Opinion : कमलनाथ सरकार का चेहरा बनते जा रहे हैं दिग्विजय सिंह

News18 Madhya Pradesh
Updated: September 3, 2019, 5:03 PM IST
Opinion : कमलनाथ सरकार का चेहरा बनते जा रहे हैं दिग्विजय सिंह
कांग्रेस के दिग्गज नेता पर प्रदेश में कांग्रेसी नेती ही लगाने लगे हैं पर्दे के पीछे से सरकार चलाने के आरोप

दिग्विजय सिंह खुद ही सरकार संचालन के केंद्र में रहने का संदेश देते रहते हैं. उन्होंने विधायकों से भी कहा था कि मंत्री न सुनें तो उन्हें बताएं. दिग्विजय पर पर्दे के पीछे से सरकार चलाने का आरोप लगा है.

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दिनेश गुप्ता, भोपाल 
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कमलनाथ सरकार  (Kamalnath Government) में भूमिका क्या है? यह सवाल कई कारणों से अहम है. सरकार उनके सलाह-मशवरे (Consultation) से चल रही है या धमक से ? दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) यदाकदा यह जता भी देते हैं. वे ऐसा कोई मौका भी नहीं छोड़ते जिससे यह स्पष्ट संदेश चला जाए कि सरकार संचालन के पूरे सूत्र उनके ( दिग्विजय सिंह ) हाथ में हैं. राज्य की राजनीति (Politics) में धीरे-धीरे दिग्विजय सिंह, कमलनाथ सरकार का चेहरा बनते जा रहे हैं.

कैसे रुकी थी राजनीतिक रफ्तार
दिग्विजय सिंह प्रदेश के ऐसे पहले नेता थे, जो लगातार दस साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे. वे दिसंबर 1993 में मुख्यमंत्री बने थे. 2003 तक इस पद पर रहे. कांग्रेस (Congress) में किसी एक नेता को लगातार दस साल तक मुख्यमंत्री बनाए रखने की परंपरा नहीं थी. दिग्विजय सिंह को यह मौका कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते मिल गया था. कांग्रेस का नेतृत्व पी.वी. नरसिंह राव के हाथ में था. इसके बाद सीताराम केसरी अध्यक्ष बने. इन दोनों नेताओं ने दिग्विजय सिंह को कभी अस्थिर करने की नहीं सोची. दिग्विजय सिंह सरकार का पतन दलित एजेंडा और विकास के मोर्चे पर पिछड़ जाने के कारण हुआ. यहां तक कि 2003 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें 'मिस्टर बंटाधार' का नाम दिया. अपने दलित एजेंडा पर दिग्विजय सिंह को इतना भरोसा था कि उन्होंने 2003 के विधानसभा चुनाव से पहले यह सार्वजनिक घोषणा कर दी थी कि यदि कांग्रेस चुनाव नहीं जीतती है तो वे दस साल तक कोई पद नहीं लेंगे. दिग्विजय सिंह को कुछ अंतराल के बाद ही पार्टी में महासचिव की जिम्मेदारी मिल गई. बाद में वे राज्यसभा सदस्य भी बन गए. वे लगभग चौदह साल तक पार्टी के महासचिव के नाते कई राज्यों के प्रभारी रहे हैं. दिग्विजय सिंह कांग्रेस में कद्दावर नेता माने जाते हैं. मुख्यमंत्री पद पर रहते लागू किए गए दलित एजेंडा के कारण उनकी लोकप्रियता भी बढ़ी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) हमेशा से ही उनके निशाने पर रहा है. लेकिन, अल्पसंख्यक और दलित वर्ग से विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाया. वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव से वोटर ने जो दूरी दिग्विजय सिंह ने बनाई थी, वह आज भी कम होती दिखाई नहीं दे रही है.

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कमलनाथ पर भी लग चुके हैं दिग्विजय सरकार चलाने के आरोप

अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज नेता जब दिग्विजय सिंह का विरोध कर रहे थे, उस दौर में कमलनाथ समर्थन करते नजर आ रहे थे. दिग्विजय सिंह सरकार में कुछ महत्वपूर्ण विभागों का पर्दे के पीछे संचालन करते हुए कमलनाथ ही नजर आते थे. लगभग आधा दर्जन विभागों में कामकाज कमलनाथ की मर्जी के बगैर कुछ नहीं होता था. इनमें बिजली विभाग के अलावा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, नगरीय प्रशासन एवं परिवहन विभाग भी प्रमुख रहा है.  2003 के विधानसभा चुनाव में बिजली कटौती बड़ा मुद्दा रहा है. खराब बिजली व्यवस्था का ठीकरा भी दिग्विजय सिंह के सिर ही फूट था. कमलनाथ का दखल ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी रहता था. अब राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ हैं और पर्दे के पीछे सरकार चलाने का आरोप दिग्विजय सिंह पर लग रहा है.
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सरकार बनते ही मुख्य भूमिका में नजर आने लगे थे दिग्विजय

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आने के बाद दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ के पक्ष में विधायकों की घेराबंदी का काम किया था. चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने राज्य भर के कांग्रेसियों में समन्वय बनाने का काम किया था. मुख्यमंत्री पद के चयन के समय राय-शुमारी में राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को शामिल नहीं किया था. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया से चर्चा कर ही नाम तय किया था. कमलनाथ के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही दिग्विजय सिंह ने अपने सबसे भरोसेमंद अफसरों को महत्वपूर्ण पदों बैठा दिया. राज्य के मुख्य सचिव एसआर मोहंती, दिग्विजय सिंह के भरोसेमंद अफसर माने जाते हैं. परिवहन और आबकारी आयुक्त के पदों पर तैनात अफसरों को भी सिर्फ इस कारण नहीं बदला क्योंकि वे दिग्विजय सिंह के ही करीबी माने जाते रहे हैं. इन पदों पर अभी वे ही अफसर तैनात हैं, जिन्हें शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव के पहले पदस्थ किया था.

