क्या कभी टूटेगी MP के इन मज़बूत किलों की दीवार, सियासत के वे गढ़ जहां नहीं होती सेंधमारी

एमपी की सियासत के कुछ किलों में बदलाव का असर कम होता है. इन किलों को भेदना बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल रहा है. इन सीटों में भोपाल, इंदौर, छिंदवाड़ा, गुना-शिवपुरी, झाबुआ-रतलाम, भिंड, दमोह, विदिशा शामिल हैं.

Sharad Shrivastava | News18 Madhya Pradesh
Updated: February 11, 2019, 9:03 PM IST
क्या कभी टूटेगी MP के इन मज़बूत किलों की दीवार, सियासत के वे गढ़ जहां नहीं होती सेंधमारी
फोटो- PTI
Sharad Shrivastava | News18 Madhya Pradesh
Updated: February 11, 2019, 9:03 PM IST
मध्य प्रदेश की सियासत के कुछ किले ऐसे हैं जहां बदलाव का असर कम ही होता है. चुनाव का इतिहास बताता है कि इन किलों को भेदना बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल ही रहा. इन सीटों में भोपाल, इंदौर, छिंदवाड़ा, गुना-शिवपुरी, झाबुआ-रतलाम, भिंड, दमोह, विदिशा शामिल हैं.

19 के अखाड़े के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों में खुद को ज्यादा बड़ा खिलाड़ी साबित करने की होड़ मची है. दोनों के दावे ज्यादा से ज्यादा सीट जीतने के हैं. सरकारें भले बदल जाएं मध्य प्रदेश की सियासत के कुछ किले ऐसे हैं जहां इन बदलाव का असर कम ही होता है.

ये सीटें बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं -



भोपाल लोकसभा सीट - 1989 से यह सीट लगातार बीजेपी के पास है. 1984 लोकसभा चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के केएन प्रधान ने चुनाव जीता था. उसके बाद से 2014 तक यह सीट कांग्रेस फिर कभी नहीं जीत पाई. 2014 में भोपाल लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी के आलोक संजर ने जीत दर्ज की थी.

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इंदौर लोकसभा सीट- इस सीट पर भी कांग्रेस को 1989 से जीत का स्वाद चखने को नहीं मिला. 1984 के लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के प्रकाश चंद सेठी जीते थे. उसके बाद से 2014 तक यह सीट कांग्रेस फिर कभी अपने कब्जे में नहीं कर पाई. लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन का दबदबा इस सीट पर बरकरार है.

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छिंदवाड़ा लोकसभा सीट-छिंदवाड़ा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है. एक तरह से यह सीट कमलनाथ के नाम से पहचानी जाने लगी. 1997 में हुए एक उपचुनाव को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी को कभी इस सीट पर जीत नहीं मिली है. 1951 के बाद से इस सीट पर लगातार कांग्रेस का कब्ज़ा रहा. 1998 से अब तक कमलनाथ लगातार इस सीट से सांसद हैं. उससे पहले भी वे 1980 से 1991 तक इस सीट से सांसद रहे हैं.

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गुना-शिवपुरी-गुना सीट से फिलहाल कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद हैं. यह सीट एक तरह से सिंधिया घराने की सीट बन गयी है. इस पर 1999 से कांग्रेस का कब्ज़ा है. ज्योतिरादित्य 2002 उपचुनाव में पहली बार सांसद चुने गए थे और तब से लगातार सांसद हैं. हालांकि इससे पहले भी यह सीट सिंधिया घराने के कब्जे में ही रही है. 1989 से 1998 तक राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस सीट से सांसद रहीं. यह और बात है कि वे बीजेपी के सिंबल पर सांसद थीं.

इसके अलावा भिंड, दमोह, विदिशा सीटें भी ऐसी हैं जहां 1989 से बीजेपी का कब्जा बरकरार है.
इस बार दोनों दल इन किलों को भेदने की रणनीति बना रहे हैं. सियासत का यह इतिहास देखकर फिलहाल लगता तो यही है कि इन किलों में एक दूसरे के लिए सेंधमारी बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल भरा है.

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