Analysis: गुड गवर्नेंस के साथ सरकार को बचाए रखना, कमलनाथ सरकार के सामने है दोहरी चुनौती
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Analysis: गुड गवर्नेंस के साथ सरकार को बचाए रखना, कमलनाथ सरकार के सामने है दोहरी चुनौती
फाइल फोटो

2019 की ऐतिहासिक हार के बाद अब मध्यप्रदेश की कमनाथ सरकार अब दो मोर्चों पर जूझती दिखाई दे रही है. एक है अपनी सरकार को टिकाए रखना दूसरा है और दूसरा राज्य में गुड़ गवर्नेंस को साबित करना.

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लोकसभा चुनाव 2019 की ऐतिहासिक हार के बाद अब मध्यप्रदेश की कमनाथ सरकार अब दो मोर्चों  पर जूझती दिखाई दे रही है. एक है अपनी सरकार को टिकाए रखना दूसरा है और दूसरा राज्य में गुड़ गवर्नेंस को साबित करना.  फिलहाल 166 दिन की सरकार की उपलब्धि यह है कि सिर्फ 5 महीनों में सत्ता से बेदखल भाजपा ने अपना 17 फीसदी वोट बढ़ा लिया है. जिसकी एक बड़ी वजह गवर्नेंस के नाम पर सरकार की नाकामयाबी भी है. 166 दिन में सरकार में साढ़े चार सौ से ज्यादा आईएएस- आईपीएस अफसरों ट्रांसफर किए हैं.  निचले स्तर पर जाएं तो यह आंकड़ा 15 हजार से ज्यादा है. सबसे खराब हालत बिजली सप्लाई सिस्टम के लुढ़कने का है. बिजली कटौती से प्रदेश में फिर अंधेरा छाने लगा है.

दिशाहीन ट्रांसफर-

जिस प्रशासनिक कसावट और चुस्ती के लिए कमलनाथ जाने जाते हैं वह फिलहाल मध्यप्रदेश में दिखाई नहीं दे रहा है. चुनाव से पहले और चुनाव के बाद धडल्ले से हो रहे ट्रांसफर पोस्टिंग ने सरकार की कार्य प्रणाली को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है. ऐसे कई अफसर हैं जो तीन-तीन बार ट्रांसफर हुए हैं. जिससे टॉप लेवल ब्यूरोक्रेसी में हडकंप बना हुआ है. पूर्व सीएस केएस शर्मा ने तो मीडिया में खुलकर बयान दिया है कि -बिना किसी विशेष कारण और सिद्धांत के तबादले हो रहे हैं. यह प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि दिशाहीन और उद्देश्यहीन व्यवस्था हैं.



बिजली की मार-
इन हालातों के बीच प्रदेश में बिजली सप्लाई व्यवस्था पूरी तरह गड़बड़ा गई है. चुनाव के दौरान सरकार ने दो दर्जन से ज्यादा लाइनमैन और तकनीकी स्टाफ को सस्पेंड किया. आरोप लगाया कि वे भाजपा की मानसिकता के हैं और बिजली सरप्लस होने के बावजूद मनचाही कटौती कर रहे हैं. ग्रामीण और शहरी इलाकों में बिजली की सप्लाई को बाधित कर रहे हैं. अब चुनाव हो चुके हैं बावजूद इसके हालात नहीं सुधरे हैं. मुख्यमंत्री स्वयं बिजली विभाग के साथ अब बैठक कर रहे हैं. प्रदेश के विद्युत मंत्री प्रियव्रत सिंह का कहना है कि बिजली कटौती की वजह  शिवराज सरकार है जिसने  मेंटेनेस का काम रोक दिया था. जिसे अब पूरा  करना पड़ रहा है.

कर्जमाफी भारी पड़ी-

हालांकि इन तमाम तर्कों के बावजूद प्रदेश के किसानों और ग्रामीणों ने जिनके दम पर कांग्रेस प्रदेश में लौटी थी, उसने अपना जनादेश दे दिया है. कर्जमाफी योजना का जमीन पर सही तरीके से नहीं उतरना भी भारी पड़ा है. जिससे निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है. आंदोलन की चेतावनी दे चुके किसान संगठनों को अब मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया है कि किसान समन्वय समिति बनाई जा रही है. जो कर्जमाफी को लेकर आ रही दिक्कतों का निपटान करेगी और किसानों की दूसरी समस्याओं पर भी काम करेगी.

शहरों में मात-

प्रदेश के बड़े शहरों में कांग्रेस ने बुरी तरह मात खाई है. इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री ने मेट्रोपॉलिटन एरिया विकसित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है. जिसका फायदा प्रदेश की बिजनेस केपिटल इंदौर को होगा. मेट्रो प्रोजेक्ट्स और इंडस्ट्री हब का विकास इससे संभव हो पाएगा. दरअसल यह इंदौर – भोपाल जैसे शहरों को स्मार्ट सिटी से आगे ले जाने की कवायद है. भाजपा की केंद्र सरकार क्लीन और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट चला रही है लेकिन शहर को मेट्रो सिटी का दर्जा अभी तक नहीं दिया गया है.

साबित करने का मौका-

राजनीतिक विश्लेषक पत्रकार  राघवेंद्रसिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री के लिए यह अवसर खुद को साबित करने का है. उन्हें कुछ कड़े फैसले जनता के हित में करने होंगे. ट्रांसफर – पोस्टिंग के अलावा भी और काम है. खास तौर पर प्रभावशाली प्रशासन देना और लचर व्यवस्थाओं को बदलना. अब काम करने का सही वक्त आया है.

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