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OPINION: सिंधिया-शिवराज मुलाकात- 'ये दुनिया वाले पूछेंगे...'

फाइल फोटो- शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया
फाइल फोटो- शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया

शिवराज सिंह चौहान औऱ ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया की इस मुलाकात का सियासी शिलालेख इसलिये भी ज़रूरी है क्योंकि इसका न सिर्फ इतिहास रोचक है, बल्कि भविष्य में ‘सालों बाद’ और ‘सालों तक’ ज़िक्र होता रहेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2019, 1:14 PM IST
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ललित प्रजापति

“ये दुनिया वाले पूछेंगे, मुलाकात हुई-क्या बात हुई. ये बात किसी से ना कहना..” साल 1969 की फिल्म महल का गाना जिसे किशोर दा और आशा दीदी ने गाया था, लेकिन अभी बात गाने की नहीं... इसे बस याद रखिए.

सोमवार 21 जनवरी को वैसे तो कुछ दिन बीत गए, इस बीच गंगा में बहुत सारा पानी भी बह गया, कांग्रेस में इंदिरावतारम् हो गया, सिंधिया का प्रदेशनिकालम् (यूपी की जिम्मेदारी) हो गया लेकिन ‘उस’ मुलाकात का वैसा दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया. शिवराज सिंह चौहान औऱ ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया की इस मुलाकात का सियासी शिलालेख इसलिये भी ज़रूरी है क्योंकि इसका न सिर्फ इतिहास रोचक है, बल्कि भविष्य में ‘सालों बाद’ और ‘सालों तक’ ज़िक्र होता रहेगा. सबसे पहले जान लीजिए कि इस मुलाकात के बाद महाराज और मामा ने क्या कुछ कहा. महाराज ने कहा कि वो कड़वाहट लेकर ज्यादा दिन नहीं चल सकते, रात गई बात गई की तर्ज़ पर वो मिलने आए थे. मामा बोले शिष्टाचार मुलाकात. ये और बात है कि जिसने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के विज्ञापन देखे होंगे वो इस जवाब से भौंचक रह गए क्योंकि इस मुलाकात में कई पेंच फंसे हैं.



कांग्रेस के लिहाज से भाजपा से उपेक्षित शिवराज से मिलने के लिए महाराज गए थे और भाजपा के हिसाब से हाशिए पर खड़े ज्योतिरादित्य, शिवराज से मिलने गए थे. खास बात ये कि जिस वक्त ये मुलाकात हुई उसी दिन भाजपा कानून व्यवस्था को लेकर सड़क नाप रही थी. इसी दिन दिग्विजय भोपाल से बाहर थे और सीएम कमलनाथ विदेश से निवेश के लिए दावोस में थे.
अब इस दिलचस्प मुलाकात के पहले का इतिहास. नवंबर आते आते मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की पूरी कैम्पेनिंग ही ‘ग्रे शेड’ ले चुकी थी और विज्ञापनों के मुताबिक शिवराज औऱ सिंधिया आमने सामने हो गए. ये दीगर है कि नतीजों के बाद संघ ने बताया कि व्यक्तिगत विज्ञापन से भारी नुकसान हुआ मसलन “माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज”. इससे थोड़ा और पीछे चलें तो शिवराज, सुभद्राकुमारी चौहान की कविता के हवाले से ‘अंग्रेजों को मित्र सिंधिया’ कहकर सिंधिया परिवार पर निशाना साधते रहे.

सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह


भिंड के अटेर में उपचुनाव से पहले तो तत्कालीन सीएम शिवराज ने सिंधिया राजघराने की राष्ट्रीय निष्ठा पर ही सवाल उठाए खड़े कर दिए थे जो पहली बार नहीं था. अचानक से आलाकमान से आए निर्देश के बाद शिवराज के सुर बदले और उन्होंने राजमाता में अपनी निष्ठा दिखाई, क्योंकि भाजपा के वटवृक्ष की बागवान राजमाता सिंधिया ही रही हैं और भाजपा ने एमपी, राजस्थान में राजमाता की साख को कैश करने की रणनीति अख्तियार कर ली थी. ऐसे में न सिर्फ शिवराज बल्कि उनके खेमे के नेता भी अपने लीडर का बचाव करने लगे. बीजेपी की तरफ से कहा गया कि आजा़दी के पहले सिंधिया घराना राष्ट्रीय शर्म का विषय रहा है लेकिन तत्कालीन सीएम ने ये बात राजमाता, यशोधरा राजे और ज्योतिरादित्य के बारे में नहीं कही. सफाई ने ही बता दिया था कि बीजेपी बैकफुट पर है.

किसान के बेटे शिवराज पर सिंधिया ने भी चुनाव के दौरान खूब हमला किया। सिंधिया ने प्रचार के दौरान कहा कि शिवराज खुद को पिछड़ा प्रचारित न करें. मंदसौर रेपकांड के वक्त सिंधिया ने शिव-राज को ‘शव’राज’ बताया था. जून 30 तक सिंधिया, शिवराज को कह चुके थे कि जन आशीर्वाद यात्रा नहीं, जन क्षमा याचना यात्रा करिए. सिंधिया ने ये भी कहा था कि उनके नींबू-मिर्ची की माला पहनने से शिवराज को मिर्ची क्यों लगती है. याद करिए कि मंदसौर में हुए रोड शो के दौरान सिंधिया ने नींबू-मिर्ची की माला पहनी थी. उस समय भाजपा ने तंज कसा था कि सिंधिया जीत के लिए टोने-टोटके का सहारा ले रहे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया को किसी कांग्रेसी नेता ने नींबू-मिर्ची की माला पहनाई और सिंधिया ने माला पूरे रोड शो के दौरान पहने रखी.

नफरतों से भरे इन बयानों की रोशनी में समझने की कोशिश करिए कि करीब 45 मिनट की मुलाकात के बाद क्या करेले को काजू कतली की मिठास बता दिया जाएगा और अवाम मान लेगी ! भाजपा-कांग्रेस ने इसे दोस्ती बताते हुए कहा कि भले ही मैदान में हम दुश्मन है पर उसके बाद हम दोस्त हैं. इससे समझिए कि भारतीय वोटर की बुद्धिमत्ता पर सवाल है या नेताओं ने इतना हल्का समझ लिया कि हास्य के सहारे हकीकत छिपा ली जाए.

कुछ कविताओं, लोकोत्तियां बताकर इन मुलाकातों के इस हसीन सिलसिले के साथ फिर आपको उसी गाने पर लिए चलते हैं कि “ये मीडिया वाले पूछेंगे, मुलाकात हुई-क्या बात हुई. ये बात किसी से ना कहना...” इस फिल्म का नाम था ‘महल’ और मध्य प्रदेश की राजनीति का जिक्र बिना महल के हो ही नहीं सकता.

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