क्लेम का खेल: कोरोना मरीजों ने बिल भरा 375 करोड़, बीमा कंपनियों ने दिए 11.65 करोड़, जानिए इसके पीछे की वजह

मध्य प्रदेश में हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां लोगों का मेडिक्लेम देने से बच रही हैं. उनका कहना है कि अस्पतालों ने जबरदस्ती मरीजों को भर्ती कर लिया.(File)

मध्य प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर (Corona Second Wave) आफत बनकर आई. कई लोगों की जान चली गई. कई लोगों पर लाखों का कर्जा हो गया. अब लोग बीमा कंपनियों के चक्कर काट रहे हैं. बीमा कंपनियां बहाना बनाकर उनका क्लेम कैंसिल कर रही हैं.

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    भोपाल. कोरोना संक्रमण की जानलेवा दूसरी लहर (Corona Second Wave) का शिकार बने हजारों लोग अब करोड़ों रुपयों के लिए बीमा कंपनियों का चक्कर लगा रहे हैं. इन लोगों ने अस्पतालों में करीब 375 करोड़ का बिल भरा, लेकिन कंपनियों ने महज 11.65 करोड़ का ही भुगतान किया है. 363 करोड़ की राशि न केवल अटक गई है बल्कि बीमा कंपनियां खुद चाहती हैं कि ये राशि न देनी पड़े.

    भोपाल से प्रकाशित दैनिक भास्कर अखबार के मुताबिक, बीमा कंपनियां माइल्ड कंडीशन को आधार बनाकर क्लेम को सीधे तौर पर ठुकरा रही हैं. ऐसे असंतुष्ट ग्राहक अब बीमा कंपनियों के शिकायत निवारण सेल, बीमा लोकपाल और उपभोक्ता फोरम जा रहे हैं. ये वे लोग हैं जिनके क्लेम बीमा कंपनियों ने सीटी स्कोर के आधार पर ठुकराए. कपनियों ने तर्क दिया कि इतने कम सीटी स्कोर पर तो अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत ही नहीं थी. पॉलिसीधारक घर में ही ठीक हो सकता था.

    पूरे प्रदेश से पहुंची 5 हजार शिकायतें

    जानकारी के मुताबिक, पूरे प्रदेश से बीमा कंपनियों के पास हेल्थ कवर से जुड़ी 5 हजार शिकायतें पहुंची हैं. इनमें से 1100 शिकायतें भोपाल से हैं. बीमा लोकपाल सूत्र बताते हैं कि उनके पास 35 शिकायतें आई हैं. इन शिकायतों में सीटी स्कोर 5 से कम होने पर क्लेम ठुकरा दिए गए हैं. बता दें, नियमानुसार पॉलिसीधारकों को सबसे पहले बीमा कंपनियों के शिकायत निवारण सेल में शिकायत करके उसके निपटारे के लिए 15 दिन का समय देना होता है. इसके बाद ही शिकायत बीमा लोकपाल और उपभोक्ता फोरम में दर्ज की जाती है.

    इस तरह काटी क्लेम की राशि और बढ़ाया खर्च

    पॉलिसीधारकों और बीमा विशेषज्ञों ने बताया कि जिनका सीटी स्कोर मॉडरेट या सीवियर था, उनके क्लेम में भी 70% की कटौती की गई. भोपाल सहित प्रदेश के कई निजी अस्पतालों ने कोरोना पैकेज बना दिए थे. लेकिन, इलाज कराने वालों को खर्च का ब्रेकअप नहीं दिया. इस आधार पर बीमा कपंनियों ने क्लेम ठुकरा दिए. जब ग्राहक वापस इन अस्पतालों में गए तो उन्होंने ब्रेकअप देने से ही मना कर दिया.

    ये कहती है कि जनरल इंश्योरेंस काउंसिल

    जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के सेक्रेटरी एम.एन. शर्मा ने कहा कि माइल्ड कंडीशन वाले पेशेंट को अस्पतालों ने जबरन भर्ती किया. हजारों के बिल बनाए. बीमा कंपनियां मेरिट पर ही कवर देती हैं. कोरोना पैकेज में इलाज कराने वाले पॉलिसीधारकों को अस्पतालों ने इलाज का ब्रेकअप ही नहीं दिया. ऐसे में उन्हें कवर कैसे दिया जा सकता है.

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