ANALYSIS: कांग्रेस हाईकमान को भारी ना पड़ जाए ज्योतिरादित्य सिंधिया को UP भेजना!

कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिम उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना कांग्रेस को भारी पड़ सकता है (फाइल फोटो)

सिंधिया के मध्यप्रदेश से बाहर होने का असर कांग्रेस में दिखाई दे रहा है. विधानसभा चुनाव के दौरान स्टार कैंपेनर के बतौर उनकी सवा सौ से ज्यादा रैलियों ने कांग्रेस का चुनावी माहौल खड़ा कर दिया था. जो इस बार नदारद होगा

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कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिम उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना कांग्रेस को भारी पड़ सकता है. लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश को उनकी ज़रूरत है लेकिन उनके पास यूपी का प्रभार होने के कारण वो वहां फंसे हुए हैं. यूपी में भी उनके आक्रामक चुनावी कैंपेन का इंतजार है. वहीं मध्यप्रदेश में उनकी बड़ी चुनौती अपनी संसदीय सीट गुना शिवपुरी को बचाने की भी है, जिस पर बीजेपी की नज़र है.

4 महीने पहले मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के गुना में नतीजे चौंकाने वाले थे. जहां पूरे प्रदेश में कांग्रेस की बढ़त रही, वहीं सिंधिया के गढ़ में बीजेपी ने अपना कद बढ़ाया. यहां की आठ में से तीन विधानसभा सीट भाजपा ने अपने कब्जे में कर ली. अब लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ मानी जाने वाली गुना-शिवपुरी सीट पर बीजेपी किसी मज़बूत उम्मीदवार को उतार सकती है. वहीं एक एक सीट के लिए जद्दोजहद में लगी कांग्रेस इस सीट पर सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शनी के लिए भी विचार कर रही है. ऐसी हालत में सिंधिया ग्वालियर या फिर इंदौर से चुनाव लड़ सकते हैं. जबकि ये भी एक हकीकत है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता सिंधिया का इंतजार अपने क्षेत्रों में कर रहे हैं. वहां से आ रही खबरों के मुताबिक सिंधिया अभी तक पश्चिम यूपी में भी नहीं पहुंचे हैं, जहां पहले चरण में ही वोटिंग है.

बंटे हुए हैं सिंधिया
इस चुनावी जद्दोजहद में सिंधिया बंटे हुए से नज़र आ रहे हैं. पूर्वी यूपी में प्रियंका गांधी का धुआंधार चुनावी दौरा चल रहा है. वे पूर्वी यूपी की 22 सीटों का प्रभार देख रही हैं. पश्चिम यूपी का जिम्मा ज्योतिरादित्य सिंधिया के हवाले है. लेकिन वो अभी तक यहां पहुंचे ही नहीं हैं. जबकि यहां पहले चरण में वोट डाले जाना हैं और नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. यहां 23 सीटों के लिए उन्हें आक्रामक कैंपेन करना होगा, तभी बात बन पाएगी. यूपी में कांग्रेस चौथे नंबर पर है. वहां ज़मीनी स्तर से पार्टी को खड़ा करना बड़ी चुनौती है.

चुनावी जमावट में लगे
पश्चिम यूपी की ज़िम्मेदारी से दूर ज्योतिरादित्य सिंधिया फिलहाल अपने संसदीय क्षेत्र गुना-शिवपुरी में व्यस्त हैं. वो यहां पोलिंग एजेंट्स के साथ सम्मेलन कर रहे हैं. अपने क्षेत्र में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं और जनसंपर्क कर रहे हैं. जहां वे खुलकर पूछ रहे हैं कि हम चंबल बेल्ट में तो विधानसभा चुनाव जीत रहे हैं लेकिन गुना में क्यों हार गए हैं? उनके वीडियो भी वायरल हुए हैं जिसमे वे कह रहे हैं कि जिस पोलिंग बूथ पर कांग्रेस को सत्तर फीसदी वोट मिलेंगे वहां पर वे क्षेत्र के विकास के लिए दस लाख की सांसद निधि देंगे. स्थानीय भाजपा यह मामला चुनाव आयोग तक लेकर गई है.

चुनाव के दौरान नहीं होंगे
ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने इलाके में दो दर्जन से अधिक गांव और शहरों के दौरे अब तक कर चुके हैं. वो क्षेत्र की जनता से आग्रह कर रहे हैं कि वे चुनाव के दौरान यहां नहीं रह पाएंगे. क्योंकि उन्हें यूपी का प्रभार दिया गया है. बावजूद इसके उन्हें भरोसा है कि क्षेत्र का मतदाता हमेशा की तरह उनके साथ होगा. सिंधिया के करीबी नेता का कहना है कि क्षेत्र की चुनावी जमावट करने के बाद वे पूरी तरह यूपी में रहेंगे.

भाजपा की नजर
इधर भाजपा छिंदवाडा और गुना- शिवपुरी सीट को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना चुकी है. मोदी लहर में भी भाजपा के कब्जे से दूर रही इन सीट्स पर भाजपा वॉकओवर देने के मूड में नहीं है. यहां पर किसी भी बड़े नेता को मैदान में उतारा जा सकता है. ताकि कांग्रेस के लिए चुनाव मुश्किल हो सके.

कांग्रेस पर होगा असर
सिंधिया के मध्यप्रदेश से बाहर होने का असर कांग्रेस में दिखाई दे रहा है. विधानसभा चुनाव के दौरान स्टार केंपेनर के बतौर उनकी सवा सौ से ज्यादा रैलियों ने कांग्रेस का चुनावी माहौल खड़ा कर दिया था. जो इस बार नदारद होगा. मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. उन्हें चुनाव प्रबंधन भी करना है और प्रचार भी. उन पर दोहरी जिम्मेदारी है. पार्टी के दूसरे नेता दिग्विजय सिंह संभवत भोपाल से चुनाव लड़ने वाले हैं. इसलिए वो भी कैंपेन से बाहर होंगे.

कांग्रेस की नजर 2022 पर
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभार वाले क्षेत्र में पहले चरण यानि 11अप्रैल से चुनावी शुरुआत है. लेकिन वे अभी तक अपने क्षेत्र में चुनावी दौरों की शुरूआत नहीं कर पाए हैं. यहां कहा जा रहा है कि वे दिल्ली के वार रूम से चुनाव को संभाल रहे हैं. दरअसल यहां सिंधिया को प्रभार तो दे दिया है लेकिन क्या उन्हें पावर भी दिया गया है? कांग्रेस हाईकमान ने उम्मीदवारों के चयन में क्या उन्हें महत्व दिया है? ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस की नजर यहां 2019 के बजाय 2022 के चुनाव पर है.

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