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चुनाव प्रचार 2018 : हमें चुनो, क्योंकि हमारा विरोधी हमसे भी निकम्मा है...

चुनाव प्रचार 2018 : हमें चुनो, क्योंकि हमारा विरोधी हमसे भी निकम्मा है...

सांकेतिक तस्‍वीर.

सांकेतिक तस्‍वीर.

चुनाव प्रचार अभियान के दौरान सारे बयान विरोधियों की आलोचना व उन पर हमले से ज्यादा कुछ नहीं थे. हमने क्या किया या हम क्या करेंगे, से ज्यादा जोर इस बात पर था कि विरोधी कितना निकम्मा और नाकाबिल है.

    चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है. शायद ये मुफ़ीद समय है कि पिछले करीब डेढ़ महीने से जारी चुनाव प्रचार का विश्लेषण किया जाए. मध्यप्रदेश में शायद ये पहली बार है कि विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष और स्वयं प्रधानमंत्री ने एक-दो या तीन नहीं, बल्कि दर्जनों सभाओं और रैलियों में हिस्सा लिया. मालवा-निमाड़ हो या बुंदेलखंड, विंध्य हो या फिर चंबल, प्रदेश का कोई इलाका ऐसा न था, जहां राहुल, मोदी और अमित शाह के कदम न पड़े हों.

    प्रचार की इस सरगर्मी से बयानबाजी का सैलाब तो आना ही था. पूरे इलेक्शन कैम्पे के दौरान दोनों ही ओर से बयानों के तीर बराबरी से चले. बयानों के स्तर की तो बात न ही की जाए तो बेहतर है. ताज्जुब की बात है कि रोजाना सभाओं, रैलियों और मीडिया के जरिये होने वाले इन वाकयुद्धों से न केवल मूल मुद्दे गायब रहे, बल्कि ये सारे बयान विरोधियों की आलोचना व उन पर हमले से ज्यादा कुछ नहीं थे. हमने क्या किया या हम क्या करेंगे, से ज्यादा जोर इस बात पर था कि विरोधी कितना निकम्मा और नाकाबिल है.

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    प्रधानमंत्री सहित सभी राष्ट्रीय नेताओं का फोकस विरोधियों को निकम्मा साबित करने पर ज्यादा रहा. शायद यही वजह है कि दोनों ही पार्टियों के घोषणा पत्र, चुनावी तड़के वाले बयानों के सामने फीके रह गए.

    इंदौर में प्रधानमंत्री की मां को लेकर राज बब्बर के बयान ने मुद्दे की दिशा ही बदल दी. मुद्दा था रुपए के अवमूल्यन का और बहस ‘जाना था जापान, पहुंच गए चीन’ होकर रह गई. रुपया क्यों और कैसे गिरा, ये सवाल किनारे रह गया और ये बयान कितना गिरा हुआ था, इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई. बीजेपी ने भी इस पर सहानुभूति कार्ड खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यानी वोट इस आधार पर मांगे जा रहे थे कि बुजुर्ग महिला का अपमान करने वालों को वोट न दें.

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    इससे पहले राज बब्बर ने प्रधानमंत्री को मनहूस तक कह डाला. ये न केवल एक बेहद हल्के दर्ज का वक्तव्य था, बल्कि सवाल ये भी उठता है कि क्या उन्हें वोट इसी आधार पर चाहिए कि उनके विरोधी ‘अशुभ’ हैं. खुद को प्रगतिशील कहने वाली पार्टी का शुभ-अशुभ के आधार पर वोट मांगना नेताओं की परिपक्वता पर सवाल उठाता है.

    सागर जिले में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा- 'रसोई का तवा भी 10 साल में खराब हो जाता है. उस पर रोटी जल जाती है. मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार तवे की तरह खराब हो गई है.” राहुल की बातों का निहितार्थ स्पष्ट है कि बीजेपी सरकार खराब है, इसलिए हमें चुनो.

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    सिवनी में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री के पेट से प्रधानमंत्री निकलता है और MLA के पेट से MLA निकलता है. कांग्रेस में वंशवाद को लेकर बीजेपी हमेशा से हमला करती रही है, लेकिन इस बयान ने तो शालीनता की सारी हदें पार कर दीं. निहितार्थ ये कि ‘वे’ वंशवादी हैं, इसलिए हमें चुनो.

    'कमलनाथ जी, आपके लिए भले ही अली महत्वपूर्ण हो, हमारे लिए बजरंगबली ही सब कुछ हैं.' ये बयान था उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का. भोपाल में एक रैली के दौरान कहे गए योगी आदित्यनाथ के इन शब्दों का निहितार्थ भी स्पष्ट है कि ‘उनके’ लिए अली ज्यादा अहम हैं, इसलिए हमें चुनो.

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    जब राष्ट्रीय नेताओं का प्रचार ही नकारात्मकता भरा हो, तो भला स्थानीय नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है. शायद इसीलिए इंदौर में बीजेपी प्रत्याशी ने अपने विरोधी प्रत्याशी के पिता को ‘हिस्ट्रीशीटर’ तक कह डाला. उन्हें इतना भी याद नहीं रहा जिन्हें वे हिस्ट्रीशीटर कह रहे हैं, वे बीजेपी के ही एक वरिष्ठ नेता हैं. (जी हां, इंदौर विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-1 के कांग्रेस प्रत्याशी के पिता बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं). जाहिर है बवाल होना था, हुआ भी. बयान के निहितार्थ देखें तो साफ है कि विरोधी पार्टी का प्रत्याशी हिस्ट्रीशीटर/गुंडा है, इसलिए मुझे वोट दें.

    नकारात्मक प्रचार की इस होड़ में संबित पात्रा ने एक और तड़का लगाया और कमलनाथ को ‘कमीशन नाथ’ कह डाला. निहितार्थ फिर वही कि ‘वे’ कमीशनबाज हैं, इसलिए हमें वोट दें.

    ऐसा नहीं कि नकारात्मक बयानों के इस खेल में केवल बीजेपी और कांग्रेस के नेता ही शामिल रहे हैं. मध्यप्रदेश में अपनी जमीन तलाशती समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव ने अपने प्रत्याशी के समर्थन में आयोजित एक जनसभा में कहा- 'अब कांग्रेस और बीजेपी में कोई फर्क नहीं रह गया है. बीजेपी की तरह छोटा है कांग्रेस का दिल.' निहितार्थ छोटे दिल वाली पार्टियों को वोट न दें, समाजवादी पार्टी को चुनें.

    कुल मिलाकर पूरे चुनाव प्रचार अभियान में अपनी लकीर बढ़ाने के बजाय दूसरे की लकीर छोटी बताने की प्रवृत्ति हावी रही. कई देशों में चुनाव के दौरान प्रत्याशी अपनी नीतियां और एजेंडा जनता के सामने ले जाते हैं और उसी आधार पर वोटरों से समर्थन की मांग करते हैं. लेकिन यहां प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र पर चर्चा तक नहीं होती. कोई ये भी नहीं पूछ रहा कि पार्टी ने अपने पुराने घोषणा पत्र में क्या वादे किए थे और उनमें से कितने पूरे किए. शायद इसलिए क्योंकि हमारी व्यवस्था में घोषणा पत्र की अहमियत औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं है. यहां वोट तो इसी आधार पर मिलेंगे कि उनके विरोधी उनसे ज्यादा बुरे हैं.

    Tags: Assembly Election 2018, Madhya Pradesh Assembly Election 2018, Madhya pradesh news

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