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भोपाल गैस त्रासदी: जब पीड़ितों के हक की लड़ाई के लिए जब्बार भाई ने खड़ी कर दी थी महिलाओं की फौज

News18India
Updated: November 15, 2019, 7:23 PM IST
भोपाल गैस त्रासदी: जब पीड़ितों के हक की लड़ाई के लिए जब्बार भाई ने खड़ी कर दी थी महिलाओं की फौज
अब्दुल जब्बार. (फाइल फोटो)

अब्दुल जब्बार (Abdul jabbar) के सामने कई बार ऐसे प्रलोभन (Temptation) आए कि वो गैस पीड़ितों (Gas victims) की लड़ाई छोड़ दें. इसके बदले में वह मोटी कीमत ले लें. लेकिन तब भी जब्बार भाई का ईमान नहीं डगमगाया.

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  • Last Updated: November 15, 2019, 7:23 PM IST
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(दिनेश गुप्ता)

भोपाल. भोपाल (Bhopal) में आज भी ऐसे लाखों लोग हैं, जो गैस त्रासदी (Gas Tragedy) का दर्द लिए जिदंगी का बोझ उठा रहे हैं. अब्दुल जब्बार (Abdul Jabbar) के निधन के बाद से उनका दर्द बांटने वाला भी दुनिया से चला गया है. अब कोई गैस पीड़ितों की आवाज बनने वाला भी नहीं रहा. अब्दुल जब्बार ही अकेले वो शख्स थे, जिनके कारण दुनिया भर में गैस त्रासदी (Gas Tragedy) के सच को लोगों ने जाना था. जब्बार ने कई प्रलोभनों के बाद भी गैस पीड़ितों की लड़ाई नहीं छोड़ी थी. भोपाल गैस कांड का जिक्र आते ही एक शख्स का चेहरा सामने आ जाता था. यह चेहरा अगर कोई था तो केवल अब्दुल जब्बार का था.

प्रलोभनों पर भी नहीं डगमगाया ईमान
गैस कांड के बारे में हर जानकारी जब्बार भाई चुटकियों में दे देते थे. गैस पीड़ितों की लड़ाई छोड़ने के लिए जब्बार भाई को कई तरह के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर प्रस्ताव मिलते रहते थे. कई लोगों ने ऐसे प्रस्ताव स्वीकार कर गैस पीड़ितों का साथ भी छोड़ दिया था. लेकिन अब्दुल जब्बार अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए. गैस कांड की शिकार महिलाओं को साथ लेकर वे मैदानी और कानूनी लड़ाई लगातार लड़ते रहे. अब्दुल जब्बार द्वारा स्थापित संगठन का नाम 'गैस पीड़ित महिला उघोग संगठन' है. भोपाल में जब भी कोई आंदोलन गैस पीड़ितों की मांगों के लिए होता था तो उसमें महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा होती थी.

जब्बार के प्रयासों से खुला भोपाल मेमोरियल अस्पताल
अब्दुल जब्बार के प्रयासों से ही यूनियन काबाईड के संचालकों के खिलाफ कोर्ट ने आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की. ये बात दूसरी है कि काबाईड के संचालकों को मुकादमा चलाने के लिए भारत सरकार देश की अदालत के सामने खड़ा नहीं कर सकी. जब्बार के प्रयासों से गैस पीड़ितों के इलाज के लिए भोपाल मेमोरियल अस्पताल खुला. 2010 में भारत सरकार द्वारा भोपाल मेमोरियल अस्पताल ट्रस्ट (बीएमएचटी) पर नियंत्रण के बाद, बी.एम.एच.आर.सी. को परमाणु ऊर्जा विभाग और बायो- टेक्नोलॉजी विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में रखा गया. 2012 में अस्पताल का प्रबंधन आईसीएमआर को और फिर 2015 में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) को सौंप दिया गया था.

