ANALYSIS : चुरहट में हारे अजय सिंह अब सीधी में दांव पर क्यों लगाए गए हैं ?
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ANALYSIS : चुरहट में हारे अजय सिंह अब सीधी में दांव पर क्यों लगाए गए हैं ?
फाइल फोटो

20 साल से सीधी की चुरहट विधानसभा सीट से विधायक रहे अजय सिंह हाल ही में चुनाव हार चुके हैं. अजय सिंह मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में से एक थे. इसलिए इस हार ने उन्हें बहुत चोट पहुंचाई है.

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सीधी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह का चुनावी करियर दांव पर है? अपनी चुनावी दावेदारी को लेकर यही भावुक अपील अजय सिंह अपने कार्यकर्ताओं और करीबी लोगों से कर रहे हैं.

दरअसल पिछले 20 साल से सीधी की चुरहट विधानसभा सीट से विधायक रहे अजय सिंह हाल ही में चुनाव हार चुके हैं. अजय सिंह मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में से एक थे. इसलिए इस हार ने उन्हें बहुत चोट पहुंचाई है. वे सतना लोकसभा सीट से चुनावी तैयारी में लगे हुए थे. लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ के आग्रह पर अब वो सीधी से मैदान में उतरे गए हैं.

दो लाख से ज्यादा का अंतर
यहां चुनावी हालात कांग्रेस के लिए आसान नहीं हैं. यहां की आठ विधानसभा सीट में से सात बीजेपी के पास हैं. एक कांग्रेस के पास है. करीब दो लाख से ज़्यादा का वोट अंतर विधानसभा चुनाव में रहा है. चुरहट जिस सीट से अजय सिंह हारे हैं वहां हार का अंतर ही छह हजार से ज्यादा वोट का है. ऐसी मुश्किल सीट पर अजय सिंह को क्यों मैदान में उतारा गया है ? इसे लेकर कई राजनीतिक कयास है.



40 फीसदी एससी एसटी वर्ग


जिस तरह भोपाल जैसी मुश्किल सीट पर दिग्विजय सिंह को मैदान में उतारा गया है वैसा ही दांव अजयसिंह के साथ खेला गया है. सीधी 2007 तक आरक्षित सीट थी. करीब 17 लाख यहां वोटर्स हैं जिसमें से 40 फीसदी एससी एसटी वर्ग से हैं. इसे कांग्रेस अपना मजबूत वोट बैंक मान रही है. विधानसभा का चुनाव यहां कांग्रेस जातिगत समीकरणों के कारण हारी. यहां कोई मज़बूत ब्राह्मण नेता नहीं होना भी कांग्रेस के लिए भारी पड़ा है. इस चुनाव में कांग्रेस ने यहां दांव चलते हुए सतना से राजाराम त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है. वहीं रीवा से सिध्दार्थ तिवारी हैं. दरअसल कांग्रेस यहां विधानसभा चुनाव का हिसाब बराबर करना चाहती है. सबसे बड़ा नुकसान इसी इलाके से कांग्रेस को हुआ है.

भाजपा में असंतोष
अजय सिंह के ख़िलाफ भाजपा की रीति पाठक मैदान में हैं. पिछले चुनाव में पाठक ने कांग्रेस उम्मीदवार को 1 लाख से ज्यादा वोटों से हराया था. लेकिन भाजपा में अब पाठक के खिलाफ असंतोष है. पूर्व मंत्री गोविंद मिश्रा पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं. लगातार दो बार से सांसद पाठक एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर से भी जूझ रही हैं. हालांकि विधानसभा के ताज़ा नतीजे बीजेपी के ही फेवर में थे.

भाजपा के खिलाफ संघर्ष
अजयसिंह अगर यह चुनाव जीतते हैं तो वे फिर प्रदेश की राजनीति में अग्रिम पंक्ति में शामिल होंगे. पर अगर वे चुनाव हार जाते हैं तो भी संभव है उन्हें राज्यसभा का मौका दिया जाए. क्योंकि 15 साल से मध्यप्रदेश में अजय सिंह भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेताओ में शुमार हैं. नेता प्रतिपक्ष रहते हुए उनकी छवि सत्ता के साथ समझौते की नहीं रहीं. 2014 में भी कांग्रेस हाइकमान के कहने पर वे सतना से लोकसभा का चुनाव लड़े थे. मोदी लहर होते हुए भी वे बहुत कम अंतर से वो चुनाव हारे थे.

घरेलू विवाद
दरअसल अजय सिंह के विधानसभा चुनाव हारने का एक कारण उनका घरेलू विवाद भी है. उनके खिलाफ उनकी मां द्वारा दायर किए गए घरेलू हिंसा के मामले को भाजपा ने जबर्दस्त भुनाया. इसका असर ये हुआ कि वे अपनी रियासत में ही चुनाव हार बैठे.

भविष्य तय करेगा
राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता कहते हैं कि अजय सिंह के लिए सीधी लोकसभा सीट इतनी आसान नहीं है. इसका अनुमान उन्हें हैं. इसलिए वे खुद भी पीड़ा का इज़हार कर चुके हैं कि मैं तो फुटबाल हूं मुझे कहीं पर भेज दो. यह चुनाव एक तरह से उनका राजनीतिक भविष्य तय करने वाला है.

पेंच फंसा हुआ है
विंध्य क्षेत्र से संघ के करीबी चिंतक जयराम शुक्ल कहते हैं कि पेंच फंसा हुआ है. कांग्रेस अगर यह एससी एसटी वर्ग के वोटबैंक को आधार मानकर चल रही है तो यह उसकी भूल है. अब अर्जुन सिंह जी को जानने वाली जनरेशन नहीं रहीं. हम इस बात को भी नहीं भूल सकते कि इसी इलाके में खुद सिंह को अपना आखिरी चुनाव हारना पड़ा था.

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