Analysis: विधानसभा चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस ने की ये बड़ी चूक
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Analysis: विधानसभा चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस ने की ये बड़ी चूक
फाइल फोटो

प्रदेश में 29 लोकसभा की सीटें हैं और एक्जिट पोल 3 और ज्यादा से ज्यादा 8 सीटों पर आकर टिक गया है. अगर ये नतीजे सच साबित होते हैं तो कांग्रेस के लिए ये बड़ा झटका साबित होगा.

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सिर्फ छह महीने पहले मध्यप्रदेश में सरकार बनाने वाली कांग्रेस एग्जिट पोल में क्यों डूबती दिखाई दे रही है ?  प्रदेश में 29 लोकसभा की सीटें हैं और एक्जिट पोल 3 और ज्यादा से ज्यादा 8 सीट्स पर आकर टिक गया है. अगर यह नतीजे सच साबित होते हैं तो कांग्रेस के लिए ये बड़ा झटका साबित होगा. माना जा रहा है कि प्रदेश मोदी लहर की चपेट में है. लेकिन हार की उससे भी बड़ी वजह कांग्रेस की अपनी नाकामियां होंगी. सत्ता में काबिज होने के सिर्फ छह महीने बाद ही कांग्रेस ने चुनाव लड़ने और जीतने का जो ड्राइविंग फोर्स था वह खो दिया.

गांवों से भरोसा टूटा-

कांग्रेस अपने सबसे बड़े चुनावी कैंपेन 'अब होगा न्याय'- 72 हजार के सपने को ही अपने वोटबैंक तक नहीं पहुंचा पाईं. जमीन पर इस गरीब हितैषी योजना की कोई आवाज नहीं थी. जबकि गरीबी सूचकांक में देखें तो मध्यप्रदेश देश में चौथें नंबर पर है. कांग्रेस मध्यप्रदेश में अपने ग्रामीण वोटबैंक के भरोसे लौटी. लेकिन छह महीने में ही यह भरोसा टूटता दिखाई दिया.



जमीनी तैयारी नहीं-
मोदी लहर से मुकाबला करने की कोई रणनीति या जमीनी तैयारी कांग्रेस की नहीं थी. मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है लेकिन 0.1 फीसदी वोट भाजपा के पास ज्यादा है. यानी कांग्रेस बिलकुल किनारे पर बैठी हुई है. इसका कोई आभास चुनावी कैंपेन में नहीं था. छह महीने पहले ही कांग्रेस ने भाजपा से 8.5 फीसदी वोटबैंक हथियाया था. यह वोट एससी, एसटी, किसान और कुछ हद तक सर्वणों का था. लेकिन एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि ये वोट कुछ हद तक फिर से भाजपा की ओर लौटता दिखाई दे रहा है.

किसान नाराज-

प्रदेश के किसानों का एक बड़ा तबका ऐसा था जिसने दो लाख रूपये की कर्ज माफी के कारण कांग्रेस का साथ दिया था. लेकिन चुनाव में यह कर्जमाफी ही कमलनाथ सरकार को भारी पड़ गई. कर्जमाफ नहीं होने के आरोप सरकार पर लगातार लगते रहे. खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में लोगों की नाराजी और असंतोष दिखाई दे रहा था. जिनके दम पर कांग्रेस ने प्रदेश में सरकार बनाई थी.

सभी दिग्गज चुनाव मैदान में-

संगठन के मुद्दे पर बात करें तो पूरे चुनाव में कांग्रेस अप्रभावशाली दिखाई दी. मुख्यमंत्री रहते हुए कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. वे संगठन और सरकार दोनों को चला रहे थे. प्रदेश प्रभारी के बतौर मध्यप्रदेश में काम कर रहे दीपक बाबरिया कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खास हैं. लेकिन वे बीमार होने के बाद पिछले दो महीनों से प्रदेश में नहीं है. कांग्रेस के बड़े नेता जिन्हें अपने अपने इलाके में चुनावी कमान दी जानी थी वे सभी चुनाव लड़ रहे थे. स्वयं कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ के साथ मैदान में थे. दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह, अरूण यादव पूरे समय अपने इलाकों में उलझे रहे.

उम्मीदवार अपने दम पर लड़े-

29 अप्रैल  के बाद कमलनाथ, 12 मई के बाद  दिग्विजय सिंह, सिंधिया अपने इलाकों से मुक्त हुए. कमलनाथ ने अपने मंत्रियों को अपने अपने क्षेत्र में जिताने की जिम्मेदारी दे रखी थी. लेकिन तमाम नेता अपने-अपने आकाओं के क्षेत्रों में ज्यादा सक्रिय रहे, जिसका साफ नुकसान उनके लोकसभा क्षेत्र में पडता दिखाई दे रहा है. नेता के बिना कार्यकर्ता मैदान नहीं पकड़ पाया. और पूरा चुनाव उम्मीदवार कांग्रेस से ज्यादा अपनी ताकत के दम पर लड़ता दिखाई दिया. विधानसभा चुनावों में जिस तरह दिग्विजय सिंह और सीनियर लीडर्स की टीम कार्यकर्ताओं को चार्ज करने के लिए समन्वय का माहौल तैयार कर रही थी वैसा इस बार नहीं था.

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निष्प्रभावी रहे पर्यवेक्षक-

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अपने पर्यवेक्षक जरूर तैनात किए थे. इनमें से अधिकतर प्रदेश प्रभारी बाबरिया से जुड़े लोग थे. जिन्होंने विधानसभा में भी काम किया था. इस चुनाव में बाबरिया गैर-मौजूद रहे, इसलिए उनका पूरा नेटवर्क निष्प्रभावी साबित हुआ. संगठन के स्तर पर पूरी कमान ढ़ीली रही.

एग्जिट पोल पर भरोसा  नहीं-

कांग्रेस की मीडिया प्रभारी शोभा ओझा एग्जिट पोल के नतीजों को पूरी तरह नकारती हैं. वे मानती हैं कि प्रदेश में हम 15 से ज्यादा सीट्स जीत रहे हैं. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ग्राउंड लेवल पर जो मेहनत की है वह जबरदस्त है. हर छोटे कार्यकर्ता तक उनकी पहुंच रही. किसानों का कर्जमाफ हुआ है. आचार संहिता के कारण जो रूका था उसे भी अलग- अलग जगहों पर मतदान होते ही चालू कर दिया गया. यह नतीजे कांग्रेस के पक्ष में होंगे.

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