते हुए भी गुजरात, कर्नाटक चुनाव में असर दिखाया है. कहा जा सकता है कि कांग्रेस की यह चाल अटल भाजपा के करीब है और आने वाले समय के लिए ख़तरे की घंटी भी.

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