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    Opinion: ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ से निकल पाएगा कांग्रेस का मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी का रास्ता?

    कांग्रेस के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी. (File)
    कांग्रेस के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी. (File)

    Madhya Pradesh By-Election 2020: कमलनाथ (Kamal Nath) इस उपचुनाव की रणनीति खुद तैयार कर रहे हैं. सरकार में वापसी करना कमलनाथ के लिए आसान काम नहीं है. सत्ता में वापसी के लिए उन्हें पूरी 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव जीतना होगा.

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    कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण के बीच मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया गया है. उपचुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के मजबूत गढ़ को भेदकर प्रदेश की सत्ता में वापसी करना कांग्रेस और कमलनाथ दोनों के लिए ही आसान काम नहीं है. कोरोना के कारण कम मतदान की संभावना भी बनी हुई है. जिन 28 सीटों पर उपचुनाव होना है, उसमें सबसे ज्यादा 16 विधानसभा ग्वालियर-चंबल (Gwalior-Chambal) संभाग की हैं. मध्य प्रदेश का यह इलाका सिंधिया राज परिवार के प्रभाव वाला है. पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस पार्टी छोड़ने के कारण ही राज्य की कमलनाथ (Kamal Nath) सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी. मार्च में सिंधिया के साथ कुल 22 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था. वर्ष 2018 में हुए विधानसभा के आम चुनाव में इस इलाके में भारतीय जनता पार्टी को भारी नुकसान हुआ था. इलाके की 34 में 27 सीटें कांग्रेस को मिली थीं. इसकी बड़ी वजह सिंधिया के मुख्यमंत्री बनने की संभावना रही. कमलनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने के कारण अंचल का वोटर निराश हुआ.

    कांग्रेस के लिए चुनौती बनी है सिंधिया-शिवराज की जोड़ी
    सिंधिया के भाजपा में चले जाने के बाद कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है. धीरे-धीरे कमलनाथ कांग्रेस पार्टी के क्षत्रपों को अलग-थलग करते जा रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी और अजय सिंह जैसे नेता चुनाव मैदान में नजर ही नहीं आ रहे हैं. पिछले दिनों कमलनाथ ने ग्वालियर में रोड शो किया था. इस रोड शो में अंचल के कद्दावर नेता डाॅ. गोविंद सिंह की अनुपस्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि कांग्रेस में अभी भी स्थितियां ठीक नहीं हैं. कमलनाथ के साथ पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव जरूर मौजूद थे. यह माना जा रहा है कि कमलनाथ अंचल के यादवों को साधने के लिए ही अरुण यादव को चेहरे के तौर पर साथ रख रहे हैं. कमलनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती ज्योतिरादित्य सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान की जुगलबंदी है. सिंधिया-शिवराज लगातार उपचुनाव वाले क्षेत्रों में दौरे भी कर रहे हैं. मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता सैयद जाफर कहते हैं कि निश्चित तौर पर कांग्रेस गुटबाजी के लिए बदनाम है, लेकिन उपचुनाव में सत्ता में वापसी के लिए सभी एक साथ काम कर रहे हैं.

    अन्य दलों के रूठों के भरोसे मैदान में कांग्रेस
    ग्वालियर-चंबल अंचल में ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस पार्टी का सबसे मजबूत चेहरा थे. उनके भाजपा में जाने के बाद अंचल में चुनाव में टक्कर दे सकने वाले चेहरों का टोटा साफ दिखाई दे रहा है. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता आशीष अग्रवाल कहते हैं कि कांग्रेस उधार के नेताओं के भरोसे चुनाव मैदान में है. अग्रवाल का दावा है कि अंचल के 70 हजार से अधिक कार्यकर्ता सिंधिया के साथ भाजपा में गए हैं. कांग्रेस ने 24 विधानसभा सीटों के लिए जो अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं इनमें नौ उम्मीदवार ऐसे हैं जो विधानसभा के आम चुनाव में भाजपा अथवा बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पराजित हो चुके हैं. ग्वालियर पूर्व में सतीश सिकरवार और सुमावली में अजब सिंह कुशवाहा ऐसे ही चेहरे हैं.



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    सिंधिया के खास मंत्रियों पर फोकस कांग्रेस की रणनीति
    मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ इस असाधारण उपचुनाव की रणनीति खुद तैयार कर रहे हैं. सरकार में वापसी करना कमलनाथ के लिए आसान काम नहीं है. सत्ता में वापसी के लिए उन्हें पूरी 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव जीतना होगा, जबकि भारतीय जनता पार्टी नौ सीटें जीतकर भी सरकार बचा सकती है. विधानसभा में भाजपा के कुल विधायकों की संख्या 107 है. साधारण बहुमत से सरकार बनाने के लिए 116 की संख्या चाहिए. कमलनाथ की रणनीति सरकार बनाने के बजाए सिंधिया को शिकस्त देने की ज्यादा दिखाई दे रही है. उन्होंने सिंधिया के कट्टर समर्थक चेहरों को घेरने की तैयारी की है. अधिकांश चेहरे शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में सदस्य हैं. इन चेहरों में तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत, डाॅ. प्रभुराम चौधरी, इमरती देवी प्रमुख हैं. ये चेहरे कमलनाथ मंत्रिमंडल में भी मंत्री थे.

    सिंधिया के लिए दोहरी चुनौती वाले हैं उपचुनाव
    मध्य प्रदेश में उपचुनाव के लिए वोट 3 नवंबर को डाले जाएंगे. इस उपचुनाव में सिंधिया के सामने दोहरी चुनौती है. पहली चुनौती इलाके में अपना वर्चस्व साबित करने की है. दूसरी चुनौती उन्हें भारतीय जनता पार्टी के भीतर से ही मिल सकती है. कांग्रेस प्रवक्ता सैयद जाफर कहते हैं कि सिंधिया के भाजपा में चले जाने से वहां का स्थानीप नेतृत्व असहज है. हर नेता को अपना भविष्य खतरे में नजर आ रहा है. ऐसे नेता कभी नहीं चाहेंगे कि उपचुनाव में सिंधिया समर्थकों की जीत हो? दूसरी और सिंधिया तेजी से भाजपा की रीति-नीति सीखने की कोशिश कर रहे हैं. सिंधिया ने अपने समर्थकों को भी साफ तौर पर कह दिया है कि वे भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं से तालमेल बैठाकर चलें.

    तो दो मंत्रियों को छोड़ना पड़ सकती है कुर्सी
    विधानसभा के उपचुनाव में देरी होने के कारण शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल के दो सदस्य तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत को अपने प्रचार अभियान के बीच में ही मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा. सिलावट और राजपूत दोनों ही विधायक नहीं हैं. संवैधानिक प्रावधानों के तहत मंत्री पद पर बने रहने के लिए छह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होना जरूरी है. सिलावट और राजपूत 21 अप्रैल 2020 को मंत्री बनाए गए थे. 20 अक्टूबर से पहले उन्हें विधायक बनना था. उपचुनाव के लिए अधिसूचना 9 अक्टूबर को जारी होगी. 10 नवंबर को चुनाव परिणाम आएंगे.
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