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OPINION: झाबुआ उपचुनाव की जीत के साथ मजबूत हुए कमलनाथ, अब सरकार गिराना नहीं होगा आसान

News18 Madhya Pradesh
Updated: October 25, 2019, 6:28 PM IST
OPINION: झाबुआ उपचुनाव की जीत के साथ मजबूत हुए कमलनाथ, अब सरकार गिराना नहीं होगा आसान
कमलनाथ के विरोधियों के लिए बड़ा संदेश लेकर आई है झाबुआ की जीत

झाबुआ विधानसभा उपचुनाव (Jhabua Byelection) की जीत सीएम कमलनाथ (Cm Kamalnath) के लिए बड़ा सुकून लेकर आई है. इस जीत से कमलनाथ पार्टी के बाहर और भीतर दोनों ही जगहों पर मज़बूत हुए हैं. अब वो आंखें दिखाने वाले अपने मंत्रियों (Ministers) को उनकी जगह दिखा सकते हैं, और पार्टी के दूसरे दिग्गजों को भी उनका साथ देना पड़ेगा.

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दिनेश गुप्ता

झाबुआ विधानसभा (Jhabua Assembly) का उपचुनाव (Byelection) जीतने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ (Cm Kamalnath) की यह चिंता काफी हद तक दूर हो गई है कि भारतीय जनता पार्टी (Bjp) उनके विधायकों को तोड़कर सरकार गिरा सकती है. कमलनाथ बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के विधायकों के दबाव से भी मुक्त हो जाएंगे.

चुनाव रिजल्ट के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही है. वे कहते हैं कि झाबुआ का वोटर भाजपा की सच्चाई को जान चुका था, इस कारण उसने आम चुनाव में की गई भूल को सुधारने में देरी नहीं की. अब कांग्रेस के क्षत्रप भी कमलनाथ के पीछे खड़े होने को मजबूर हो गए हैं.

कांग्रेसी विधायकों का भी कमलनाथ पर दबाव कम होगा

पिछले साल हुए विधानसभा के आम चुनाव में कांग्रेस को कुल 114 सीटें मिलीं थीं. बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है. 230 सदस्यों वाली विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को 109 सीटें मिलीं थीं. कांग्रेस को सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने के कारण सरकार बनाने का मौका मिला था. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और निर्दलीय विधायकों की मदद से सरकार बनाई थी.

सदन में स्पष्ट बहुमत न होने के कारण कई मौकों पर समर्थन देने वाले विधायक धमकी देते हुए भी दिखाई दिए. कांग्रेस के भीतर भी स्थिति सामान्य नहीं थी. दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक विधायक भी कई बार बागी तेवरों के साथ दिखाई दिए. विधायकों के संख्या बल में दिग्विजय सिंह के भारी होने के कारण सरकार उनके इशारे पर चलती नजर आई.

राज्य के वन मंत्री उमंग सिंघार ने तो दिग्विजय सिंह की भूमिका पर सवाल भी खड़े किए. दिग्विजय सिंह खुद भी गाहे-बगाहे सरकार की खिंचाई करने में नहीं चूके. तीन दिन पहले ही दिग्विजय सिंह के छोटे भाई चांचौडा के विधायक लक्ष्मण सिंह ने धरना देकर सभी को चौंका दिया था. लक्ष्मण सिंह ने दिग्विजय सिंह के भोपाल स्थित आवास पर धरना दिया था. उनकी मांग चांचौडा को जिला बनाने की है.
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लक्ष्मण सिंह की पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई मुलाकात को भी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़कर देखा गया. लक्ष्मण सिंह पहले भी एक बार भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन कर चुके हैं. इस कारण उनकी भूमिका को लेकर हमेशा ही संशय बना रहता है. पिछले 10 माह में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार को स्थिर रखने की हर संभव कोशिश की है.

कांग्रेस के सभी क्षत्रपों से सुंतुलन बनाकर सरकार चलाने की कोशिश वे लगातार करते नजर आए. झाबुआ उप चुनाव में मिली जीत के बाद कमलनाथ के सामने सरकार बचाने की बड़ी चुनौती समाप्त हो चुकी है. एक निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को वे पहले ही अपने मंत्रिमंडल में जगह दे चुके हैं.

जायसवाल के समर्थन के साथ ही विधायकों की कुल संख्या 116 हो जाती है. मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि भाजपा नेताओं को हार पची नहीं, इस कारण वे लगातार अपने बयानों से सरकार को कमजोर करने की कोशिश करते रहे हैं.

