भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने जजों को दी जेंडर संवेदनशीलता का पाठ पढ़ने की नसीहत

मप्र हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से लैंगिक समानता को लेकर किए जा रहे प्रयासों को बल मिला है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मप्र हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से लैंगिक समानता को लेकर किए जा रहे प्रयासों को बल मिला है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Gender Sensitivity Issue: पिछले कुछ अरसे में अदालतों से कुछ ऐसे फैसले निकल कर आए हैं, जिन्होंने लैंगिक समानता, यौन उत्पीड़न आदि को लेकर लड़ी जा रही लड़ाई और सरकारी प्रयासों को पीछे धकेलने का प्रयास किया. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे फैसलों पर रोक लगाकर इंसाफ की नाक बचा ली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 8:23 PM IST
  • Share this:
भोपाल. यह खबर हम सबके काम की और समझने वाली है कि वास्तव में देश में न्यायिक सुधार (Judicial Reforms) के कदमों को आगे बढ़ाने और जजों, वकीलों को लैंगिक संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाये जाने की कितनी जरूरत है. क्योंकि पिछले कुछ अरसे में निचली नहीं, बल्कि हाईकोर्ट्स से भी कुछ ऐसे फैसले आए हैं, जिन्होंने न सिर्फ न्याय व्यवस्था को शर्मिंदा किया, बल्कि लैंगिक समानता, भेदभाव, यौन उत्पीड़न, न्याय आदि मुद्दों को लेकर दशकों से महिला संगठनों द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई के फलस्वरूप हासिल अधिकारों और सरकार के स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को पीछे धकेलने का प्रयास किया है. भला हो सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का जिसने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच और उससे पहले महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के फैसलों को न सिर्फ खारिज किया, बल्कि जजों को रूढ़िवादी सोच से बचने के लिए नसीहतें भी दीं.

बता दें कि बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाइकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस रोहित आर्या की सिंगल बेंच के उस फैसले को खारिज दिया, जिसमें महिला से छेड़छाड़ के आरोपी को जमानत दी गई थी. अदालत ने लॉकडाउन के दौरान 30 जुलाई 2020 को एक 30 वर्षीय विवाहित महिला के घर में घुसकर उससे छेड़छाड़ करने के आरोपी विक्रम बागरी को 50 हजार के मुचलके पर सशर्त जमानत दे दी थी. अदालत ने आदेश में लिखा था कि आरोपी रक्षाबंधन के दिन महिला के घर जाएगा, उसे राखी बंधवाएगा और रक्षा का वचन देगा.

महिला वकीलों ने दी थी फैसलों को चुनौती

आगे पढ़ें
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज