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एक कमरे में चल रहा है स्कूल, उसी में है खाना और शौचालय भी

एक कमरे में चल रही सरकारी स्कूल

एक कमरे में चल रही सरकारी स्कूल

करोड़ के बजट के बाद भी सरकारी स्कूल आज भी बदहाल स्थिति में हैं. स्कूलों को ना तो अब तक भवन मिले हैं और न ही पूरे शिक्षक. ऐसे में सरकारी स्कूल भला कैसे सुधरेंगे और कैसे सरकारी स्कूलों की तरफ बच्चों का झुकाव होगा.

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मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की तर्ज पर विकसित करने की बातें बस कोई ही साबित हो रही है. सरकारी स्कूलों का आलम यह है कि स्कूल भगवान भरोसे संचालित हो रहे हैं. स्कूलों में ना तो शिक्षक है और ना ही भवन. तमाम सरकारी महकमें के बावजूद राजधानी भोपाल में संचालित शासकीय प्राथमिक शात्रा पत्रकार भवन सरकारी स्कूलों की सच्चाई को बयां कर रहा है.

शासकीय प्राथमिक शाला पत्रकार भवन साल 2002 से संचालित हो रहा है. स्कूल में पहली से पांचवी तक कक्षाएं लगती है, लेकिन स्कूल के नाम पर सिर्फ एक ही कमरा है, जहां पांचों कक्षाओं के बच्चें एक साथ पढ़ाई करते हैं. स्कूल में सिर्फ दो ही शिक्षक है. स्कूल सिर्फ एक ब्लाइंड टीचर के भरोसे चल रहा है. दूसरे शिक्षक ज्यादातर नदारत ही रहती है और आमतौर पर मेडिकल लीव पर होती है. ऐसे में स्कूल में एक माह में बमुश्किल एक या दो दिन ही अध्यापक पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंचते हैं. ब्लाइंड शिक्षक के भरोसे ही पूरे स्कूल और पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी है.

स्कूल में बदहाली का आलम यह है कि एक छोटे से कमरे में पहली से पांचवी कक्षा के बच्चे साथ में पढ़ाई करते हैं तो एक ही शिक्षक सारी कक्षाओं का कोर्स भी पूरा करवाता है. स्कूल के इसी कमरे में बच्चों के लिए भोजन भी तैयार होता है और इसी कमरें में शौचालय है. स्कूल के बच्चों की मांग है कि उन्हें दूसरा कमरा मिल जाए, ताकि खाने की सुविधा भी हो जाए और पढ़ाई भी आसानी से हो सके. यहीं वजह है कि असुविधा के चलते स्कूल में केवल 18 बच्चे ही पढ़ाई के लिए पहुंच रहे हैं.



करोड़ के बजट के बाद भी सरकारी स्कूल आज भी बदहाल स्थिति में हैं. स्कूलों को ना तो अब तक भवन मिले हैं और न ही पूरे शिक्षक. ऐसे में सरकारी स्कूल भला कैसे सुधरेंगे और कैसे सरकारी स्कूलों की तरफ बच्चों का झुकाव होगा.
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