विधायकों से कहा था मंत्री न सुने तो मुझे बताएं
दिग्विजय सिंह सरकार का चेहरा हैं, यह वे अपने बयानों के जरिए भी बताते रहते हैं. विधानसभा में हुए विधायकों के प्रबोधन कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह ने कहा था, 'सुनो किसी विधायक की सिफारिश यदि मंत्री न सुनें तो मुझे बताएं, मैं बात करूंगा.' दिग्विजय सिंह अपने इस कथन से यह संदेश देने में सफल रहे थे कि कमलनाथ सरकार पर उनका पूरा नियंत्रण है. राज्य में कांग्रेस के कुल 114 विधायक हैं. इनमें दिग्विजय सिंह समर्थकों की संख्या चालीस के ऊपर मानी जाती है. मंत्रिमंडल में भी दिग्विजय सिंह के समर्थकों के पास महत्वपूर्ण विभाग हैं. राज्य के सहकारिता मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने हाल ही में जब यह बयान दिया कि उनकी सरकार रेत का अवैध कारोबार रोकने में असफल रही है तो सभी चौंक पड़े थे. डॉ. गोविंद सिंह के बयान को अप्रत्यक्ष तौर पर कमलनाथ सरकार पर हमला ही माना गया था. इससे पहले दिग्विजय सिंह समर्थक विधायक केपी सिंह ने भी कमलनाथ सरकार के कामकाज पर असंतोष प्रकट किया था.  इन बयानों के कारण यह माना गया कि दिग्विजय सिंह अपने विधायकों के जरिए मुख्यमंत्री कमलनाथ को दबाव में रखना चाहते हैं.

पुरानी पीढ़ी का टकराव नई पीढ़ी में भी नजर आ रहा है
पिछले चार दशक में राज्य कांग्रेस की राजनीति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है. पार्टी की नई पीढ़ी अब भी पहली पंक्ति में दिखाई नहीं दे रही है. राज्य के वन मंत्री उमंग सिंघार नई पीढ़ी का आदिवासी चेहरा हैं. उनकी बुआ जमुना देवी, दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री थीं. वे दिग्विजय सिंह की धुर विरोधी रहीं हैं. उनका एक बयान "मैं दिग्विजय सिंह के तंदूर में जल रही हूं",आज भी राज्य की राजनीति में सुनाई देता है. जमुना देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके भतीजे उमंग सिंघार दिग्विजय सिंह विरोधी की पहचान के साथ ही राजनीति कर रहे हैं. दिग्विजय सिंह से उनका पहला टकराव सरकार बनते ही हुआ था. शिवराज सिंह चौहान की सरकार में हुए कथित वृक्षारोपण घोटाले में विधानसभा में वन विभाग  जवाब में क्लीन चिट देने वाला था. दिग्विजय सिंह ने आपत्ति की तो सिंघार ने पलटकर सवाल किया कि दिग्विजय सिंह अपने पुत्र जयवर्धन सिंह से क्यों नहीं पूछते कि सिंहस्थ घोटाले में उनका विभाग शिवराज सिंह चौहान की सरकार को क्लीन चिट क्यों दे रहा है ? जयवर्धन, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के मंत्री हैं. बीजेपी के प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं कि सरकार सामूहिक जिम्मेदारी से चलती है. मंत्री से जवाब-तलब करने का अधिकार मुख्यमंत्री का है. दिग्विजय सिंह, मंत्रियों से सवाल-जबाव कर यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार वे ही चला रहे हैं ?

अरुण यादव और सचिन यादव से भी जुड़ता है सत्ता-संघर्ष का एक सिरा

कांग्रेस में चल रहे सत्ता-संघर्ष का एक सिरा अरुण यादव और सचिन यादव से भी जुड़ता है. अरुण-सचिन यादव, स्वर्गीय सुभाष यादव के पुत्र हैं. सुभाष यादव भी दिग्विजय सिंह सरकार में उप मुख्यमंत्री थे. दिग्विजय सिंह विरोधी थे. अरुण यादव को हटाकर ही कमलनाथ, राज्य कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने थे. उनके भाई सचिन यादव कमलनाथ मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री हैं. कांग्रेस में चल रही खींचतान पर अरुण यादव ने मंगलवार को ट्वीट कर कहा कि 8 माह में जो स्थितियां सामने आ रहीं हैं उसे देखते हुए व्यथित हूं. उन्होंने आगे लिखा कि इतनी जल्दी इन दिनों का आभास होता तो जहरीली विचारधारा के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ता. अरुण यादव के ट्वीट के साथ कुछ पुराने फोटो हैं. यह फोटो उस वक्त के हैं जब वे भाजपा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए घायल हो गए थे.
( ये लेखक के निजी विचार हैं, न्यूज 18 का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)

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First published: September 3, 2019, 4:51 PM IST
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