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'सदियों में पैदा होता है एक जब्बार'

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Updated: November 18, 2019, 3:08 PM IST
'सदियों में पैदा होता है एक जब्बार'
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए अब्दुल जब्बार ने एक लंबी लड़ाई लड़ी.

भोपाल गैस कांड (Bhopal Gas Leak) के पीड़ितों में से एक थे अब्दुल जब्बार (Abdual Jabbar). उनका घर भी हत्यारी यूनियन कार्बाइड से महज ढ़ाई किलोमीटर दूर था और उनकी उम्र थी 28 साल. उन्होंने इस त्रासदी में अपने माता-पिता और भाई को खो दिया था.

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  • Last Updated: November 18, 2019, 3:08 PM IST
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14 नवंबर की रात को अब्दुल जब्बार नाम का वो शख्स इस दुनिया को अलविदा कह गया, जो सारी जिंदगी 2-3 दिसंबर 1984 की काली, जहरीली रात को शहर में पैदा हुई तबाही से लड़ता रहा. पीढ़ियों का दर्द दे गई उस रात के गुनहगारों को सजा और दर्द झेलने वालों के हक के लिए सड़कों से लेकर सबसे ऊंची अदालत की चौखट तक प्रदर्शनों और याचिकाओं के जरिए जूझता रहा. उम्मीद थी कि उसके जनाजे को कंधा देने शहर के लोग आसमान के बादलों की तरह छा जाएंगे, लेकिन तीखी धूप के बीच चंद कंधों के सहारे इस शख्स ने गरम गड्डा कब्रिस्तान तक अपना आखिरी सफर पूरा किया.

अब्दुल जब्बार दुनिया की सबसे भयावह औद्योगिक भोपाल गैस त्रासदी के गुनहगारों के खिलाफ लड़ाई का सबसे बड़ा चेहरा और योद्धा थे. यह त्रासदी 2-3 दिसंबर 1984 को आधी रात को भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने से 27 टन मिथाइल आइसो सायनायड गैस रिसने से हुई थी. सरकारी कागजों में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक इस त्रासदी में 20 हजार मौतें हुईं और 5 लाख 70 हजार से ज्यादा लोग आंखों की जलन, सीने की जलन, गैस, किडनी, लंग्स, हार्ट, सांस, टीबी जैसे दर्जनों तरह की गंभीर बीमारियों के शिकार हुए. ऐसे ही गैस पीड़ितों में से एक थे अब्दुल जब्बार. उनका घर भी हत्यारी यूनियन कार्बाइड से महज ढ़ाई किलोमीटर दूर था और उनकी उम्र थी 28 साल. उन्होंने इस त्रासदी में अपने माता-पिता और भाई को खो दिया. खुद भी आंखों की 50 फीसदी रोशनी गंवा बैठे. खुद लंग्स फाइब्रोसिस के शिकार हुए. तबसे उनकी एक नहीं, कई रातें घरवालों, पड़ोसियों और परिचितों के इलाज और तीमारदारी में अस्पतालों में गुजरी. त्रासदी के तुरंत बाद भोपाल के गैस पीड़ितों को दूध और अनाज खरीदने के लिए सरकार की ओर से हर महीने 200 रुपए की आर्थिक मदद दी जा रही थी. इस मामूली मदद से जब्बार भाई संतुष्ट नहीं थे. उनका मानना था पीड़ितों को बेहतर मुआवजा मिलना चाहिए, उनके रोजगार, पुनर्वास, इलाज का बेहतर इंतजाम होना चाहिए.

जब्बार भाई का पहला अभियान, राजेन्द्र नगर कालोनी, जहां वह रहते थे, वहां से चला. इस अभियान में उन्होंने नारा दिया..खैरात नहीं रोजगार चाहिए. इस दौरान उन्होंने गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन बनाया. यह गैस पीड़ितों की लड़ाई के लिए बना पहला संगठन है. जब्बार भाई ने जहर की जलन को इतना महसूस किया कि खुद की तकलीफ भूल निकल पड़े उस जहर को फैलाने वालों और उसके गुनहगारों के खिलाफ जंग लड़ने में. भोपाल की भीषणतम त्रासदी को राजनैतिक और आर्थिक अपराध घोषित कराने में. उन्होंने सत्ता और अदालत की बेरुखी के खिलाफ भी काफी लड़ाई लड़ी.


