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डॉक्टरों की जिद्द!, हर्जाना भर देंगे, लेकिन गांवों में नहीं करेंगे नौकरी

मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले स्टूडेंय को डिग्री के बाद एक साल की नौकरी ग्रामीण क्षेत्र में करने का बॉंड एडमिशिन के समय भरना होता है. ऐसा नहीं करने पर 8 लाख रुपये जमा कराने होते हैं.

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मध्यप्रदेश के कोर एरिया में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग निजी डॉक्टरों की सहायता लेगा. इसके तहत ग्रामीण इलाकों में इन डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाएगी. इन डॉक्टरों की जिद है कि नई सरकार ने चिकित्सा विभाग की पुरानी नीति नहीं बदली, तो ग्रामीण क्षेत्रों में लगी ड्यूटी के एवज में वे हर्जाना भर देंगे और नौकरी छोड़ देंगे, लेकिन गांव में नौकरी करने के लिए नहीं जाएंगे. चिकित्सकों का कहना है कि सरकार काम के बदले वाजिब रुपये नहीं देती और न ही बेहतर कार्य करने वालों को पुरस्कृत करती है. देश की 69 फीसदी आबादी गांवों में रहती है, जबकि सिर्फ 20 फीसदी डॉक्टर ही ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देने के लिए जाते हैं.

मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले स्टूडेंट को डिग्री के बाद एक साल की नौकरी ग्रामीण क्षेत्र में करने का बॉंड एडमिशिन के समय भरना होता है. ऐसा नहीं करने पर 8 लाख रुपये जमा कराने होते हैं. इसी तहत मेडिकल कॉलेज से पीजी करने वाले डॉक्टर को बॉन्ड तोड़ने पर 10 लाख रुपये का हर्जाना भरना होता है. मध्यप्रदेश के पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हर साल करीब 700 स्टूडेंट एमबीबीएस और 450 डॉक्टर पीजी की डिग्री पूरी करते हैं. इनमें से करीब 25 फीसदी डॉक्टर अपना बॉन्ड पूरा नहीं करते हैं.

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डॉक्टरों का कहना है कि गांवों के सीएचसी(सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) पर न तो ऑपरेशन थिएटर होता है और न ही उपकरण उपलब्ध होते हैं. उनका कहना है कि यहि सर्जन है तो एनेस्थीसिया के डॉक्टर नहीं है, पैथोलॉजिस्ट और टेक्नीशियन्स को जबरदस्त अभाव है. डॉक्टर जेपी पालीवाल का कहना है कि न तो डॉक्टर के रहने की व्यवस्था और न ही शाम के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था होती है. यहीं नहीं सरकार इन जगहों पर अनुबंध पर 50 से 60 हजार रुपये में डॉक्टर को तैनात करना चाहती है, जबकि शहरों में जनरल ड्यूटी ऑफिसर को भी एक लाख रुपये से ज्यादा की तनख्वाह मिलती है.

गांवों में डॉक्टर्स की कमी को पूरा करने के लिए राज्य सरकार ने कुछ साल पहले सख्त कानून बनाए थे. मेडिकल छात्रों से ये बॉन्ड भरवाना शुरू किया गया था, के वे पढ़ाई के बाद अनिवार्य रूप से कुछ साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देंगे. राज्य सराकर सही तरीके से गांव और शहरों में डॉक्टरों की तैनाती करती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी नहीं होगी. मध्यप्रदेश में आज भी ज्यादातर आबादी गांवों में ही रहती है, ऐसे में गांवों में डॉक्टरों की नहीं जाना ग्रामीणों के लिए जरूर चिंता का विषय है.

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