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बसपा-सपा विधायक कर सकते हैं दल बदल
झाबुआ में मिली पराजय को स्वीकार करना भाजपा नेताओं के लिए मुश्किल भरा दिखाई दे रहा है. भाजपा अपनी हार पर यह कह कर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है कि झाबुआ कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है.

प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल का आरोप है कि चुनाव सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर जीता गया है. भाजपा ने आम चुनाव में यह सीट जीती थी. इस सीट से विधायक चुने गए गुमान सिंह डामोर ने लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफे के बाद से ही कमलनाथ झाबुआ पर नजर बनाए हुए थे. झाबुआ की सीट उनकी सरकार के लिए संजीवनी के रूप में सामने आई.

लेकिन, भाजपा नेता सरकार गिराने की संभावनाएं तलाश करते रहे. इससे उलट मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विधानसभा के मानसून सत्र में भारतीय जनता पार्टी के दो विधायक नारायण त्रिपाठी और ब्यौहारी के विधायक शरद कौल को अपने पाले में लाकर सभी को चौंका दिया था. हालांकि ये दोनों विधायक कांग्रेस शामिल नहीं हुए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में मनोवैज्ञानिक दबाव जरूर बन गया.

झाबुआ उप चुनाव की वोटिंग से ठीक पहले त्रिपाठी फिर से भाजपा के पाले में चले गए हैं. त्रिपाठी और कौल को अपने साथ लाकर कमलनाथ ने यह स्पष्ट संकेत तो दे ही दिया था कि वे चाहें तो भाजपा के विधायक तोड़कर भी अपनी सरकार चला सकते हैं.

मुख्यमंत्री कमलनाथ पर समर्थन देने वाले बसपा-सपा विधायकों का दबाव भी नहीं चला. निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह शेरा की धमकियों को भी उन्होंने नजरंदाज़ किया. ताजा चुनाव परिणामों के बाद इस बात की संभावना बढ़ गई है कि बसपा और सपा के विधायक दल-बदल कर कांग्रेस में शामिल हो जाएं.

राज्य में बसपा के दो और सपा का एक विधायक है. ये विधायक यदि कांग्रेस में शामिल होते हैं तो दलबदल कानून के दायरे में नहीं आएंगे. उप चुनाव के नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने पुराने बयानों पर सफाई देते हुए नजर आ रहे हैं.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह कहते हैं कि हमने कभी नहीं कहा कि कमलनाथ की सरकार को गिरा देंगे. राकेश सिंह सफाई देते कहते हैं कि हमने यह कहा था कि कांग्रेस अपने नेताओं के अंतर विरोधों के चलते गिर जाएगी.

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झाबुआ की जीत से अपनी पार्टी में भी मज़बूत हुए हैं कमलनाथ


भूरिया के बहाने असंतुष्ट मंत्रियों को घर बैठा सकते हैं कमलनाथ
झाबुआ उपचुनाव में मिली जीत के बाद कांग्रेस के सभी बड़े नेता मुख्यमंत्री कमलनाथ के पीछे खड़े नजर आ रहे हैं. पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट के जरिए जीत के लिए कांतिलाल भूरिया को बधाई दी. सिंधिया, भूरिया का प्रचार करने के लिए झाबुआ नहीं गए थे. वे महाराष्ट्र में व्यस्त थे.

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव ने जीत का श्रेय मुख्यमंत्री कमलनाथ को देते हुए कहा कि प्रदेशवासियों का विश्वास कमलनाथ सरकार पर है. अरुण यादव के भाई सचिन यादव, कमलनाथ सरकार में कृषि मंत्री हैं.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने झाबुआ की जीत पर कहा कि देश की जनता में भाजपा को लेकर निराशा है. भाजपा को लेकर कमलनाथ के तेवर भी आक्रामक हो गए हैं. वे कहते हैं कि चार माह में ही देश के लोग भाजपा की असलियत को समझ चुके हैं. भूरिया को मिली जीत के बाद यह तय माना जा रहा है कि कमलनाथ उन्हें मंत्रिमंडल में जगह देंगे.

कमलनाथ मंत्रिमंडल के विस्तार की अटकलें लंबे समय से चल रहीं हैं. मंत्रिमंडल में कुल छह जगह खाली हैं. कमलनाथ, लगातार मौजूदा मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा भी करते रहते हैं. जिन मंत्रियों का काम संतोषजनक नहीं पाया है, उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया भी जा सकता है. उनके स्थान पर नए चेहरों को शामिल कर कमलनाथ सरकार के स्थिर होने का संदेश देने से भी चूकेंगे नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: October 25, 2019, 5:16 PM IST
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