बाबूलाल गौर की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए कितनी तैयार हैं कृष्णा गौर...

कृष्णा गौर गोविंदपुरा सीट से बीजेपी की विधायक हैं और वे ही स्व. बाबूलाल गौर की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाती हैं.

Ashutosh Nadkar | News18 Madhya Pradesh
Updated: August 21, 2019, 10:10 AM IST
बाबूलाल गौर की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए कितनी तैयार हैं कृष्णा गौर...
बाबूलाल गौर की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए कितनी तैयार हैं कृष्णा गौर (फाइल फोटो)
Ashutosh Nadkar | News18 Madhya Pradesh
Updated: August 21, 2019, 10:10 AM IST
किसी एक ही विधानसभा क्षेत्र से लगातार 10 बार चुनाव जीतना यकीनन आसान नहीं है. लहर चाहे इंदिरा गांधी की रही हो या फिर नरेन्द्र मोदी की भोपाल के गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र पर इसका कभी कोई असर नहीं रहा. इस सीट के बारे में कहा जाता था कि इसे बाबूलाल गौर ने जीवनपर्यंत अपने नाम पर रिजर्व कर लिया है. शायद ये बात गलत भी नहीं थी. लगातार 10 चुनाव जीतने के बाद इस इलाके का विधायक तो बदला लेकिन नया विधायक भी गौर परिवार से ही मिला. अब श्रीमती कृष्णा गौर गोविंदपुरा सीट से बीजेपी की विधायक हैं और वे ही स्व. बाबूलाल गौर की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाती हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या कृष्णा गौर अपने ससुर की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. आइए एक नजर डालते हैं कृष्णा गौर के राजनीतिक सफर पर.

ससुर की राजनीतिक विरासत संभालने को तैयार कृष्णा गौर!

कृष्णा गौर का जन्म इन्दौर के सयुंक्त एवं परंपरागत भारतीय परिवार में हुआ था. इनके स्व. पिता एक समाजसेवी तथा इन्दौर दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे कृष्णा गौर की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा इंदौर में हुई. कृष्णा गौर का विवाह बाबूलाल गौर के पुत्र श्री पुरूषोत्तम गौर के साथ हुआ, लेकिन पुरूषोत्तम गौर का असमय निधन हो गया और गौर परिवार को गहरा आघात पहुंचा.

ससुर की छत्रछाया में मिला राजनीतिक प्रशिक्षण

ऐसी स्थिति में कृष्णा गौर ने परिवार को संभाला. उस वक्त बाबूलाल गौर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. कृष्णा गौर अपने ससुर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगी. उन्होंने पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव प्रचार में भी सक्रिय भूमिका निभाई. बाबूलाल गौर ने भी बहू की क्षमता और सक्रियता को देखकर उन्हें पर्यटन विकास निगम की अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया, हालांकि उनके इस निर्णय की काफी आलोचना भी हुई थी. कुछ दिनों बाद ही कृष्णा गौर को ये पद छोड़ना भी पड़ा था.

बाबूलाल गौर (फाइल फोटो)
बाबूलाल गौर के निधन से परिवार को पहुंचा गहरा आघात (फाइल फोटो)


भोपाल की मेयर के रूप में कृष्णा गौर ने बनाई अलग पहचान
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बाद में कृष्णा गौर बीजेपी महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष बनाई गईं. लेकिन उन्हें मुकम्मल पहचान उस वक्त मिली जब वे भोपाल की मेयर चुनी गईं. मेयर के रूप में कृष्णा गौर ने अपना एक अलग वजूद बनाया. उन्होंने शहर के विकास के लिए कई अहम् फैसले लिए और अपने राजनीतिक विरोधियों को भी मुंहतोड़ जवाब दिया. जिस वक्त कृष्णा भोपाल की मेयर थीं उसी वक्त बाबूलाल गौर प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री थे. जाहिर है कि ससुर के संबंधित विभाग के मंत्री होने के कारण कृष्णा गौर के लिए राह आसान हो गई.

कृष्णा गौर (फाइल फोटो)
कृष्णा गौर ने मेयर के रूप में बनाया अपना अलग वजूद (फाइल फोटो)


बाबूलाल गौर ने भी अपनी बहू को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बीजेपी में 75 पार का फार्मूला लागू होने के बाद 10 बार लगातार चुनाव जीतने के वाले गौर के लिए टिकट पाना मुश्किल हो गया. ऐसे में गौर अपनी बहू के टिकट के लिए अड़ गए. नौबत यहां तक आ पहुंची कि टिकट न मिलने पर उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने की भी चर्चा होने लगी. आखिरकार कृष्णा गौर को टिकट मिला और 11वीं बार भी गोविंदपुरा सीट पर गौर परिवार का कब्जा बरकरार रहा.

एक मंझी हुई नेत्री की तरह राजनीतिक परिपक्वता का दिया परिचय

पिछले कुछ समय से बाबूलाल गौर अपनी ही पार्टी से कुछ ख़फ़ा भी दिखाई दिए. कई मसलों पर उनकी राय और बयान पार्टी लाइन से अलग भी रहे. जाहिर है पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में ये वक्तव्य मीडिया की सुर्खियों में रहे. ऐसे में बीजेपी विधायक के रूप में कृष्णा गौर ने काफी परिपक्वता का परिचय दिया और काफी संतुलित प्रतिक्रिया दी. एक बार जब बाबूलाल गौर ने सार्वजनिक मंच से कमलनाथ की प्रशंसा कर दी तो कृष्णा गौर ने कांग्रेस के कार्यक्रम में जाने के लिए बाबूलाल गौर की निंदा की और कहा कि कमलनाथ की प्रशंसा कर बाबूलाल गौर ने गलत किया है. इससे साफ होता है कि बाबूलाल गौर की छत्रछाया में हुए राजनीतिक प्रशिक्षण ने उन्हें एक मंझी हुई नेत्री बना दिया है.

ससुर के निधन से कृष्णा गौर ने एक राजनीतिक संरक्षक भी खो दिया


बाबूलाल गौर एक ऐसे राजनेता थे जिनकी न केवल अपनी पार्टी में बल्कि विरोधी दलों में भी खासी पूछ परख थी. उनकी मदद के लिए धुर राजनीतिक विरोधी भी हमेशा तत्पर रहते थे. पार्टी में उपेक्षित होने के बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता बनी हुई थी. कृष्णा गौर की राजनीति भी बाबूलाल गौर जैसे दिग्गज के सानिध्य में रहकर ही फली-फूली है. लेकिन अब उनकी भी अपनी एक राजनीतिक पहचान है. गौर साहब के निधन से कृष्णा गौर ने न केवल अपने पिता तुल्य ससुर को खो दिया है, बल्कि उनके राजनीतिक संरक्षण के जाने का खामिजाया उन्हें उठाना पड़ सकता है.

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First published: August 21, 2019, 9:58 AM IST
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