दमोह उपचुनावः भाजपा को ले डूबी गुटबाजी-भितरघात, राहुल बोले- कसम खाकर पार्टी को मां बताने वालों ने हरवाया

दमोह में भाजपा के राहुल लोधी की हार और कांग्रेस के अजय टंडन की जीत के बाद सियासत गर्माई. (File)

दमोह में भाजपा के राहुल लोधी की हार और कांग्रेस के अजय टंडन की जीत के बाद सियासत गर्माई. (File)

Damoh Assembly By-Election Analysis: दमोह में जीत-हार को लेकर पार्टियों में आत्ममंथन के साथ विश्लेषणों और सिर फुटौव्वल का सिलसिला शुरू हो गया है. उपचुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत के साथ सियासत में जिंदा रहने की अपनी उम्मीदों की सौगात मिली. वहीं भाजपा को बड़ा झटका लगा.

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दमोह. आखिरकार भारतीय जनता पार्टी और शिवराज सरकार का पूरा कुनबा अपनी पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद उपचुनाव में दमोह विधानसभा सीट बचा पाने में नाकामयाब रहा. यहां कांग्रेस को बड़ी जीत के साथ सियासत में जिंदा रहने की अपनी उम्मीदों की सौगात मिली. वहीं भाजपा को बड़ा झटका, जो आने वाले नगरीय निकाय, पंचायत, चुनाव से लेकर भविष्य में होने वाले उपचुनाव में उसके लिए मुश्किलें खड़ी करेगा. दमोह सीट पर जीत-हार को लेकर पार्टियों में चिंतन, आत्ममंथन के साथ विश्लेषणों और सिर फुटौव्वल का सिलसिला शुरू हो गया है. आइए जानते हैं कि दमोह विधानसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी की हार के क्या कारण रहे हैं, उपचुनावों के नतीजों से किसे क्या हासिल हुआ.

दमोह विधानसभा सीट पर उपचुनाव के लिए 17 अप्रैल को वोट डाले गए थे और रविवार 2 मई को चुनाव नतीजे घोषित हुए, जिसमें कांग्रेस के प्रत्याशी अजय टंडन ने भाजपा प्रत्याशी राहुल सिंह लोधी को 17000 से ज्यादा मतों से शिकस्त दी. यह वहीं राहुल सिंह लोधी है, जो करीब साल भर पहले इस सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी थे और अब इसी सीट पर वह भाजपा के टिकट पर लड़ रहे थे. ये चुनाव कोरोना के उस दौर में हो रहा था, जब पूरे देश के साथ समूचा मध्यप्रदेश महामारी से जूझ रहा था. बीमारी से मरने वालों की लाशों के अंबार लग रहे थे. अस्पतालों में ऑक्सीजन से लेकर दवाओं तक के लिए चीख पुकार मची थी. पूरे प्रदेश में लॉकडाउन था, लेकिन दमोह बेफिक्र था. दमोह में चुनावी रैलियां और सभाएं हो रही थीं. नेता कोरोना के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जनता को भगवान भरोसे छोड़ भीड़ भरी रैलियों में अपनी पार्टी और प्रत्याशी की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. प्रचार खत्म होते ही अगले दिन दमोह में कोरोना कर्फ्यू लगा दिया गया. बस यहीं से हार के कारणों का अंदाजा लगाने के सिलसिला शुरू हो सकता है.

दमोह में इसलिए हारी भाजपा



जनता की नाराजगीः जनता में संभवतः इस बात को लेकर नाराजगी थी कि जब वो महामारी से कराह रही थी, तब उसे सरकार की मदद और साथ की जरूरत थी, जो नहीं मिली. उसी वक्त मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री समेत दर्जन भर से ज्यादा मंत्री दमोह में रैलियां करवाते हुए अपनी और अपनी पार्टी, अपने प्रत्याशी की ब्रांडिंग कर रहे थे. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा पूरे समय दमोह में डेरा डाले नेताओं, कार्यकर्ताओं की बैठकें, सभाएं ले रहे थे. जनता समझ रही थी कि सरकार को जनता से ज्यादा सत्ता और चुनाव की पड़ी है. इसी का सबक सिखाते हुए उसने ये नतीजे दिए. भाजपा व सरकार का पूरा कुनबा भी मिलकर एक प्रत्याशी को नहीं जिता पाया.
दलबदल को नकाराः दमोह में यह उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच बिकाऊ और टिकाऊ के मुद्दे को लेकर लड़ा गया. राहुल सिंह लोधी कांग्रेस की विधायकी छोड़ कर दलबदल कर भाजपा में शामिल हुए थे. भाजपा ने उनके त्याग को 'विकास की चाहत' बताया और उपचुनाव में टिकट थमा दिया. राहुल ने कहा था कि वह दमोह में मेडिकल कॉलेज खुलवाने की चाहत को लेकर भाजपा में शामिल हुए हैं. इस पर शिवराज सिंह ने दमोह के तहसील मैदान में मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास भी कर दिया. लेकिन जनता को राहुल सिंह लोधी का दलबदल रास नहीं आया.

