लाइव टीवी
Elec-widget

इन होनहार बेटियों ने मिटाया चंबल पर लगा दाग़, इलाके को दिलायी नयी पहचान

Anil Sharma | News18 Madhya Pradesh
Updated: November 30, 2019, 7:04 PM IST
इन होनहार बेटियों ने मिटाया चंबल पर लगा दाग़, इलाके को दिलायी नयी पहचान
बेटियों ने बदली चंबल की तस्वीर

भिंड (bhind) जहां कभी लड़कियों को कोख में ही मार दिया जाता था वहीं अब एक ही गांव की आठ बेटियों ने पुलिस (police) सेवा में भर्ती होकर अपने गांव के साथ साथ ही ज़िले का भी नाम रौशन किया.

  • Share this:
भोपाल.बीहड़,डकैत और कन्या भ्रूण हत्या (Rugged, dacoit and female feticide) के लिए बदनाम चंबल (chambal) इलाके की बेटियां (daughters) अब इलाके को नयी पहचान दे रही हैं. इस इलाके पर लगे दाग़ को मिटा रही हैं. वो समाज (socity) को जगा भी रही हैं और कानून अपने हाथ में लेने वालों को सबक सिखाने के लिए भी तैयार हैं. कुख्यात चंबल अब वो पुराना चंबल नहीं रहा.कुछ ऐसी ही बेटियों के बारे में इस रिपोर्ट में जानिए.

बात करते हैं भिंड ज़िले के एक छोटे और गुमनाम से गांव बंथरी की.ये वो गांव है जहां की 8 बेटियां अब मध्य प्रदेश पुलिस में हैं.ये पिछले तीन साल के दौरान पुलिस में आरक्षक से लेकर निरीक्षक तक के पद पर भर्ती हुई हैं.

बदल दी तस्वीर
मध्य प्रदेश का भिंड ज़िला भ्रूण हत्या के लिए लंबे समय तक बदनाम रहा.लड़का-लड़की के अनुपात का अंतर भी यहां सबसे ज़्यादा रहा. यानि लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम रही.लेकिन अब यहां की तस्वीर बदल रही है.जहां कभी लड़कियों को कोख में ही मार दिया जाता था वहीं अब एक ही गांव की आठ बेटियों ने पुलिस सेवा में भर्ती होकर अपने गांव के साथ साथ ही ज़िले का भी नाम रौशन किया.

एक गांव की 8 बेटियां
शायद ही ऐसा कोई गांव हो जिसमें एक ही गांव से इतनी संख्या में बेटियां देश सेवा-जन सेवा कर रही हों.इन बेटियों की हौसला अफजाई करने के साथ ही समाज के अन्य तबकों के लोगों को भी भ्रूण हत्या रोकने एवं बेटियों को आगे बढ़ने का संदेश देने के लिए मिहोना नगर परिषद ने हाल ही में इनका सम्मान किया. प्रदेश के मंत्री गोविंद सिंह खुद यहां आए और बेटियों को इन बेटियों को प्रशस्ति पत्र दिए.

बेटियां जिन पर नाज़ है
Loading...

बंथरी गांव की त्रिवेणी राजावत, कीर्ति राजावत, शिवानी राजावत अब सब इंस्पेक्टर हैं. इनके साथ गीता राजावत,शिवानी जादौन और रुचि राजावत सहित दो अन्य आरक्षक हैं. मंत्री डॉ गोविंद सिंह ने कहा, बेटियों की शिक्षा और उनके सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी.बंथरी गांव के विकास के लिए उन्होंने दस लाख रुपए भी मंज़ूर किए.

आशा दीदी
अब बात मुरैना की एक बेटी जिन्हें लोग आशा दीदी कहने लगे हैं. एक बागी की पोती और बेटी आशा सिकरवार ने कोख़ में क़त्ल के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और बदलाव लाकर ही सांस ली. उन्होंने लगभग 10 साल तक चंबल के बीहड़ में घर-घर जाकर कोख में बेटियों की हत्या करने के ख़िलाफ लोगों को समझाया. बेटियों का महत्व समझाया. उन्हें लोगों ने नकारा, धमकाया लेकिन उनका तो नाम ही आशा है. इसलिए उन्होंने बेटियों के प्रति लोगों की सोच में बदलाव की आशा नहीं छोड़ी.

पुरस्कार और सराहना
पेशे से वकील आशा सिकरवार ने अपने करियर को एक तरफ छोड़ा और कोख में कत्ल करने वालों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी. इसके बाद वर्ष 2005 में लिंगानुपात में 1000 के मुकाबले जहां 635 बेटियां थीं वो 2015 - 16 में बढ़कर 850 के करीब पहुंच गई. आशा दीदी के काम को देशभर में सराहा गया. उन्हें कई पुरस्कार मिले.

दादा-पापा थे बाग़ी
आशा सिकरवार के दादा सिंधिया रियासत में बाग़ी थे. बागी डूंगर बटरी के नाम से आशा के दादा को लोग जानते थे. उनके फैसले के आगे कोई आवाज़ नहीं उठा पाता था. वो साहूकारों को लूट कर वो पैसा गरीबों में बांट देते थे. आशा के पिता परशुराम भी बाग़ी हुए. उन्होंने भी अपने पिता के पद चिन्हों पर चलकर गरीबों की बेटियों की शादी और सुरक्षा दिलवायी.

कानून के साथ आशा
आशा जब छोटी थीं तो दादा की कहानी और पिता के काम देखे. लेकिन उन्होंने तय किया कि कानून तोड़कर नहीं बल्कि कानून के साथ मिलकर गरीबों और बेबसों की मदद करेंगी. यही उन्होंने किया भी.

ये भी पढ़ें-हैदराबाद गैंगरेप : MP की पुलिस अफसर की अपील-समाज बेटों को अच्छे संस्कार दे...

झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के बाद अब अलीराजपुर की पंजा दरी का होगा पेटेंट!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए भोपाल से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 30, 2019, 7:04 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...