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मध्यप्रदेश में नाम बदलने की सियासत : देवी अहिल्या बाई महान थीं या मंत्रीजी के दादाजी?

मध्य प्रदेश में इन दिनों नाम बदलने की राजनीति चली हुई है.

मध्य प्रदेश में इन दिनों नाम बदलने की राजनीति चली हुई है.

Politics of Name Change-मध्यप्रदेश में शहरों, इलाकों, नदी, नालों, चौराहों के नाम बदलने की सियासत के बीच गुना में उस चौराहे तक का नाम शिवराज सरकार में एक मंत्री के दादाजी के नाम पर रख दिया गया है, जो पहले देवी अहिल्याबाई होलकर के नाम पर था. मंत्री महेन्द्र सिंह सिसौदिया अपने राजनीतिक आका ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ साल भर पहले कांग्रेस की सरकार गिराकर भाजपा में शामिल हुए थे.

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भोपाल.मध्यप्रदेश में इन दिनों शहरों, नदी, नालों, सड़क, चौराहों का नाम बदलने की जैसे होड़ लगी हुई है. मकसद सिर्फ एक है खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त साबित करना या खुद का कोई स्वार्थ साधना. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने होशंगाबाद का नाम बदलकर नर्मदापुरम(Narmadapuram)रखने का ऐलान किया है, तो उमाभारती चाहती हैं कि हलाली नदी (Halali River) का नाम बदला जाए. भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेता अपने-अपने इलाकों के नाम बदलकर नए नाम रखने की मुहिम में जुटे हुए हैं. इस मुहिम के बीच भाजपा के राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के समर्थक और दलबदल कर शिवराज सरकार में मंत्री महेन्द्र सिंह सिसौदिया ने गुना (Guna) में तो देवी अहिल्या बाई होलकर (Devi Ahilya Bai Holkar) के नाम से बने एक चौराहे का ही नाम बदलकर अपने दादाजी स्व. सागर सिंह सिसौदिया (Sagar Singh Sisodiya) के नाम पर रखवा लिया.

चौराहे के लिए जमीन दान करने वालों और स्थानीय लोगों ने जब बवाल काटा, तो चौराहे पर बदले हुए नाम का शिलालेख का फीता काटने अपने समर्थक मंत्री के साथ पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोगों को धमकाते हुए चेतावनी भी दे डाली कि शुभ कार्य में उठापटक ठीक नहीं.मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा. अब ये चौराहा ही नहीं, बल्कि न्यू टेकरी सड़क भी मंत्री जी के दादाजी के नाम से जानी जाएगी. सिंधिया ने न सिर्फ जमीन के दानकर्ताओं को फटकार लगाई, बल्कि गुना नगर पालिका परिषद से कहा कि यहां मंत्रीजी के दादाजी की प्रतिमा और उनकी इतिहास पट्टिका भी लगाई जाए.

दानदाता को सिंधिया की फटकार
ये पूरा घटनाक्रम हाल ही गुना में हुआ. जब न्यू टेकरी रोड पर सड़क और चौराहे के शिलालेख पर नामपट्टिका का अनावरण करने भाजपा के राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पहुंचे. उनके साथ दलबदल कर मप्र में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिराकर शिवराज सिंह की सरकार बनवाने वाले और वर्तमान में पंचायत मंत्री महेन्द्र सिंह सिसौदिया भी थे.इस सड़क का नाम सिसौदिया के दादाजी स्व. सागर सिंह सिसौदिया के नाम पर रखने का प्रस्ताव गुना नगर पालिका परिषद ने किया था. गुना के इस चौराहे का नाम पहले देवी अहिल्या बाई होलकर था. अहिल्या के सम्मान में चौराहे के लिए एक व्यक्ति ने अपनी जमीन दान कर दी थी. अब जब चौराहे का नाम बदलने की खबर मिली, तो जमीन का दानदाता और स्थानीय लोग 1 मार्च को कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गए और सिंधिया व समर्थक मंत्री के सामने विरोध जताने लगे. तब सिंधिया ने जमीन दान करने वालों को फटकारा और विरोध न करने के लिए चेतावनी भी दी.
महान कौन, देवी अहिल्या बाई या मंत्री जी के दादाजी?


अहिल्या बाई चौराहे का नाम बदले जाने से खफा लोग सवाल कर रहे हैं, कि मालवा साम्राज्य की साम्राज्ञी और लोकदेवी का दर्जा पाने वाली देवी अहिल्या बाई महान थीं या मंत्री सिसौदिया के दादा स्व. सागर सिंह सिसौदिया. देवी अहिल्याबाई के जीवन और गाथाओं को तो पूरा देश, दुनिया जानती है, लेकिन यह स्व. सागर सिंह सिसौदिया को बहुत कम लोग या कहें कि गुना बम्होरी के लोग ही ज्यादा बेहतर जानते होंगे. आइए हम जानते हैं कि देवी अहिल्या बाई और मंत्रीजी के दादाजी स्व. सागर सिंह सिसौदिया के बारे में...

