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प्रधानमंत्री जी देखिए, इस AIIMS को है इलाज की जरूरत

प्रधानमंत्री जी देखिए, इस AIIMS को है इलाज की जरूरत

Bhopal AIIMS

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भोपाल एम्स मिसाल है कि सुविधाओं और डॉक्टरों के बिना ऐसे संस्थान सिर्फ एक बेमानी हैं!

    भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में नए एम्स खोलने की तैयारी में हैं लेकिन देश में पहले से खुले एम्स की दुर्दशा पर ना तो केंद्र सरकार और ना ही राज्य सरकार की नजर है.

    अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स, जिसका नाम जेहन में आते ही देश की सर्वोच्च मेडिकल सेवाओं का खाका बन जाता है. और ये माना जाता है कि यहां मरीजों की देखरेख के लिए आवश्यक चिकित्सा संबंधी सारे उपकरण जरूर होंगे.

    लेकिन भारत के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा भी एम्स स्थित है जो उपकरण और अन्य बुनियादी सुविधाएं तो दूर, एक अदद निर्देशक तक के लिए तरस रहा है. भोपाल एम्स में रियलिटी चेक के बाद पता चला कि यहां स्थिति सामान्य अस्पतालों से भी बदतर है.

    सिर्फ नाम का एम्स, डॉक्टर और इलाज के लिए तरस रहे मरीज
    भोपाल एम्स परिसर के मुख्य गेट से अंदर प्रवेश करते ही बायीं ओर एक मैदाननुमा जगह खाली है, जिसका प्रयोग पार्किंग के तौर पर किया जाता है. सामने अस्पताल की बिल्डिंग है. बिल्डिंग के कई प्रवेश द्वार हैं, जो लाइन से स्थित हैं. इन्हें यहां गेट नम्बर कहा जाता है, मसलन 1 नम्बर गेट पर रिसेप्शन और ओपीडी की बिल्डिंग हैं. गेट नम्बर 2 पर टोकन मिलता है, जिसके लिए तो कभी- कभी रात से ही लाइन में लगना पड़ता है.

    ओपीडी बिल्डिंग में कार्यरत एक कर्मचारी से बात करने पर पता चला कि मरीजों को सबसे पहले टोकन बनवाना पड़ता है, फिर उसे किस विभाग में किस डॉक्टर के पास भेजा जाना है, यहीं से तय किया जाता है. किसी को सोमवार या शुक्रवार के अलावा किसी दिन एमरजेंसी की जरूरत पड़ी तो एम्स में इलाज नहीं मिलेगा, क्योंकि अन्य दिन नए मरीजों के पर्चे ही नहीं बनाए जाते हैं. और कभी-कभी तो ओपीडी में भी मरीजों को डॉक्टरों से मिलने के लिए कई दिन तक इंतजार करना पड़ता है.

    मरीजों के लिए बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव
    एम्स का नाम होते हुए भी यहां मरीजों के लिए सुविधाएं किस स्तर पर हैं, ये सबसे चौंकाने वाली बात है. दरअसल, बिल्डिंग के बाहर परिसर में खुले आसमान के नीचे चादर बिछाए मरीज बड़ी संख्या में पड़े रहते हैं. उनसे पूछने पर पता चला कि कई-कई दिन से वे लोग अपने परिवार के साथ यहां पड़े हुए हैं. रात में यहीं सो जाते हैं. अस्पताल परिसर से पीने तक का पानी नहीं मिलता.

    तहकीकात करने पर पता चला कि अस्पताल परिसर में बिल्डिंग के बाहर पानी और शौचालय तक की कोई सुविधा नहीं है.

    सिर्फ एक दवाखाना, जहां दवाइयां मिलती हैं
    एम्स की बिल्डिंग के बायीं ओर स्थित एक मेडिकल स्टोर जो परिसर में ही स्थित है, वहां मरीजों की लाइन देखने को मिलती है. बात करने पर पता चला कि बाहर की अपेक्षा यहां दवाइयां कम दाम पर मिलती हैं. लेकिन यहां भी मिली-जुली प्रतिक्रिया ही देखने को मिली.

    सिवनी मालवा से आए हुए अजय कुमार का कहना है कि उन्हें पिछले चार महीने से बुखार आता रहता है, और लगातार एम्स में ही दिखा रहे हैं, और उन्हें यहां दवाइयां 30 प्रतिशत की छूट पर मिलती हैं.