जब्बार का इलाज नहीं कर पाया आधुनिक अस्पताल
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अब्दुल जब्बार को अपने अंतिम दिनों में इस अस्पताल में भी इलाज नहीं मिल पाया था. इसकी जानकारी खुद जब्बार ने अपने मित्रों को सोशल मीडिया के जरिए दी. जब्बार ने लिखा कि मेरे प्रिय दोस्त जेपी के कहने पर मैं अपने पैर के इलाज के लिये बीएमएचआरसी चला आया. अस्पताल के डायरेक्टर ने उनको उत्साह और विश्वास के साथ भर्ती कर लिया कई तरह के इन्वेस्टीगेशन कराए गये, लेकिन 11 दिन के बाद ही उन्होने जेपी को कहा कि ये इलाज हमीदिया अस्पताल में ही मुमकिन हो पायेगा. क्योंकि उन्के पास उस तरह के विशेषज्ञ नहीं हैं.

जब्बार ने अपनी बीमारी के बारे में यह लिखा

जब्बार ने लिखा कि यह बात मॉनीटरिंग कमेटी को भी बताई जायेगी. जब्बार के लिए यह वक्त बेहद तकलीफदेह था. जिस अस्पताल को सबसे आधुनिक अस्पताल मान रहे थे, उसमें विशेषज्ञ ही नहीं थे. भोपाल के उस अस्पताल में जाने की सलाह मिली, जिसकी व्यवस्था को लेकर लोग असंतुष्ट रहते हैं. जब्बार ने लिखा कि इससे बड़ी शर्मनाक और कोई बात नहीं होगी कि सुपर स्पेशलिटी कहे जाने वाले इस अस्पताल में लगभग 13 वर्षो बाद भी आधुनिक सुविधाए प्राप्त नहीं हैं.

मुआवजे के प्रकरण में अंतिम फैसला नहीं सुन पाए जब्बर

पिछले साल गैस कांड की 34 वीं बरसी पर अब्दुल जब्बर इस बात से खुश थे कि गैस पीड़ितों को पांच गुना मुआवजा देने के लिए जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उस पर सुनवाई अप्रैल 2019 से शुरू हो जाएगी. ऐसा आश्वासन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की ओर से मिला था. पांच गुना मुआवजा देने की याचिका 2004 में दायर की गई थी. भारत सरकार ने भी एक क्यूरेटिव पिटिशन दायर की थी. 2010 में दायर की गई पिटिशन पर भी सुनवाई नहीं हुई.

यह पिटिशन गैस पीड़ितों के मामले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ थी. गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की पिटिशन को सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार की क्यूरेटिव पिटिशन के साथ जोड़ दिया था. इस पिटिशन पर कोई फैसला अब तक नहीं आया है. अब्दुल जब्बार का 14 नवंबर को निधन हो गया. जब्बर के निधन से उनके संगठन की महिला सदस्यों के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि उनकी लड़ाई अब कौन लड़ेगा?

गैस कांड का शिकार था जब्बार का परिवार

भोपाल का शाहजहांनी पार्क अब्दुल जब्बार के संगठन द्वारा किए गए कई प्रदर्शनों और आंदोलनों का गवाह है. यह पार्क अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण गैस कांड के शिकार लोगों के एकत्रित होने के लिए काफी सुविधाजनक था. जब्बार, 1984 की गैस त्रासदी की पीड़ित महिलाओं के संगठन से जुड़े थे और उन्हें हक दिलाने के लिए जिंदगी भर जुटे रहे. अपने संगठन के माध्यम से वह पीड़ितों के परिवार की मदद करते थे और उनकी बात को सरकार तक पहुंचाने का भी काम करते थे.

गैस त्रासदी में अब्दुल जब्बार ने अपने माता-पिता को भी खो दिया था. यहां तक कि उनके फेफड़े और आंखों पर भी असर पड़ा था. भोपाल गैस की तबाही ऐसी थी कि हवा जिस ओर भी बहती थी लोगों की मौत होती चली जाती थी.

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First published: November 15, 2019, 4:42 PM IST
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