स्व. सागर सिंह कौन थे?
ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ने और शिवराज कैबिनेट में मंत्री बनने वाले महेन्द्र सिंह सिसौदिया को सिंधिया घराने का साथ विरासत में मिला हुआ है. मंत्री सिसौदिया के दादाजी स्व. सागर सिंह सिसौदिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे और 1967 में वह स्वतंत्र पार्टी से चाचौड़ा से विधायक चुने गए थे. स्वतंत्र पार्टी ज्योतिरादित्य की दादी स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर बनाई थी. वो भी पहले कांग्रेस में थे, लेकिन कांग्रेस छोड़ विजयाराजे के साथ हो गए थे. बाद में फिर कांग्रेस के साथ रहते हुए भी उनकी नजदीकियां राजमाता के साथ बरकरार रहीं. महेन्द्र सिंह सिसौदिया की राजनीति भी ज्योतिरादित्य के पिता, पूर्व केन्द्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया की छत्रछाया में फलीफूली, फिर वह ज्योतिरादित्य के विश्वस्त हो गए.

कौन थीं देवी अहिल्याबाई होलकर
महारानी अहिल्याबाई इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं. इनका जन्म् सन् 1725 में हुआ था और देहांत 13 अगस्त 1795 को. उस दौर में अहिल्याबाई पढ़ने-लिखने लायक बनीं, जब महिलाएं स्कूल नहीं जाती थीं. सन् 1754 में पति खंडेराव और फिर 12 साल बाद ससुर मल्हारराव के निधन के एक साल बाद उन्हें भारत के मालवा साम्राज्य की मराठा होलकर महारानी का ताज पहनाया गया. रानी अहिल्याबाई ने 1795 ई. में अपनी मृत्यु पर्यन्त बड़ी कुशलता से राज्य का शासन चलाया. उनकी गणना आदर्श शासकों में की जाती है.वे अपनी उदारता और प्रजावत्सलता के लिए प्रसिद्ध हैं. वह एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं. उन्होंने खुद अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता से लड़ती थीं. वह एक मात्र ऐसी शासक थीं, जिन्होंने महिलाओं की सेना बनाई. वह हमेशा से ही अपने साम्राज्य को मुस्लिम आक्रमणकारियो से बचाने की कोशिश करती रहीं. उन्हें एक दार्शनिक रानी और धर्मपरायण स्त्री के रूप में भी जाना जाता है. देवी अहिल्या बाई के विशेष योगदान को आप इस रूप में देख सकते हैं कि उन्होंने अपने जीवनकाल में न जाने कितने युद्धों के मोर्चे संभाले. उनकी छवि एक प्रजापालक की थी. वह रोज प्रजा से मिलतीं, उनकी समस्याएं सुनती थीं. उनका मानना था कि धन, प्रजा को ईश्वर की दी हुई वह धरोहर स्वरूप निधि है, जिसकी मैं मालिक नहीं हूं.केवल प्रजाहित में उनके उपयोग की जिम्मेदार संरक्षक हूं.

अहिल्या बाई ने न केवल अपने साम्राज्य को किलों, कुएं, बावड़ियों, बाग-बगीचों से संवारा और अपनी प्रजा को समृद्ध बनाया, बल्कि अपने साम्राज्य से बाहर गुजरात के द्वारका, काशी विश्वनाथ, बनारस के गंगा घाट, उज्जैन, नासिक, विष्णुपद मंदिर और वैैजनाथ धाम आदि तीर्थस्थलों पर लोगों के रहने के लिए बहुत सी धर्मशालाएं, कुएं, बावड़ियां बनवाईं. मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा मंदिरों के तोड़े जाने की घटनाओं को देखते हुए उन्होंने सोमनाथ जी में शिव मंदिर बनवाया.जो आज भी हिन्दुओं द्वारा पूजा जाता है.

कला का गढ़ महेश्वर
रानी अहिल्याबाई ही थीं, जो अपनी राजधानी को महेश्वर ले गईं और आज ये शहर टैक्सटाइल इंडस्ट्री और मूर्तिकला, शिल्प, साहित्य, संगीत और कला का गढ़ माना जाता है. वह ऐसी महिला थीं, जिन्हें जीतेजी लोगों ने लोकमाता का दर्जा दिया था.इस महान शासिका के सम्मान और श्रृद्धांजलिस्वरूप इंदौर में हवाई अड्डे का नाम देवी अहित्या बाई होलकर हवाई अड्डा रखा गया है और इंदौर विश्वविद्यालय को देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय का नाम दिया गया है.

नाम बदलने की सियासत
मप्र में नाम बदलने की सियासत कोई नहीं बात नहीं है. इससे पहले इंदौर में सांसद शंकर लालवानी ने इंदौर के प्रसिद्ध खजराना इलाके का नाम गणेशनगर या गणेश कॉलोनी करने की मांग की थी. इस सियासत में कांग्रेस भी कभी पीछे नहीं रहीं. इंदौर के एक कांग्रेस नेता ने तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से इंदौर का ही नाम बदलकर देवी अहिल्याबाई होलकर के नाम पर किए जाने की मांग की थी. इसी तरह भोपाल के ईदगाह हिल्स इलाके का नाम बदलने की मांग उठ रही है. बता दें कि सैन्य छावनी क्षेत्र महू का नाम पहले ही बदलकर अंबेडकर नगर किया जा चुका है. अब होशंगाबाद का नाम बदलकर नर्मदापुरम किया जा रहा है. नाम बदलने की सियासत की बहती धारा में मंत्री जी भी अपने दादाजी का नाम आगे बढ़ा रहे हैं, तो इसमें हैरानी की क्या बात है?(Disclaimer-ये लेखक के निजी विचार हैं)
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