क्या उमा भारती के लिए आसान है मुख्यधारा की राजनीति में लौटना?

उमा भारती लंबे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी की कोशिश कर रही हैं.

उमा भारती लंबे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी की कोशिश कर रही हैं.

2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी उमा भारती के जरिए उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने की उम्मीद लगाए हुए थी लेकिन सफलता नहीं मिली. उमा भारती लंबे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी की कोशिश कर रही हैं.

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हिंदुत्व की राजनीति का चेहरा माने जाने वाली साध्वी उमा भारती चुनावी राजनीति में वापस लौटना चाहती हैं. उमा भारती इन दिनों मध्यप्रदेश में ज्यादा सक्रिय हैं. एक दशक से भी अधिक समय से वे उत्तर प्रदेश में सक्रिय थीं. भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही उमा भारती के विरोधियों की संख्या काफी है. उनके विरोधी कभी नहीं चाहेंगे कि वे अब कोई भी चुनाव लड़े. उमा भारती मध्यप्रदेश की मूल निवासी हैं. 2014 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की झांसी लोकसभा सीट से लड़ा था. उनके राजनीतिक कद में इजाफा वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साल पुरानी कांग्रेस की सरकार को बाहर का रास्ता दिखाने से हुआ था.

मध्यप्रदेश की राजनीति में लौटने की कोशिश

उमा भारती लगभग आठ माह ही मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह पाईं. वे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं. उनके नेतृत्व में ही वर्ष 2003 में भारतीय जनता पार्टी की मध्यप्रदेश की सत्ता में वापसी हुई थी. पार्टी ने राज्य में पहली बार मुख्यमंत्री के चेहरे का नाम सामने रखकर चुनाव लड़ा था. पार्टी के कई दिग्गज इससे हाशिए पर चले गए थे. उमा भारती के नेतृत्व में पार्टी विधानसभा की रिकार्ड सीटें जीतने में कामयाब रही थी. कर्नाटक के हुबली की एक अदालत द्वारा दस साल पुराने मामले में गैर जमानती वारंट जारी किए जाने के कारण अगस्त 2004 में उमा भारती ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. हुबली का मामला तिरंगा फहराने से जुड़ा था. उमा भारती मुख्यमंत्री का पद छोड़कर देश व्यापी तिरंगा यात्रा पर निकल पड़ी थी. पार्टी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी बाबूलाल गौर को सौंप दी थी. पार्टी में विरोधियों के हावी होने के कारण उमा भारती मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कभी वापसी नहीं कर सकी थीं. गौर के स्थान पर शिवराज सिंह चौहान को राज्य का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उन्होंने भारतीय जनशक्ति पार्टी के नाम से अलग पार्टी बना ली थी. वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी कोई चमत्कार नहीं कर सकी.

पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना के कारण उन्हें दूसरी बार कार्यवाही का सामना करना पड़ा था. पार्टी में उनकी वापसी इस शर्त पर हुई थी कि वे मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी नहीं करेंगीं. उमा भारती ने इस शर्त को स्वीकार किया था. वे महोबा जिले की चरखारी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ीं. विधायक बनीं. 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी उमा भारती के जरिए उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने की उम्मीद लगाए हुए थी लेकिन सफलता नहीं मिली. उमा भारती लंबे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी की कोशिश कर रही हैं. माना यह भी जाता है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में वापसी के लिए ही उन्होंने वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव न लड़ने का दांव खेला था. इससे उत्तर प्रदेश से पीछा छूट गया?
गंगा के बहाव में किस तट पर मिलेगा किनारा

