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OPINION: आख़िर क्यों फेल हुई कांग्रेस- बसपा गठबंधन की डील

फाइल फोटो.

फाइल फोटो.

मसला सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं था. बसपा छत्तीसगढ़, राजस्थान में भी बराबरी की हिस्सेदारी चाह रही थीं. कांग्रेस के लिए यह संभव नहीं था.

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कांग्रेस के साथ महागठबंधन की उम्मीदों को फेल करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में कहा जा रहा है कि वे इन दिनों कई किस्म के दबाव में हैं. कानूनी मामले और यूपी में बदलती दलित सियासत ने उनके कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के रास्ते बंद कर दिए हैं. कांग्रेस को झटका देकर एक तरह से बसपा ने बीजेपी की राह को आसान कर दिया है.

कमलनाथ संपर्क में थे
यह सिर्फ एक महीने में तेजी से बदलते घटनाक्रम का नतीजा है कि बसपा ने कांग्रेस को करारा झटका दे दिया है. वरना रियल पॉलिटिक के मास्टर माने जाने वाले कांग्रेस नेता कमलनाथ और कांग्रेस के आला नेता लगातार बसपा सुप्रीमो मायावती से बात कर रहे थे और गठबंधन का रास्ता लगभग तय हो चुका था. मध्यप्रदेश में 22 विधानसभा उम्मीदवारों की घोषणा और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी से गठबंधन कर मायावती ने 2019 की दिशा तय कर दी है.

सभी राज्यों में बराबरी चाहिए थी
कांग्रेस के एक वरिष्ठ सूत्र का दावा है कि मसला सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं था. बसपा छत्तीसगढ़, राजस्थान में भी बराबरी की हिस्सेदारी चाह रही थी. कांग्रेस के लिए यह संभव नहीं था. सुप्रीम कोर्ट में मायावती के वकील और बसपा के समर्थन से ही यूपी से राज्यसभा पहुंचे कपिल सिब्बल ने आखिरी बातचीत इस बारे में की थी. और इस बात को लेकर कांग्रेस का पक्ष रखा था कि हर राज्य की राजनीतिक स्थितियां देखकर ही समझौता होगा. लेकिन बसपा इस पर सहमत नहीं हुई.

अपने ही गढ़ में चुनौतियां
वरिष्ठ सूत्र बताते हैं कि 62 वर्षीय मायावती यूपी के अपने मजबूत गढ़ में राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं. पिछले तीन दशकों से देश में दलित पावर का केंद्र रही बीएसपी को अब वहां अन्य दलित नेताओं से चुनौती मिल रही है. इनमे सबसे उभरता नाम चंद्रशेखर का है. सहारनपुर में दलित-सवर्णों संघर्ष के बाद सुर्खियों में आए चंद्रशेखर हाल ही में जेल से बाहर आए हैं. उनकी भीम आर्मी सेना को युवा दलितों का समर्थन है. इस भीम आर्मी सेना का ही परिणाम है कि आम तौर पर सिर्फ चुनावी सभाओं में जनता के बीच जाने वाली बसपा सुप्रीमो सहारनपुर में पीड़ितों से मिलने पहुंची.

भीम आर्मी सेना पर आरोप
चंद्रशेखर के रिहा होने के बाद मायावती उन पर आरोप लगा रही हैं कि भीम आर्मी सेना और भाजपा के बीच छिपा हुआ करार है. चंद्रशेखर इन आरोपों से इनकार कर रहे हैं. लेकिन जिस तरह से मायावती की तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं वह नई राजनीतिक चुनौती समझने के लिए काफी है. मायावती 2019 की संभावनाओं को देखते हुए अपने सारे विकल्प खुले रखना चाहती हैं.

भाजपा के साथ भी जा सकती है
एक चर्चा यह भी है कि कांग्रेस का साथ नहीं देकर अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी को मदद कर रही बसपा 2019 के चुनाव में सीधे तौर पर एनडीए का सहयोगी दल भी बन सकती है. दरअसल बसपा 2014 के बाद से ही बुरे दौर में है. मोदी- शाह के तूफान ने यूपी से बीएसपी का पूरा सफाया कर दिया. लोकसभा की एक भी सीट मायावती के पास नहीं है. विधानसभा चुनाव में भी सिर्फ 19 सीटें जीतकर बसपा ने अपनी राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा जैसे तैसे बचाया है.

सशक्त भूमिका
मायावती सत्ता की राजनीति के करीब रहने और फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं. कर्नाटक चुनाव में जिस तरह जेडीएस को समर्थन देकर मायावती ने अपने वोट ट्रांसफर करवाए. वो ऐसी ही सशक्त भूमिका अब केंद्र की राजनीति में भी चाहती हैं.

सवर्ण वोट पर नज़र
मध्यप्रदेश में बसपा के इस झटके को लेकर कांग्रेस नेताओं की अलग–अलग राय है. एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि सवर्ण आंदोलन को देखते हुए यह गठबंधन नहीं होना कांग्रेस के लिए फायदेमंद होगा. कुछ नेता कर्नाटक का उदाहरण देते हैं कि वहां भी कांग्रेस और बसपा विरोध में थे लेकिन भाजपा वहां सरकार नहीं बना पाई. यहां भी चुनाव बाद गठबंधन हो सकता है. संगठन से जुड़े एक नेता का तो यहां तक कहना है कि बसपा ने उम्मीदवारी तो जाहिर कर दी है, लेकिन अब यह भी देखना होगा कि वह किस जोश या ताकत के साथ प्रचार में उतरती है.

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