1989 में केन्द्र सरकार का केवल 1 लाख 5 हजार लोगों को पीड़ित मानते हुए यूनियन कार्बाइड के साथ 470 मिलियन डॉलर का समझौता हुआ. यह जब्बार भाई के ही संघर्ष, प्रदर्शनों और अदालती लड़ाई का नतीजा था कि एक दशक बाद सुप्रीमकोर्ट ने 5 लाख 70 हजार दावेदारों को पीड़ित माना और 1503 करोड़ रुपए का वितरण उनके बीच करने के आदेश दिए.

जब्बार भाई ने निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गैस पीड़ितों के कानून हक की लड़ाई लड़ी. गैस पीड़ित हिन्दू-मुस्लिम महिलाओं के पुनर्वास और रोजगार के लिए विशेष प्रयास किए. उन्होंने महिलाओं के कौशल विकास के लिए स्वाभिमान केन्द्र खोला. इस केन्द्र में महिलाओं, लड़कियों को सिलाई, कढ़ाई, कपड़े के थैले बनाने आदि और कम्प्यूटर ट्रेनिंग का काम सिखाया जाता है. तीन दशक से भी ज्यादा जब्बार का समय प्रदर्शनों को करने, बड़े चिकित्सा पुनर्वास के लिए और भोपाल गैस कांड के अभियुक्तों को सजा दिलाने के लिए अदालतों में याचिकाएं लड़ते और संघर्ष करते बीता. वो रोज सड़कों से अदालतों तक लड़ाई लड़ते रहे. खुद गंभीर बीमारियों को गले लगाते रहे.

भोपाल का यादगारे शाहजहानी पार्क भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की साप्ताहिक मीटिंग्स का गवाह है. जब्बार भाई हमेशा कहते थे कि भोपाल की घनी आबादी में जहरीले रसायन को पैदा करने वाली यूनियन कार्बाइड की स्थापना के पीछे सरकार जिम्मेदार है. वह इसके लिए हमेशा सरकारों, नेताओं को कटघरे में खड़ा करते रहे और मजबूर करते रहे कि पीड़ितों के हक के लिए कुछ करें. पिछले 5 सालों से जब्बार भाई लगातार शारीरिक रूप से खोखले और ज्यादा बीमार और कमजोर होते जा रहे थे. वह लगातार गैसराहत अस्पतालों में पीड़ितों के अच्छे इलाज, सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहे, लेकिन खुद बीमार पड़े तो ये अस्पताल उन्हें बेहतर इलाज नहीं दे पाए. जब्बार भाई की जिंदगी बीमारी से ज्यादा इलाज के अभाव और उपेक्षा के हाथों छीन ली गई.

जब्बार भाई दिल के बेहद अमीर नहीं, जेब से मुफलिस थे. तमाम संगठनों की तरह उनका वक्त फंडिंग जुटाते नहीं बीता. वह वक्त-वक्त पर अपने दोस्तों से टेंट, माइक, बिजली के बिल, कभी-कभी बच्चों की स्कूल की फीस भरने की गुजारिश करते रहते थे. वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया जी उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि जब्बार को मालूम था कि आंखें साथ छोड़ रहीं है, जिस्म में खून की रवानगी कमजोर होती जा रही है. इलाज के लिए कहो तो कहते थे, अगर इनके इलाज में लग जाऊंगा, तो पैसा कहां से आएगा. संगठन का क्या होगा, सबसे ऊंची अदालत में चल रहे मुकदमों का क्या होगा? उन्हें गंभीर डायबीटिज थी, हाल ही उनके अंगूठे में गैंगरिन का पता चला था. वजह थी वह अपने पैरों का ख्याल नहीं रख पाए, क्योंकि उनके जूते फटे हुए थे.

