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राजनीति के संत... कैलाश जोशी

News18 Madhya Pradesh
Updated: November 24, 2019, 2:32 PM IST
राजनीति के संत... कैलाश जोशी
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी का रविवार को भोपाल में निधन हो गया. (फोटोः बीजेपी टि्वटर)

कैलाश जोशी (Former CM Kailash Joshi) भाजपा ही नहीं, मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की राजनीति के ऐसे सरल, सहज और तपोनिष्ठ राजनेता थे, जिनका अनुसरण राजनीति (Politics) और समाज के लिए आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

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सतीश

ऐसे वक्त में जब सरकार बनाने और मुख्यमंत्री बनने के लिए दल और नेता कुछ भी करने पर आमादा दिखते हैं, कैलाश जोशी (Former CM Kailash Joshi) का अवसान असल में राजनीति में शुचिता, सिद्धांतपरकता और प्रतिबद्धता के उज्ज्वल शिखर कलश का विसर्जन है. उन्हें मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की राजनीति का संत कहा जाता रहा है और वे सचमुच ऐसे थे. जब 1977 में मप्र में जनता पार्टी (Janta Party) की सरकार बनी तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उन्होंने यह पद स्वेच्छा से त्याग कर वीरेंद्र कुमार सकलेचा (Virendra Kumar Sakhlecha) के मुख्यमंत्रित्व में मंत्री बनना पसंद किया. वे मंत्री बाद में भी रहे, विधायक रहे और 2014 तक भोपाल के सांसद रहे. सादगी के पर्याय रहे और कभी भी पार्टी लाइन का उल्लंघन नहीं किया. वे दो दफा चुनाव हारे, एक दफा विधानसभा का चुनाव अपने गृह क्षेत्र बागली से और एक दफा राजगढ़ लोकसभा सीट से दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह से. लेकिन उनके सम्मान में रंच मात्र भी कमी नहीं आई.

कैलाश जोशी की खूबी यह थी कि वे भीड़ में भी आपको पहचान लेते थे. जब वे राजगढ़ से लोकसभा प्रत्याशी बनाए जा रहे थे और चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था, उन्होंने चुनौती को स्वीकार करने में एक पल भी नहीं लगाया. मुझे याद है ढाई दशक पुराना वह चुनाव अभियान. मैं कवर करने पूरे लोकसभा क्षेत्र में घूमा. प्रमुख प्रत्याशियों से बात करनी थी. जोशी एक गांव में पं. कमलकिशोर नागर के प्रवचन स्थल पर थे. करीब एक लाख लोगों की भीड़. जब वे प्रवचन स्थल से बाहर निकलकर वाहन की तरफ बढ़ रहे थे, भीड़-भाड़ में भी मुझे पहचान लिया. हाथ पकड़कर अपने साथ ले लिया और वाहन में साथ बैठाकर इंटरव्यू दिया. मैं तब नया-नया राजनीतिक संवाददाता था.

सन् 2012 में भाजपा ने उनके संसदीय जीवन के 50 बरस पूरे होने पर सम्मान किया. वे 83 वर्ष के हो रहे थे. यह आयोजन एक तरह से उन्हें चुनावी राजनीति से वानप्रस्थ की तरफ अग्रसर करने की रणनीति थी. मैंने एक दिन पहले उनका विस्तृत इंटरव्यू किया, जिसमें उन्होंने दो टूक कहा कि वे राजनीति से और चुनाव से संन्यास नहीं लेंगे, तब वे भोपाल से सांसद थे और फिर चुनाव आने वाले थे. उनको टिकट न देने की सियासी पूर्व पीठिका को उन्होंने खारिज कर दिया. हालांकि 2014 में उनका टिकट काट दिया गया, लेकिन उनके बताए नाम आलोक संजर का नाम खारिज नहीं किया जा सका.

कैलाश जोशी कहते थे कि पहले लोग समाज सेवा के लिए राजनीति में आते थे, अब नेता बनने आते हैं. वे कहते थे डिग्री नहीं, अध्ययनशीलता काम आती है. जोशी जी अध्ययनशील तो थे ही, रोजाना डायरी भी लिखते थे. इंटरव्यू के दौरान वे अपनी डायरियों से तथ्यों को कोट भी करते थे. कैलाश जोशी भाजपा ही नहीं, मप्र की राजनीति के ऐसे सरल, सहज और तपोनिष्ठ राजनेता थे, जिनका अनुसरण राजनीति और समाज के लिए आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

महत्वपूर्ण संस्मरण उन्हीं की जुबानी

मैंने अपने गृह नगर हाटपिपल्या देवास से नेपाल तक की 600 मील की पदयात्रा की. 18 सितंबर 1955 को रवाना होकर 20 नवंबर 1955 को वापस लौटा था. भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन किए. 1945 एक हाटपिपल्या में एक शिक्षक आए. वे ज्योतिष जानते धे, जब जाने लगे तो मेरा परिचय पूछा. मैंने बताया कि पिताजी की दुकान पर बैठता हूं. वे चले गए. फिर एक माह बाद उनका पत्र आया, जिसमें लिखा था, तुम पढ़ाई करो, चाहे घर से भागना पड़े. तुम्हारे हाथ में प्रदेश का यश लिखा है. उनके पत्र से मेरे जीवन की दिशा बदल गई. अन्यथा 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद मैं तो प्रचारक बनना चाहता था.
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First published: November 24, 2019, 2:31 PM IST
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