    ना तो पूरे डॉक्टर, ना इलाज की सुविधा
    सागर जिले से आए हुए भगवान दास, जिनका एक पैर ठेला पलटने से टूट गया है, वो कच्चे प्लास्टर के साथ तीन दिन से बाहर पड़े हुए हैं. ओपीडी में चेक करवाने के बाद उनको पर्चा बनाकर दे दिया गया और डॉक्टर से समय मिलने तक का इंतजार करने और बाहर से दवाई लाने के लिए कहा गया.

    इटारसी से आई हुईं मालती देवी, जिनको करीब 6 महीने पहले पता चला कि उन्हें कैंसर है वो एक हफ्ते पहले अपनी बेटी के साथ आईं हैं. उनका कहना है कि आठ दिन हो गए अभी सिर्फ जांच के नाम पर ही उन्हें इधर से उधर दौड़ाया जा रहा है. ना तो किसी डॉक्टर से मिलवाया गया और ना ही कोई ठोस आश्वासन दिया गया, जबकि कमला नेहरु मेडिकल संस्थान का पिछला पर्चा, जिसमे कैंसर होने की रिपोर्ट दर्ज है, वो उसे दिखा चुकी हैं. सात दिन से बाहर पड़ी मालती देवी को बुरी तरह से खांसी भी आ रही थी.



    भगवान दास और मालती देवी जैसे कई मरीज कड़ाके की सर्दी के बीच इलाज की आस लिए एम्स परिसर में रात बिताते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर को निराशा ही हाथ लगती है.

    डायरेक्टर की कुर्सी खाली
    मार्च 2015 में डॉक्टर संदीप कुमार के इस्तीफे के बाद तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भोपाल एम्स में पूर्णकालिक निर्देशक तक की कुर्सी खाली है. 15 अगस्त 2012 को भोपाल एम्स की बिल्डिंग में सर्वप्रथम ओपीडी सेवाओं का उदघाटन किया गया था. तब से लेकर आज तक कई विभाग शुरू तो हुए लेकिन स्टाफ की कमी के चलते उन्हें कई बार बंद करना पड़ा.

    करीब 52 डॉक्टरों और सलाहकारों के साथ शुरू हुए संस्थान में आज कहने को तो 180 के करीब डॉक्टर और सलाहकार हैं साथ ही एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, मेडिसिन, जनरल मेडिसिन, सर्जरी, स्त्री रोग विभाग प्रमुख रूप से चल रहे हैं. लेकिन संस्थान में आज भी करीब 15 विभागों में 200 से अधिक डॉक्टरों की भर्ती की जानी बाकी है.

    डॉक्टरों का कहना है कि डायरेक्टर के बिना कई महत्वपूर्ण काम होने में महीनों लग जाते हैं. उनका मानना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि संस्थान को खोल भर देने से ही उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती बल्कि उसे देख-रेख और ध्यान देने की जरूरत होती है.

     

    छात्रों के लिए भोपाल एम्स
    परिसर में ही अस्पताल बिल्डिंग के पीछे छात्रों के हॉस्टल्स और मेस स्थित हैं. भोपाल एम्स की एक छात्रा ने बताया कि पिछले पांच बैच को ऑटोप्सी और डिसेक्शन टेबल का अध्ययन करने के लिए भोपाल के अन्य सरकारी अस्पतालों में जाना पड़ता था, लेकिन अब उसके लिए हमें बाहर नहीं जाना पड़ता. अब यहां डिसेक्शन टेबल रोज लगने लगी है.
    हालाकि छात्रा के अनुसार मेस के खाने, प्रदूषित पानी जैसी चीजों का सामना अभी भी छात्रों को करना पड़ता है.

    भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों और मांगों को पूरा करने के लिए छह नए एम्स खोले गए थे. भोपाल एम्स भी उन्हीं आशाओं के साथ खोला गया था कि आम लोगों को आपातकालीन एवं बेहतरीन मेडिकल व्यवस्था और छात्रों के लिए उच्चस्तरीय चिकित्सा शिक्षा प्रदान की जाएगी लेकिन हाल-फिलहाल ऐसी स्थिति होती नहीं दिख रही है.

    Tags: AIIMS, Madhya pradesh news, Narendra modi, Shivraj singh chouhan

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