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OPINION: विधान परिषद के गठन से पहले कमलनाथ सरकार इन मोर्चों पर भी गौर फरमाएं

News18 Madhya Pradesh
Updated: November 6, 2019, 11:42 AM IST
OPINION: विधान परिषद के गठन से पहले कमलनाथ सरकार इन मोर्चों पर भी गौर फरमाएं
मुख्यमंत्री कमलनाथ का तर्क ये है कि विधान परिषद के गठन से राज्य का विकास होगा.

विधान परिषद (Legislative Assembly) के गठन से राज्य (Madhya Pradesh) की जनता (Public) पर 35 से 40 करोड़ रुपए का सालाना अतिरिक्त आार्थिक बोझ पड़ने वाला है.

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भोपाल. मध्य प्रदेश में जनता के अच्छे दिन कब आएंगे, यह तो नहीं मालूम, लेकिन सतारूढ़ दल से जुड़े असंतुष्टों और चहेतों के अच्छे दिन जरूर आने वाले हैं. राज्य में विधान परिषद (Legislative Assembly के गठन की कवायद तो यही बयान करती है. विधानसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में किए गए चुनावी वादों को पूरा करने के बहाने चुनाव में पार्टी को जिताने में मदद या समय-समय पर सरकार के लिए मुश्किल खड़े करने वाले, चुनाव हार चुके और सत्ता के सुख से दूर निठल्ले बैठे कांग्रेस नेताओं के लिए विधान परिषद नाम का नया आश्रय स्थल खोलकर उनके पुनर्वास की कोशिश की जा रही है. इससे जनता पर 35 से 40 करोड़ रुपए सालाना का अतिरिक्त आार्थिक बोझ पड़ने वाला है.

विधान परिषद के गठन का बीजेपी कर रही है विरोध

राज्य की प्रमुख विपक्ष भारतीय जनता पार्टी (BJP) विधान परिषद के गठन की कवायद का पुरजोर विरोध करते हुए गंभीर सवाल उठा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का कहना है कि जनता पर फिजूल का आर्थिक बोझ डालने की इस कुत्सित कोशिश को किसी भी सूरत में कामयाब नहीं होने दिया जाएगा. विधान परिषद को लेकर उठ रहे चौतरफा सवाल वाजिब भी हैं.

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पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का कहना है कि जनता पर फिजूल का आर्थिक बोझ डालने की इस कुत्सित कोशिश को किसी भी सूरत में कामयाब नहीं होने दिया जाएगा.


मध्य प्रदेश लंबे समय से लगातार भयानक आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है. कई बार ऐसा हो चुका है कि कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए सरकार के पास धनराशि नहीं रही है. जनवरी 2019 से बीते सितंबर माह तक सरकार 15,600 करोड़ से ज्यादा कर्ज ले चुकी है, यानि रोज औसतन 58 करोड़, हर घंटे 2.41 करोड़ का कर्ज बढ़ रहा है. मध्यप्रदेश अब तक कुल 2 लाख करोड़ रुपए से ऊपर कर्ज में डूब चुका है.

राज्य की जीडीपी में 24 फीसदी की गिरावट

हालात की गंभीरता पर नजर डालें तो कमलनाथ सरकार (Kamal Nath) के कार्यकाल में ही राज्य की जीडीपी मेें 24 फीसदी गिरावट देखने को मिली है. इस वित्तीय वर्ष में सरकार की नीतियों या विभिन्न कारणों के चलते 2500 करोड़ रुपये का राजस्व कम प्राप्त हुआ है. जीएसटी कलेक्शन में राज्य के हिस्से में 4097 करोड़ रुपए की कमी देखी गई है. बाढ़, बारिश सहित अन्य आपदाओं से जुड़े राहत कार्यों के लिए सरकार को 16000 करोड़ की दरकार है, जो उसके पास नहीं है.
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सरकार ना रोजगार दे पा रही है और ना ही बेरोजगारी भत्ता

सरकार चुनावी वादे के मुताबिक ना तो युवाओं को रोजगार देने में कामयाब हुई है, न ही उन्हें बेरोजगारी भत्ता दे पा रही है. स्थिति यह है कि प्रदेश में बेरोजगारों की संख्या 25 लाख से ऊपर हो चुकी है और हर साल औसतन 15 हजार बेरोजगारों को ही नौकरियां मिल पा रही हैं. सरकारी विभागों में खाली पदों की संख्या बढ़ती जा रही है. इन्हें भरे जाने के कोई प्रयास सरकार नहीं कर रही है.
सरकार अपने चुनावी वादे के अनुसार किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे पर भी बुरी तरह नाकाम रही हैं. कर्जमाफी के लिए सरकार को 13000 करोड़ रुपयों की दरकार है.

