ट्रिपल तलाक के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली भारत की पहली महिला शाहबानो को मिला न्याय

33 साल बाद शाहबानो और उनकी जैसी तमाम मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिल गया है, लेकिन ये सब देखने को लिए आज शाहबानो जिंदा नहीं हैं.

News18 Madhya Pradesh
Updated: July 31, 2019, 9:14 AM IST
ट्रिपल तलाक के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली भारत की पहली महिला शाहबानो को मिला न्याय
ट्रिपल तलाक के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली भारत की पहली महिला शाहबानो को मिला न्याय (फाइल फोटो)
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Updated: July 31, 2019, 9:14 AM IST
मध्य प्रदेश में इंदौर की शाहबानो आज अगर जिंदा होतीं तो बेहद खुश होतीं. जिस लड़ाई की शुरुआत उन्होंने की थी, उसमें जीत तो उन्हें 7 साल बाद ही मिल गई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार की वजह से उन्हें हक नहीं मिल पाया था. वहीं अब 33 साल बाद शाहबानो और उनकी जैसी तमाम मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिल गया है, लेकिन ये सब देखने को लिए आज शाहबानो जिंदा नहीं हैं. हालांकि इस खबर से खुदा के पास उनके आत्मा को सुकून जरूर मिल जाएगी. आज करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को 3 तलाक से आजादी मिल गई है. आपको बता दें कि तीन तलाक के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत शाहबानो ने ही की थी.

तीन तलाक के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली भारत की पहली महिला थीं शाहबानो

दरअसल, लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी ट्रिपल तलाक बिल पास हो गया है. बिल के पक्ष में 99 और विपक्ष में 84 वोट पड़े हैं. राज्यसभा से बिल पास होने के बाद मुस्लिम महिलाओं को अब तीन तलाक से आजादी मिल गई है. हालांकि सदन वोटिंग के दौरान कई बड़े दलों ने इसका बहिष्कार कर दिया था. आपको बता दें कि सबसे पहले शाहबानो ने पहली बार तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन राजीव गांधी सरकार के एक फैसले की वजह से उसे हक नहीं मिल पाया था.

हिंदुस्तान में ट्रिपल तलाक के खिलाफ आवाज उठाने वाली पहली महिला इंदौर की शाहबानो ही थीं.  शाहबानो के कुल 5 बच्चे थे. उनके पति मोहम्मद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था. इस्लामिक लॉ के मुताबिक पति अपनी पत्नी की मर्जी के खिलाफ ऐसा कर सकता था, लेकिन खुद और बच्चों के भरण पोषण के लिए शाहबानो ने इसके खिलाफ आवाज उठाई. तब बच्चों को पालना उनके लिए मुश्किल हो रहा था.

ट्रिपल तलाक के खिलाफ 62 साल की उम्र में सुप्रीम कोर्ट गईं शाहबानो को मिली थी जीत

सन् 1978 में जब शाहबानो ट्रिपल तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गईं, तब वो 62 साल की थीं. पति ने दूसरी पत्नी लाने की वजह से शाहबानो को छोड़ दिया था. पहले तो वह शाहबानो को कुछ गुजारा भत्ता दे दिया करता था, लेकिन बाद में शौहर ने सब देना बंद कर दिया. मामला कोर्ट में चल रहा था. सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल सन् 1985 को चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपना फैसला शाहबानो के पक्ष में दिया. सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद अहमद खान को अपनी पहली पत्नी को हर महीने 500 रुपए का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में किया था विरोध
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वही तब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मुस्लिम संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया था. सन् 1973 में बने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरजोर विरोध किया था. लिहाजा, सरकार इनके विरोध के आगे झुक गई थी. इतना ही नहीं इसके बाद सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण (उपेक्षा) का आरोप भी लगा.

ट्रिपल तलाक-triple talaq
राजीव गांधी सरकार की वजह से नहीं मिला हक (फाइल फोटो)


राजीव गांधी सरकार की वजह से नहीं मिला हक

इधर, जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका विरोध कर रही थी, तब केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी. राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पारित कर दिया. इस अधिनियम के जरिए सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को ही पलट दिया.

ब्रेन हेमरेज से शाहबानो की हो गई मौत

बहरहाल, अब इस फैसले के आने के बाद से तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं में खुशी का माहौल है, लेकिन इसे देखने के लिए शाहबानो इस दुनिया में नहीं हैं. दरअसल, ढलती उम्र की वजह से शाहबानो बीमार रहने लगी थीं. जानकारी मुताबिक पति से तलाक के बाद ही उनकी सेहत बिगड़ने लगी थी. इसके बाद साल 1992 में ब्रेन हैमरेज से शाहबानो की मौत हो गई.

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First published: July 31, 2019, 9:12 AM IST
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