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गैस त्रासदी के 36 साल, कल भोपाल के सभी सरकारी ऑफिस रहेंगे बंद

भोपाल गैस त्रासदी 3 दिसंबर 1984  को हुई थी.
भोपाल गैस त्रासदी 3 दिसंबर 1984 को हुई थी.

मध्‍य प्रदेश सरकार (Madhya Pradesh Government) ने भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) की याद में 3 दिसंबर को भोपाल में सभी सरकारी कार्यालयों को बंद रखने का ऐलान किया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 2, 2020, 10:21 PM IST
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भोपाल. मध्‍य प्रदेश की शिवराज सरकार (Madhya Pradesh Government) ने भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) की याद में 3 दिसंबर को भोपाल में सभी सरकारी कार्यालयों को बंद रखने का ऐलान किया है. 3 दिसंबर 1984 को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कीटनाशक संयंत्र से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था. इस हादसे में कई हजार लोगों की मौत हुई, तो घायल होने वालों की तादाद भी हजारों में थी. इसके साथ ही इस हादसे से अजन्मे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी सवालिया निशान लग गया है. यकीनन यह भोपाल के लोगों को सदियों तक सालने वाला दर्द है.

तीन हजार से अधिक लोग मारे गए
यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन के भोपाल स्थित संयंत्र से दो-तीन दिसंबर, 1984 को एमआईसी गैस के रिसाव के कारण हुयी त्रासदी में तीन हजार से अधिक लोग मारे गये थे और 1.02 लाख लोग इससे बुरी तरह प्रभावित हुये थे. यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन ने इस त्रासदी के लिये मुआवजे के रूप में 47 करोड़ अमेरिकी डालर दिये थे.





कारखाने से नहीं हटा जहरीला कचरा
सन 2012 में सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद भी यूनियन कार्बाइड कारखाने में दफन जहरीला कचरा राज्य की सरकारें हटवाने में आज तक नाकाम रहीं. सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निष्पादन किया जाए, लेकिन कारखाने में दफन 350 टन जहरीले कचरे में से 2015 तक केवल एक टन कचरे को हटाया जा सका है. इसे हटाने का ठेका रामको इन्वायरो नामक कंपनी को दिया गया है, लेकिन कचरा अभी तक क्यों नहीं हटाया जा सका, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. इस कचरे के कारण यूनियन कार्बाइड से आसपास की 42 से ज्यादा बस्तियों का भूजल जहरीला हो चुका है. पानी पीने लायक नहीं है, लेकिन किसी को फिक्र नहीं है.

...और मुआवजे की दरकार
मुआवजे के मामले में कंपनी और केन्द्र सरकार के बीच हुए समझौते के बाद 705 करोड़ रुपए मिले थे. इसके बाद भोपाल गैस पीड़ित संगठनों की ओर से 2010 में एक पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी, जिसमें 7728 करोड़ मुआवजे की मांग की गई थी. इस मामले में अब तक फैसला नहीं हो पया.

गैस राहत अस्पताल खुद हुए बीमार
1989 में मप्र सरकार ने गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग का गठन किया. इसके बाद बीएचएमआरसी समेत 6 गैस राहत अस्पताल बनाए गए, लेकिन इन अस्पतालों में न डॉक्टर हैं, न संसाधन. गैस पीड़ितों के लिए बने सबसे बड़े अस्पताल बीएमएचआरसी का हाल ये है कि यहां कई विशेषज्ञ डॉक्टर नौकरी छोड़ कर निजी अस्पतालों में ऊंची तनख्वाहों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अस्पताल के गैस्ट्रो, हार्ट जैसे विभागों में तो लगभग ताले ही लग चुके हैं. भोपाल गैस पीड़ितों के लिए अस्पताल, इलाज, मुआवजे के लिए सड़क से सुप्रीमकोर्ट तक लंबी लड़ाई लड़ने वाले गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के नेता अब्दुल जब्बार की हाल ही में समय पर बीएमएचआरसी में बेहतर इलाज न मिलने के चलते मौत हो गई थी.
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