भोपाल: ये हैं रियल कोरोना वारियर्स, देश की सेवा के लिये अपनी 7 माह की बच्ची से रह रहे हैं दूर
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भोपाल: ये हैं रियल कोरोना वारियर्स, देश की सेवा के लिये अपनी 7 माह की बच्ची से रह रहे हैं दूर
भोपाल का डॉक्टर दंपती देश की सेवा के लिये अपनी 7 माह की बच्ची से रह रहा है दूर (फाइल फोटो)

जेपी अस्पताल (JP Hospital) में ड्यूटी कर रहीं डॉ. अंशुली मिश्रा कहती हैं कि इस जंग को जीतने के लिए मैं और मेरे पति डा. संतोष मिश्रा अपने चिकित्सक धर्म का पालन कर रहे हैं.

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  • Last Updated: April 20, 2020, 4:30 PM IST
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भोपाल. कोविड-19 (COVID-19) की वैश्विक महामारी की जंग को लड़ने के लिए आज पूरा देश एक साथ है. इस संक्रमण को रोकने के लिए समाज के हर वर्ग,समुदाय और प्रोफेशन के लोग अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं. इस जंग में फ्रंट फुट पर खड़े होकर कोरोना के खिलाफ खोले मोर्चे पर स्वास्थ्य अमला मुस्तैदी के साथ तैनात होकर अपना फर्ज निभा रहा है. डॉक्टर (Doctor) बनते वक्त डॉक्टर ये शपथ लेते हैं की हर परिस्थिती में वो चिकित्सक धर्म का पालन करेंगे. मरीज की जान बचाने का हर प्रयास करेंगे. चिकित्सक बनते वक्त ली इस शपथ का कई डॉक्टर पालन कर रहे हैं. राजधानी भोपाल में भी एक दंपती रियल कोरोना वारियर्स की भूमिका निभा रहे हैं. डॉ. अंशुली मिश्रा और उनके पति डा. संतोष मिश्रा अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी सात महीने की बच्ची को उसके ननिहाल में छोड़ दिया और खुद लोगों की जान बचाने मैदान में डट खड़े हुए.

कर्तव्य निभाने के लिये जज्बातों को छोड़ा
राजधानी में कोरोना का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच शहर में बढ़ते कहर को रोकने के लिए मिश्रा दंपती ने जनहित की भावना के साथ काम करने लगे हुए हैं. अंशुली मिश्रा और उनके पति डा. संतोष मिश्रा दोनों ही हमीदिया में डॉक्टर हैं. जेपी अस्पताल में ड्यूटी कर रहीं डॉ. अंशुली मिश्रा कहती हैं कि इस जंग को जीतने के लिए मैं और मेरे पति डा. संतोष मिश्रा अपने चिकित्सक धर्म का पालन कर रहे हैं. उनका काम पॉजीटिव मरीज के संपर्क में आए लोगों के घर जाकर उनकी जांच करना है. अंशुली ने बताया की पति-पत्नी दोंनो हाई रिस्क जोन में है. इन हालातों में सात महीने की बेटी को अपने साथ रखना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है. बेटी की देखभाल होती रहे इसलिए उसे 300 किमी दूर नानी के पास जबलपुर में छोड़ दिया है. माता-पिता को अपनी छोटी बच्ची की फिक्र होती है. उन्हें अपनी नन्ही बिटिया की याद भी आती है. लेकिन उससे अधिक अपनी जिम्मेदारी का अहसास रहता है. उन्होंने बताया कि दूध पीती बच्ची को छोड़कर लोगों की सेवा करने में लगी हैं ताकि इस जंग को जीता जा सके.

वीडियो कॉल से बेटी को देख मिलती है सकारात्मक उर्जा
डॉ. अंशुली ने बताया कि जब बेटी की याद आती है तो आँखों में आंसू आ जाते हैं. लेकिन फिर लाखों लोगों के जीवन और कोरोना के बढ़ते खतरे के बारे में सोचकर अपने मायके में वीडियो कॉल कर लेती हैं. बेटी की सूरत देख लेती कर उन्हें सकारात्मक उर्जा मिलती है. मिश्रा दंपती का कहना है की वो चाहते हैं​ इस मुश्किल से लड़ कर वो अपनी बेटी को भी ये सीख दें सकें की कैसे समाज के हित में काम कर अपना और अपने परिवार का नाम रौशन किया जाता है और जिम्मेदारी निभाने की कसौटी पर खरा उतरा जाता है.



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