इन मोर्चों पर प्रदेश बहुत पीछे

राज्य सरकार के पास सड़कों के लिए बजट नहीं है. अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि एम्बुलेंस तक समय पर नहीं मिलने के कारण ना जाने कितनी प्रसूताएं अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं. वाहन नहीं मिलने की वजह से न जाने कितने गरीबों को अपने परिजनों के शव हाथ ठेले, मोटरसाइकिल से या कंधे पर लादकर मीलों दूर ले जाने की खबरें सामने आती हैं. प्रदेश में बड़ी संख्या में स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए ना ही छत है, ना पेयजल के इंतजाम हैं, न शौचालय की व्यवस्था. हजारों की संख्या में स्कूल बंद कर जा चुके हैं. हजारों की संख्य में छात्र-छात्राओं ने अव्यवस्थाओं के चलते स्कूल जाना बंद कर दिया है. एनसीआरबी के आंकड़े उठा कर देखें तो बलात्कार, मर्डर, महिला एवं बाल अपराधों में प्रदेश लगातार अपनी बदतर स्थिति दर्शाता हुआ पहले नंबर से लेकर टॉप 5 प्रदेशों की लिस्ट में शर्म से सिर झुकाए दिखता है.

एक और महत्वपूर्ण सवाल

सरकार चाहे दिग्विजय सिंह की रही हो या उसके बाद 15 साल शिवराज सिंह चौहान की या अब कमलनाथ की, विधानसभा की बैठकें लगातार कम होती जा रही हैं. सत्तापक्ष हो अथवा विपक्ष दोनों की सदन की बैठकों में दिलचस्पी कम होती जा रही है. ऐसे में विधान परिषद बनाने से प्रदेश को कितना फायदा मिल पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है. लेकिन सियासत में शर्म होती नहीं, सरकार को शर्म आती नहीं, इसलिए वह प्रदेश की बुनियादी जरूरतों रोजगार, किसान, महिला, बच्चे, स्वास्थ्य, सडक़, राशन, पानी, बिजली जैसी सहूलियतों पर फोकस करने की बजाय विधानपरिषद के गैरजरूरी काम करने निकल पड़ी है.

इन राज्यों में है विधान परिषद लेकिन नहीं हुई कोई उल्लेखनीय प्रगति

उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे जिन आधा दर्जन सें अधिक राज्यों में विधान परिषद हैं, वहां से भी मध्यप्रदेश सबक ले सकता है. इन राज्यों में विधान परिषदों के रहते भी राज्य कोई उल्लेखनीय तरक्की नहीं कर पाए. वहां भी विधान परिषदें रूठों और चहेते निठल्ले नेताओं की पनाहगाह ही बनी हुई है.

मप्र मेें कब-कब चली कवायद

मध्य प्रदेश में विधान परिषद गठन की कोसिशों की बयार कोई पहली बार नहीं बही है. सबसे पहले 1956 में मध्य प्रदेश गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के समय विधान परिषद के गठन का संकल्प पारित हुआ, लेकिन उसके ठीक बाद सियासी उथल-पुथल, घमासान के चलते कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी. दूसरी बार मप्र में संविद सरकार के समय गोविंद नारायण सिंह के सीएम कार्यकाल के दौरान फिर 19 साल पहले मप्र के छत्तीसगढ़ के रूप में विभाजित होने के बाद उसके बाद 2003 में भाजपा की मुख्यमंत्री रहीं. सुश्री उमाभारती के रहते विधान परिषद के गठन की बात चली, लेकिन कोशिश मंजिल नहीं पा सकी. वर्ष 2003 में तो भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में विधानपरिषद के गठन का वादा भी किया था.

एक संयोग यह भी

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि दिग्विजय सिंह को छोड़ जिस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में विधान परिषद के गठन की बात चली, आगे-पीछे उसकी कुर्सी सियासी तूफान में उड़ गई.

एक सकारात्मक पक्ष भी

संविधान में विधान परिषद को संसद में राज्यसभा के समान ही विधानसभाओं के उच्च सदन जैसी मान्यता दी गई है. यह माना गया है कि सियासी दलों के नेताओं के अलावा शिक्षा, खेल, विज्ञान,साहित्य, अर्थशास्त्र, कृषि, ग्रामीण विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ चुनाव या मनोनीत विधान परिषद में पहुंचेंगे तो उनकी उपस्थिति और सुझावों से राज्य का विकास होगा, लेकिन जिन राज्यों में भी विधान परिषदें हैं, अभी तक उसके उलट राजनीतिक संतुष्टि की तस्वीर और प्रयास ही ज्यादा नजर आएं हैं.

सीएम कमलनाथ ने विधान परिषद के गठन पर दिया ये तर्क

मुख्यमंत्री कमलनाथ का तर्क ये है कि इससे राज्य का विकास होगा. विधान परिषद के गठन की सोच कोई नई नहीं है, बल्कि काफी पुरानी है. हम चाहते हैं कि लोग इससे जुड़ें, लोगों को प्रतिनिधित्व मिले, भाजपा तो बारिश का भी विरोध करती है, इसमें हम क्या कर सकते हैं. बहरहाल विधान परिषद के गठन को लेकरर मध्य प्रदेश में सियासी घमासान छिड़ा हुआ है. यह घमासान किस मुकास पर पहुंचता है, ये देखना बाकी है. अभी तो इस मसले को सरकार ने विधि विभाग के पास रायशुमारी के लिए भेज दिया है. विभिन्न विभागों के मुखिया की बैठक कर उनसे सुझाव मांगे गए हैं.

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First published: November 4, 2019, 2:47 PM IST
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