“ऐसी जगह जहां हीरा किस्मत ही नहीं चमकाता, ग्रहण भी लगाता है”

हीरा कई बार किस्मत चमकाता नहीं चमक खत्म भी कर देता है.

किसान चाहते तो हैं कि हीरा निकालकर रातों-रात लखपति बन जाएं लेकिन होता उसका उल्टा है. किसान इसकी चाहत में कई बार इतना कर्ज ले लेते हैं कि हीरा मिलने के बाद भी उसे चुकाया नहीं जा सकता है. यह सत्य है और हीरे की खान का दूसरा स्याह पहलू भी है.

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भोपाल/पन्ना. “किसान को 90 लाख का हीरा मिला, खुल गई किस्मत,” “60 लाख के हीरे से चमकी किसान की किस्मत...” एसी खबरें पढ़कर हर आदमी का मन करता है कि काश उसका भी कहीं से एसा जैकपॉट लग जाए और उसकी पूरी पुश्तें आराम से रहें। वहीं, जहां से यह हीरा मिलता है उस जगह के किसान और उनके परिवार तो दिन-रात सपना ही यही देखते हैं कि काश उन्हें रोज कहीं न कहीं से एक हीरा मिल जाए. लेकिन हीरा मिलने और किस्मत चमकने की हकीकत के पीछे एक काला स्याह पहलू और भी है, और वह पहलू है किसान की गरीबी या उसकी बर्बादी का.

हीरा हर बार किसान की किस्मत नहीं चमकाता, बल्कि कई बार उसकी अच्छी चल रही किस्मत पर ग्रहण भी लगा देता है. हीरों की धरती पन्ना में एसी कई “किसान” कहानियां हैं जो इस बात का सबूत हैं कि हीरों की चाहत ने उन्हें कैसे जमीन पर ला दिया, कैसे कर्ज में डुबो दिया. सामाजिक बंधनों के कारण ये किसान समाज के सामने तो नहीं आते, लेकिन उनकी कहनियां जगह-जगह इस बात को दोहराती फिरती हैं कि हीरे की चाहत तो रखो, लेकिन उसकी चमक में खो मत जाओ.  पन्ना में हर तीन महीने में हीरों का ऑक्शन होता है और हर बार एक नई कहानी देखने-सुनने को मिलती है.

इस तरह कर्ज में डूबते हैं किसान

हीरों की खदान पन्ना में हजारों किसान (या यूं कहें कि सभी) एसे हैं जिन्होंने अपने-अपने खेतों को खदानी के लिए रखा हुआ है. ये दिन-रात खेतों की खुदाई करते हैं, इस सपने के साथ कि उन्हें एक न एक दिन लाखों का हीरा मिल जाएगा. नाम न छापने की शर्त पर एक किसान बताते हैं कि किसानों में हीरों का कई बार इतना जुनून चढ़ जाता है कि वे साहूकारों के पास से 10 फीसदी से ज्यादा दर पर कर्ज ले लेते हैं. अंत में पता चलता कि अगर हीरा मिला भी है तो वो इतना कीमती नहीं है कि उसका कर्ज सालों तक उतार सके. अगर मान लिया जाए कि 2000 किसान खेतों में खदान लगा रहे हैं तो औसतन हीरा मिलता है 2 किसानों को. कर्जा वे घर चलाने के लिए लेते हैं, क्योंकि उनके खेत की तो खुदाई हो रही है और फसल उन्हें उगाना नहीं है. इस तरह हीरे की चाहत उन्हें बर्बादी की ओर ले जाती है.

ऑक्शन पेंडिंग से भी किसान को होती है परेशानी

जानकारी के मुताबिक, किसान की परेशानी और कर्ज का एक कारण हीरे के ऑक्शन का पेंडिंग रह जाना भी है. दरअसल किसान को जब हीरा मिलता है तो वह उसे लेकर सीधा डायमंड ऑफिस जाता है. यहां सरकारी वैल्यूअर बैठता है जो डायमंड ऑफिसर को बताता है कि इस हीरे की कीमत इतनी है. वैल्यूअर ऑफिसर के सिवा किसी ओर को हीरे की कोई जानकारी नहीं देता. अब जब इस हीरे की नीलामी होती है तो कई बार ये बिना बिके ही रह जाता है. क्योंकि, व्यापारी हीरे की वो कीमत नहीं लगाते जो वैल्यूअर ने तय कर रखी है. यानी वो हीरा तब तक नहीं बिकेगा और उसका ऑक्शन पेंडिंग रहेगा, जब तक उसकी सही कीमत डायमंड ऑफिसर को नहीं मिल जाती. ये वक्त 3 महीने का भी हो सकता है और 9 महीने का भी. इस वक्त के बीच किसान अपना घर चलाने के लिए साहूकारों से कर्ज लेता है.

