AIIMS का एक डॉक्टर, जिसकी वजह से बदल गया MP की 47 आदिवासी सीटों का गणित

जयस की मांग है अबकी बार आदिवासी सरकार. जयस ने घोषणा की है कि वो 80 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी.

Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: October 11, 2018, 9:04 PM IST
AIIMS का एक डॉक्टर, जिसकी वजह से बदल गया MP की 47 आदिवासी सीटों का गणित
डॉ हीरालाल अलावा
Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: October 11, 2018, 9:04 PM IST
मध्य प्रदेश के आदिवासी बेल्ट की 47 सीट्स चुनावी हार-जीत तय करती हैं. कभी कांग्रेस का मजबूत किला रहीं ये सीट्स अब भाजपा के कब्ज़े में हैं. 2013 के चुनाव में 32 सीटों पर कब्ज़ा जमाकर भाजपा ने चुनाव की धारा बदल दी थी. लेकिन इस बार यह आसान नहीं है. और इसकी वजह हैं एम्स में रेजिडेंट डॉक्टर रह चुके डॉ. हीरालाल अलावा.

डॉ. हीरालाल अलावा ने इन 47 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा दोनों का गणित बिगाड़ दिया है. जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) के आंदोलनों ने दोनों ही पार्टियों की नींद उड़ा दी है. जयस की मांग है 'अबकी बार आदिवासी सरकार'. जयस ने घोषणा की है कि वो 80 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. जयस की बढ़ती ताकत का असर ये है कि कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया उनके सम्मेलन में पहुंच जाते हैं तो भाजपा अपने वरिष्ठ आदिवासी नेता फग्ग्नसिंह कुलस्ते को इन युवा नेताओं से बातचीत के लिए कहती है. डॉ. हीरालाल अलावा से इन तमाम मुद्दों पर न्यूज 18 ने बातचीत की.

सवाल- माना जा रहा है कि चुनाव से पहले जयस या तो कांग्रेस की बी-टीम है, जिसका काम भाजपा के वोट काटना है.
जवाब- यह गलत आंकलन है. जयस अपनी ताकत पर चुनाव लड़ रहा है. प्रदेश की 80 सीटों पर हमारे उम्मीदवार मैदान में उतरेंगे. सामान्य सीटों पर जहां आदिवासी बहुतायात में हैं वहां भी हम चुनाव लड़ेंगे.

सवाल- आपकी किसान महापंचायत में फिल्म अभिनेता गोविंदा कैसे पहुंच गए? कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया भी वहां चुपके से पहुंच गए थे.
जवाब- किसान महापंचायत में हमने बता दिया कि हमारी ताकत क्या है. गोविंदा को हमारे युवा आदिवासी कार्यकर्ता बहुत पसंद करते हैं. हमने नाना पाटेकर और मिथुन चक्रवर्ती को भी बुलाया था. ये लोग हमारे आंदोलन से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं. रहा सवाल बावरिया का तो वे आए थे. लेकिन तब सम्मेलन खत्म हो रहा था. इसके पहले भी भाजपा नेता अनुसुइया उइके, रंजना बघेल हमारे साथ आ चुकी हैं. दरअसल ट्राइबल बेल्ट में जिसके भी टिकट खतरे में हैं वे नेता यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि जयस हमारे साथ है.

सवाल- अगर जयस कांग्रेस की बी टीम नहीं है तो इसे फंडिंग कौन कर रहा है.
जवाब- हमें फंड की ज़रूरत ही नहीं है. हमारे जो भी कार्यक्रम हो रहे हैं उसमे हम कोई भोजन भंडारा नहीं करते. जितनी भी भीड़ आती है उनसे हम सहयोग लेते हैं. गांव के सरपंच, कुछ ट्रांसपोर्टस हमारी मदद कर देते हैं.