अंदरूनी गुटबाजी, भितरघातः भाजपा प्रत्याशी राहुल सिंह लोधी पर पहले दिन से ही भितरघात और हार का खतरा मंडराने लगा था, जब उन्हें प्रत्याशी बनाने की घोषणा की गई थी. इसका विरोध कर रहे थे शिवराज संरकार में मंत्री रह चुके भाजपा के बड़े नेता जयंत मलैया. जैसे-तैसे मलैया को मनाने के दावे किए गए. उन्हें मनाने के लिए पूरी भाजपा को लगा दिया गया. मलैया ने चुनाव की जिम्मेदारी भी संभाली, लेकिन कहा जा रहा है कि मलैया के समर्थक राहुल को प्रत्याशी बनाने से बहुत नाराज थे, जिसका खामियाजा हार की शक्ल में राहुल सिंह लोधी को उठाना पड़ा. भितरघात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राहुल सिंह लोधी, मलैया के वार्ड में ही पिछड़ गए.

भाजपा में सिर फुटौव्वलः चुनाव नतीजों में हार सामने आते ही राहुल सिंह लोधी मुखर हो गए और उन्होंने जयंत मलैया परिवार पर खुलेआम आरोप लगाते हुए मलैया को पार्टी से निष्कासित करने की मांग कर डाली है. राहुल ने कहा कि जो नेता कसम खाकर पार्टी यानी भाजपा को अपनी मां बताते थे, उन्हीं ने हरवा दिया. बता दें कि सिद्धार्थ मलैया के पास दमोह शहर का प्रभार था. दमोह चुनाव हारने के बाद केन्द्रीय मंत्री, दमोह से सांसद प्रह्लाद पटेल की एक प्रतिक्रिया से आप पार्टी की अंदरूनी स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं, जिसमें वह मतगणना पूरी होने के पहले ही कांग्रेस प्रत्याशी को जीत की बधाई देते हैं और ट्वीट करते हैं, 'हम जीते नहीं, पर सीखे बहुत.'



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बीजेपी-कांग्रेस दोनों के लिए दमोह का चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था.


दमोह चुनाव से किसे-क्या हासिल हुआ, क्या गंवाया



1. मलैया फैमिली को सांसें मिलीं: दमोह उपचुनाव के नतीजों ने सियासत के नए समीकरण रच दिए. राहुल की जीत-हार से सत्ता को तो कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु राहुल अगर जीत जाते, तो दमोह में जयंत मलैया और उनके बेटे सिद्धार्थ मलैया के सियासी करियर खत्म हो जाने का खतरा था. राहुल हार चुके हैं, लिहाजा अब अगले चुनाव में मलैया पूरे दम-खम के साथ दमोह सीट पर टिकट के लिए अपना दावा ठोंक सकेंगे.

2.कांग्रेस की उम्मीदें जागीं: इस जीत ने कांग्रेस की सियासत मे उम्मीदें एक बार फिर जगा दी. इन चुनाव ने साबित कर दिया कि दमोह में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का प्रभाव असर लाया. बता दें कि कमलनाथ के अलावा दिग्विजय सिंह ने अपने भरोसेमंद नेताओं के साथ दमोह में कांग्रेस प्रत्याशी के लिए बहुत मेहनत की, जिससे पार्टी को फायदा मिला. जीत के बाद कमलनाथ ने कहा भी कि चुनाव सरकार, सिस्टम के दुरुपयोग और धन-बल से नहीं जीते जाते. लेकिन कोरोना काल में इस चुनावी कवायद ने पार्टी से उसकी महिला विंग की प्रदेश अध्यक्ष मांडवी चौहान को जरूर छीन लिया. मांडवी की हाल ही कोरोना से मौत हो गई थी. दमोह में प्रचार करने वाले कई कांग्रेस नेता कोरोना पॉजिटिव निकले हैं. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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