एक पारिवारिक मजबूरी एसी भी

ऑक्शन पेंडेंसी खत्म होने का इंतजार कर रहे किसान की एक और अजीब सी पारिवारिक मजबूरी होती है. जब उसे हीरा मिलता है तो उसकी बेटी के लिए रिश्ते अच्छे घरों से आना शुरू हो जाते हैं और एसे में अगर वो समय पर रिश्ता नहीं करता तो वो परिवार हाथ से निकल जाते हैं. इस मजबूरी के चलते वह हीरे के ऑक्शन होने तक साहूकारों या बाजार से भारी कर्जा उठा लेता है और बेटियों की शादी करता है. इस दौरान कई साहूकार भी हीरा जीतने वाले किसान को किसी न किसी बहाने कर्ज देने के लिए तैयार रहते हैं या यूं कहें कि उसे अपने जाल में फंसा लेते हैं.

डायमंड मर्चेन्ट का सिंडिकेट

जानकार बताते हैं कि जो भी व्यापारी यहां हीरा खरीदने आते हैं उनके बीच एक सिंडिकेट बन जाता है. ये सारे व्यापारी तय करके आते हैं कि हीरे का दाम एक तय कीमत पर ही रखेंगे उससे ज्यादा उसकी बोली नहीं लगाएंगे, भले ही डायमंड ऑफिसर ज्यादा कीमत लगाकर बैठा हो. एसे में होता ये है कि एक करोड़ का हीरा कई बार 50 लाख में बिकता है. फिर यही व्यापारी किसी जगह आपस में उस हीरे का सौदा करते हैं और प्रोफिट को वहां मौजूद सारे व्यापारियों के बीच बांट लेते हैं. मान लीजिए व्यापारियों में से किसी ने हीरा 80 लाख की लिया तो वो प्रोफिट का कुछ हिस्सा वहां बैठे सभी व्यापारियों में बांटेगा. इस तरह न सरकार को सही कीमत मिलती है और न किसान को.

इस तरह आप ले सकते हैं सरकारी और निजी खदान

पन्ना में हीरे निकालने के लिए खदान लेना कोई बड़ी बात नहीं है. कोई भी व्यक्ति जिसके पास नेशनेलिटी की आईडी है वह यहां स्थित डायमंड ऑफिस में आवेदन दे सकता है. इसके बाद सरकार के पास जहां भी 25x25 की जगह होगी वहां उसे खुदाई के लिए जमीन मिल जाएगी. इसकी फीस भी मात्र 200 रुपए ही है. इस जमीन पर व्यक्ति खुदाई करता है और अपनी किस्मत आजमाता है. वहीं निजी के लिए व्यक्ति को वहां के किसी एसे किसान से संपर्क करना होता है जो खदान के लिए खेती की जमीन दे सके. वह 50 रुपए के शपथ-पत्र पर जिसे चाहे उसे खुदाई का काम दे सकता है. इसके लिए किसान कोई भी शर्त रख सकता है. या तो वह बराबर प्रोफिट की बात करेगा या एक मुश्त रुपये ले लेगा और बाकी किस्मत का खेल. इसमें भी कई बार किसान को नुकसान हो जाता है.

नकली खदानों से भी होता है कारोबार

बताया जाता है कि पन्ना में सरकारी खदान केवल राजस्व विभाग की जमीन पर ही लगाई जा सकती है. ये जमीन करीब-करीब पूरी तरह खोद दी गई हैं. इसलिए जब लोगों को जमीन नहीं मिलती तो वे चोरी का रास्ता अपनाते हैं. ये लोग घन जंगलों में वन विभाग की जमीनें खोदते हैं. इस दौरान उन्हें जो हीरा मिलता है उसे वे उस व्यापारी के पास बेच देते हैं जो दो नंबर में माल खरीदता है. हालांकि, दो नंबर में खुदाई करने वाले को मुनाफा ज्यादा नहीं मिलता. बताया जाता है कि गौंड आदिवासी इस तरह का काम करते हैं और उनके लिए जरा से रुपए ही बहुत होते हैं.

पन्ना में जगह-जगह क्यों मिलते हैं हीरे

पन्ना को लेकर एक किवदंती है कि 400 साल पहले जब यहां राजा छत्रसाल का राज हुआ करता था, तब एक प्राण नाथ संत उनके पास आए थे. राजा ने उनकी बहुत सेवा की. उनकी सेवा से प्रसन्न प्राण नाथ ने उन्हें वरदान दिया – “छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय, जित-जित घोड़ा पग धरै, उत-उत हीरा होय” इसका अर्थ है कि हे छत्रसाल तुम्हारे राज में घोड़ा जहां-जहां पैर रखेगा, वहां-वहां से हीरे जवाहरात मिलेंगे.

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