श्रीनिवास तिवारी: इंदिरा गांधी के कहने पर ज्वाइन की थी कांग्रेस, सोना गिरवी रख बने थे MLA

मध्य प्रदेश की राजनीति में 'व्हाइट टाइगर' यानी सफेद शेर के नाम से मशहूर कांग्रेस के सीनियर लीडर श्रीनिवास तिवारी की दहाड़ हमेशा के लिए खामोश हो गई

News18Hindi
Updated: January 19, 2018, 6:03 PM IST
श्रीनिवास तिवारी: इंदिरा गांधी के कहने पर ज्वाइन की थी कांग्रेस, सोना गिरवी रख बने थे MLA
Sriniwas Tiwari (File Photo)
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Updated: January 19, 2018, 6:03 PM IST
मध्य प्रदेश की राजनीति में 'व्हाइट टाइगर' यानी सफेद शेर के नाम से मशहूर कांग्रेस के सीनियर लीडर श्रीनिवास तिवारी की दहाड़ हमेशा के लिए खामोश हो गई. दो बार मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके श्रीनिवास तिवारी के नाम 1952 में सबसे कम उम्र में विधायक चुने जाने का रिकॉर्ड है. श्रीनिवास तिवारी ने लंबी बीमारी के बाद 93 साल की उम्र में अंतिम सांस ली.

श्रीनिवास तिवारी ने विद्यार्थी जीवन में स्‍वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया. सन 1948 में विंध्‍य प्रदेश में समाजवादी पार्टी का गठन किया तथा सन 1952 में समाजवादी पार्टी के प्रत्‍याशी के रूप में विंध्‍य प्रदेश विधान सभा के सदस्‍य निर्वाचित हुए. जमींदारी उन्‍मूलन के लिए अनेक आंदोलन संचालित किए तथा कई बार जेल यात्राएं की.

बताते हैं कि समाजवादी पार्टी से 1952 के प्रथम आम चुनाव में जब श्रीनिवास तिवारी को मनगवां विधान सभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया तब उनके सामने भारी आर्थिक संकट था. यह समस्या थी कि चुनाव कैसे लड़ा जाए? ऐसे में गांव के कामता प्रसाद तिवारी नाम के एक व्यक्ति उनकी मदद के लिए आगे आए थे.



उन्होंने अपने घर का सोना रीवा में 500 रुपये में गिरवी रखकर रकम श्रीनिवास तिवारी को चुनाव लड़ने के लिए सौंप दी. इसी धन राशि से चुनाव लड़ा गया और जीत हासिल की.

सन 1972 में समाजवादी पार्टी से मध्‍यप्रदेश विधान सभा के लिए निर्वाचित हुए. सन 1973 में इंदिरा गांधी के कहने पर कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए. सन 1977, 1980 एवं 1990 में विधान सभा के सदस्‍य निर्वाचित. सन 1980 में अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में लोक स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण विभाग के मंत्री रहे.

1977 में विधायक चुने जाने के बावजूद विपक्षी पार्टी की सरकार बनने की वजह से उन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिल सका. 1952 में विधायक चुने गए श्रीनिवास तिवारी पहली बार 1980 में अर्जुन सिंह मंत्रिमंडल में मंत्री पद से नवाजे गए. हालांकि, बाद में इस्तीफा देकर वह विधायक के रूप में ही सेवाएं करते रहे थे.

1985 में टिकट काटने की कवायद के बावजूद विंध्य का यह 'सफेद शेर' मुश्किलों के आगे झुका नहीं. 1990 में चुनाव जीतने के बाद वह विधानसभा उपाध्यक्ष बनाए गए. 1993 में दिग्विजय सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद 10 साल तक वह विधानसभा अध्यक्ष रहे थे. 2008 में विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन को कमजोर नहीं होने दिया था.
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