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में उमा भारती के संरक्षक के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी बड़ी भूमिका में रहे हैं. 1992 में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के मामले में जो प्रमुख आरोपी रहे हैं, उनमें उमा भारती भी हैं. वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी भाजपा नीत सरकार में उमा भारती प्रमुख भूमिका में रहीं. उन्हें गंगा नदी के संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई. वे जल संसाधन विभाग की मंत्री बनाई गईं. उमा भारती ने अपनी भावी भूमिका को लेकर मंगलवार को एक साथ तीस ट्वीट किए. इनमें अधिकांश ट्वीट में गंगा नदी का जिक्र है. उमा भारती ने एक ट्वीट में लिखा, "प्रधानमंत्री जी ने बनारस में कहा था कि मुझे गंगा ने बुलाया है तथा केदारनाथ जी में कहा था कि मुझे हिमालय ने भेजा है." साध्वी भारती ने अपने ट्वीट में कुछ पुराने घटनाक्रमों का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा कि गंगा की पदयात्रा करने के लिए वर्ष 2019 का चुनाव न लड़ने का फैसला किया. एक ट्वीट में उन्होंने पार्टी को चुनाव जिताने के लिए दिए गए योगदान का भी जिक्र किया. चुनावी राजनीति की मुख्यधारा में आने के लिए उमा भारती ने गंगा की धारा का सहारा लिया है. उन्होंने कहा कि वे वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती हैं. चुनाव से पहले पार्टी संगठन में अपना योगदान देना चाहती हैं.

कोरोना की दूसरी लहर में गंगा की धारा का सहारा क्यों?



कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर हजारों लोगों की जान ले चुकी है. सैकड़ों शव गंगा की धारा के साथ बहते दिखाई दे रहे हैं. आरोप यह लग रहा है कि यह शव उत्तर प्रदेश से बहकर बिहार पहुंचे हैं. उमा भारती ने कोरोना से हो रहीं मौतों का कोई जिक्र अपने ट्वीट में नहीं किया. लेकिन एक ट्वीट बेहद दिलचस्प है. इस ट्वीट में उन्होंने लिखा कि गंगा एवं हिमालय के संबंध में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिन्हें सार्वजनिक नहीं कर रही किंतु इस विषय पर ठीक से एवं विस्तार से मैंने मोदी जी को अमित शाह जी को हमारे वर्तमान संगठन मंत्री बीएल संतोष जी को प्रमाण सहित समझाया है. उमा भारती के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापस जाना आसान नजर नहीं आता है. मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के उपाध्यक्ष भूपेन्द्र गुप्ता कहते हैं कि भाजपा के लिए उमा भारती की अब कोई उपयोगिता नहीं बची है.

प्रधानमंत्री मोदी के रुख पर निर्भर है भविष्य

उमा भारती का भविष्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख पर निर्भर करेगा. उमा भारती ट्वीट से भी यही संकेत मिलते हैं. उन्होंने लिखा कि मेरा आज भी प्रधानमंत्री पर भरोसा है. उन्होंने यह भरोसा गंगा नदी के संदर्भ में व्यक्त किया है लेकिन इसके कई राजनीतिक अर्थ हैं. लोकसभा चुनाव के बाद से ही उमा भारती मध्यप्रदेश की राजनीति में वापस अपने पैर जमाना चाहती हैं. 28 सीटों के विधानसभा उप चुनाव के अलावा दमोह उप चुनाव में प्रचार में भी साध्वी सक्रिय दिखाई दी. राज्य में जहरीली शराब से जब लोगों की जान गई तो साध्वी ने शराबबंदी के लिए आंदोलन शुरू करने की घोषणा कर सभी को चौंका दिया. यद्यपि बाद में वे इस दिशा में सक्रिय दिखाई नहीं दी हैं. भाजपा प्रवक्ता आशीष अग्रवाल कहते हैं कि उमा जी का गंगा और हिमालय प्रेम किसी से छुपा नहीं है. उमा भारती लोधी समुदाय से हैं. इस समुदाय के प्रहलाद पटेल केन्द्र में मंत्री हैं. मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में लोधी वोटर काफी निर्णायक हैं. राज्य भाजपा में इन दिनों दमोह उप चुनाव में मिली हार पर बवाल मचा हुआ है. पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया सहित कई भाजपा पदाधिकारियों पर चुनाव हराने के आरोप लग रहे हैं. पार्टी में चल रही उठापटक के बीच उमा भारती के ट्वीट से हलचल तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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