सवाल- व्यापम के व्सिहलब्लोअर डॉ. आनंद राय और आशीष चतुर्वेदी को भी जयस टिकट दे रहा है?
जवाब – हां बातचीत चल रही है. सामान्य सीटों पर ये लोग चुनाव लड़ेंगे. कुछ किसान भी जयस के बैनर पर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

सवाल- जयस आंदोलन किस तरह शुरू हुआ? दिल्ली एम्स में रेसीडेंट डॉक्टर का काम छोड़कर फिर गांव में कैसे लौटे?
जवाब- मैं आदिवासी परिवार का हूं. कुक्षी के पास भैंसलाई गांव में बड़ा हुआ हूं. वहां से इंदौर, रीवा जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई की. उसके बाद रेहमोटोलॉजी में एम्स में दाखिला लिया. फिर वहीं रेसीडेंट डॉक्टर हो गया. दिल्ली में तो था लेकिन दिल अपने गांव की तरफ खींच रहा था. बार बार महसूस होता था कि मैं तो डॉक्टर बन गया हूं लेकिन मेरे समाज के लोगों के हालात नहीं सुधर रहे हैं. 2016 में हमने सोशल मीडिया के माध्यम से अपने आदिवासी युवाओं को जोड़ा और दो ही साल में अपनी ताकत बता दी.

सवाल- जयस के मुद्दे क्या हैं?
जवाब- आज हर गांव में नारा गूंज रहा है अबकी बार आदिवासी सरकार. इसकी वजह यह है कि अनुसूचि 5 के तहत अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष अधिकार दिए गए हैं. लेकिन इस पर किसी भी सरकार ने कोई काम नहीं किया है. आदिवासी पुलिस की ज्यादतियों का शिकार है. मध्यप्रदेश में पिछले 15 साल में 22 सौ अरब से ज़्यादा पैसा ट्राइबल वैलफेयर के तहत आया है. लेकिन कहानी ये है कि देश का सबसे गरीब ज़िला अलीराजपुर है. स्कूल, अस्पताल, दूर-दूर तक नहीं हैं. बड़ी संख्या में बेदख़ली हो रही है. कभी सीमेंट फैक्ट्री के नाम पर तो कभी स्पेशल इकॉनॉमी ज़ोन के नाम पर. काम नहीं है आदिवासी अपनी ज़मीन से पलायन कर रहा है.

सवाल- सरकार मकान बनाकर दे रही है? शौचालय बन रहे हैं? कई और योजनाएं हैं?
जवाब- सारी योजनाएं आदिवासियों को ध्यान में रखकर बनाई ही नहीं गई हैं. प्रशासन ने योजना में मकान तान दिए. लेकिन ये नहीं देखा कि आदिवासी ना तो कूलर चलाता है ना पंखा. वो तो मिट्‌टी के मकानों में रहता है जो कभी गरम नहीं होते. शौचालय की बात करें तो घर के सामने बना दिए हैं. आदिवासी औरतें मीलों दूर जाकर पीने का पानी लेकर आ रही हैं. शौचालय के लिए पानी कहां से आएगा.

सवाल – प्रदेश की शिवराज सरकार ने भी बहुत सी योजनाओं को लागू किया है?
जवाब- हमने तो बहुत छोटी-छोटी मांगें रखी थीं. 25 सूत्री फॉर्मूला मुख्यमंत्री को सौंपा था. जिसमें हाल-फिलहाल का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा दस हजार शिक्षाकर्मियों की भर्ती का था. हमने कहा था कि आदिवासी युवा इसका फायदा नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि सरकार ने बीएड, डीएड कॉलेज ट्राइबल इलाकों में खुलने नहीं दिए हैं. ये प्रावधान हटा दिया जाए ताकि आरक्षित वर्ग का युवा इसका लाभ ले सके. लेकिन मुख्यमंत्री ने आश्वासन देने के बाद भी इस पर कुछ नहीं किया है. वनाधिकार क्षेत्र के जो पट्‌टे हैं वे भी आदिवासियों को नहीं दिए गए हैं. इसका बड़ा नुकसान आदिवासियों को हो रहा है. मनावर क्षेत्र में 35 गांवों को उजाड़ा जा रहा है. हम उसके ख़िलाफ भी सरकार से कई बार बातचीत कर चुके हैं लेकिन नतीजा सिफर ही रहा.

सवाल- चुनावी राजनीति में शामिल होकर क्या करना चाहते हैं.
जवाब- हमारी तो एक ही मांग है अबकी बार आदिवासी सरकार. जिसे हासिल करने के लिए हम अपनी ताकत झोंक रहे हैं.

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