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इलाज कहां-कहां चला?
पिछले ढाई महीने से वह गंभीर रूप से बीमार थे. पहले उनके पैर के घाव का कमला नेहरू गैस राहत अस्पताल में इलाज चला. फिर हार्ट के इलाज के लिए उन्हें भोपाल मेमोरियल गैस राहत अस्पताल (बीएचएमआरसी) में भर्ती कराया गया. करीब डेढ़ हफ्ता पहले वापस कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती हुए, जहां से हालत बिगड़ने पर चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया गया, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली. गैस पीड़ितों के लिए जिंदगी भर लड़ने वाले जब्बार भाई की बेहद दुर्गति गैस राहत अस्पतालों में ही हुई. गैस राहत विभाग और बीएमएचआरसी ने उनके इलाज में घोर लापरवाही बरती. उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में शिफ्ट किया जाता रहा. बदहाली के दौर से गुजर रहे बीएचएमआरसी में न तो ऑर्थोपैडिक सर्जन है, न अच्छा हार्ट स्पेशिलिस्ट. 10-12 दिन पहले ही पता चला था, कि उन्हें पैर के अंगूठे में गैंगरिन हो गया, जिसके लिए वेस्कुलर सर्जरी की तुरंत जरूरी थी, लेकिन बीएचएमआरसी में इसका कोई माकूल इंतजाम नहीं था.

बीएचएमआरसी में सीटी स्कैन से बीमारी का पता भी चल गया. उन्हें दिल्ली या मुंबई ऊंचे इलाज के लिए भेजा जाना था, लेकिन न सरकार की ओर से न अस्पताल प्रबंधन की ओर से इसकी पहल की गई. मृत्यु के एक दिन पहले कुछ पत्रकारों ने भोपाल टीटी नगर के काफी हाउस में पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जब्बार से बेहतर इलाज की व्यवस्था करने की गुजारिश की. इसके बाद आनन-फानन में फोन हुए, जब्बार को दिल्ली ले जाने की व्यवस्था की गई, लेकिन उससे पहले ही जब्बार के प्राण पखेरू हो चुके थे.

अब्दुल जब्बार ने करीब 30 सालों तक भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए पूरी ताकत से लड़ाई की (फोटो- News18)


जन संघर्षों के साथी
केसला के विस्थपित आदिवासियों का आंदोलन हो या जल जंगल जमीन की छोटी से लेकर बड़ी लड़ाई या फिर मेघा पाटकर के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन हो, जब्बार भाई जनसंघर्षों के साथी थे. उनका गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन हर संघर्ष में शामिल होता था. किसान-मजदूरों, आदिवासियों के दर्जनों जुलूस प्रदर्शनों में जब्बार भाई और उनके संगठन का सहयोग और सहभागिता रहती थी.

स्वभाव में सद्भाव
जब्बार भाई कौमी एकता के भी प्रतीक थे. 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद देश भर में भड़के दंगे से भोपाल भी अछूता नहीं रहा था. उस मुश्किल दौर में जब्बार भाई, हरदेनिया जी, शैलेन्द्र शैली आदि सामाजिक कार्यकर्ता लोगों के घर-घर जाकर, सड़कों-गलियों के बाहर रात-रात भर जागकर पहरा देते थे.

अफसोस इस बात का
ये बेहद अफसोस और शर्मिंदगी की बात है कि भोपाल के लोगों के लिए जब्बार भाई ने दिन देखा न रात. 5 लाख से भी ज्यादा लोगों को मुआवजे का हकदार बनाया, उनके बेहतर इलाज के लिए अस्पतालों में लड़े, वे भोपाली बीमार जब्बार के इलाज के लिए गुहार के बावजूद चंद रुपए न जुटा सके. ये सब छोड़िए जनाब, मौत के बाद भी कब्रिस्तान तक जब्बार के जनाजे का साथ न निभा सके. क्या ये 35 साल तक दीवाने, जुनूनी इंसान द्वारा की गई सेवा का सही सम्मान है. मैं तो कहूंगा...बड़े नाशुक्रे हैं आप....

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First published: November 18, 2019, 3:06 PM IST
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