OPINION: क्या चुनाव ‘ज्यादा बुरे’ और ‘कम बुरे’ में से किसी एक को चुनने की मजबूरी है!

Madhya Pradesh Elections: मैं हूं मध्य प्रदेश का नवमतदाता, यानी वो लड़का/लड़की जो पहली बार मतदान करने पोलिंग बूथ पर पहुंचने वाला हूं

Ashutosh Nadkar | News18Hindi
Updated: November 25, 2018, 12:38 PM IST
OPINION: क्या चुनाव ‘ज्यादा बुरे’ और ‘कम बुरे’ में से किसी एक को चुनने की मजबूरी है!
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Ashutosh Nadkar | News18Hindi
Updated: November 25, 2018, 12:38 PM IST
झंडे-बैनरों से लदी हुई गाड़ियां. लाउड स्पीकर से चिल्ला-चिल्लाकर वोट देने की अपील. गली-मोहल्ले और घरों तक रोजाना हाथ जोड़कर आने वाले नेताजी. ये सब मेरे लिए बिलकुल नया है. इस महौल को देखकर मैं बहुत ही उत्साहित हूं. अगर आप ये सोच रहे हैं कि इसमें नया क्या है, तो आप मेरी जेनरेशन के नहीं हो सकते. मैं हूं मध्य प्रदेश का नवमतदाता, यानि वो लड़का/लड़की जो पहली बार मतदान करने पोलिंग बूथ पर पहुंचने वाला हूं. (इसे पढ़ें- चुनाव प्रचार के रंग: 'मौसम आया इलेक्शन रीमिक्स का')

ये पहली बार है कि मोहल्ले में आने वाले कुर्ता-पजामा धारियों की नज़र मुझपर भी गई. उन्होंने मेरे भी हाथ जोड़े और अपने उम्मीदवार को वोट देने की विनती की. पहली बार लगा कि मैं भी कुछ हूं. कुछ ने यह भी कहा कि सत्ता की चाबी मेरे हाथ में है, क्योंकि मेरे जैसे 30 लाख हैं जो पहली बार वोट डालने जा रहे हैं. अचानक की मिलने वाली इस अहमियत और तवज्जो से उत्साहित होना तो लाजमी है. लेकिन कभी-कभी लगता है कि इस उत्साह पर कंफ्यूजन भारी पड़ रहा है. बस्ती में केसरिया दुपट्टा डालकर आने वालों ने हमेशा ये समझाया कि मुख्यमंत्री मेरा और मेरे जैसे हजारों बच्चों का मामा है.

एक बार नुक्कड़ पर हुई सभा में इन मामाजी ने कहा था कि बेटी के जन्म से लेकर उसके ब्याह तक की सारी जिम्मेदारी मामा मुख्यमंत्री की है. सुनने में तो बहुत अच्छा लगा, एकबार तो लगा कि सुबह 5 बजे उठकर 3 घंटे तक पानी भरने की मशक्कत से तो ये मामाजी निजात दिला ही देंगे. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. हां, मुहल्ले की कुछ लड़कियों के पास साइकिल जरूर दिखी. पता चला की ये साइकिल मामाजी ने दिलवाई है, लेकिन हफ्ते भर बाद भी ये लड़कियां फिर से पैदल थीं और मेरे से साथ पानी भरने के लिए कतार में खड़ी थीं.

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खैर, वोट तो डालना है और किसी को तो डालना ही होगा. केसरिया दुपट्टे वाले कहते हैं कि इतना सौम्य, शांत व मृदुभाषी मुख्यमंत्री हमें कहीं नहीं मिलेगा. शायद ये सच भी हो, लेकिन क्या फर्क पड़ेगा गर मेरे राज्य का मुख्यमंत्री सौम्य न होकर सख़्त हो, शांत न होकर तेजतर्रार हो या मृदुभाषी न होकर अक्खड़ हो. फ़र्क तो इस बात से पड़ेगा कि क्या वह मेरे जैसों को रोजगार दे सकेगा, मेरे बाप को इलाज मिल सकेगा, क्या मोहल्ले में ढंग का स्कूल होगा, क्या गुंडों-मवालियों, हफ्तावसूली करने वालों से निजात मिल सकेगी.

लेकिन लगता है कि ये सवाल पूछने की इज़ाजत नहीं है. पूछो तो नेताजी नाराज हो जाते हैं. कहते हैं ये 100 रुपए महीने में जो स्मार्ट फोन चला रहे हो, ये किसने दिया है. इसी फोन और इंटरनेट ने दिमाग खराब कर दिया है लोगों का. नेताजी पुराने समय को याद दिलाकर डराते हैं. कहते हैं याद करो 2003 के पहले का वो दौर, जब न सड़कें थीं, न बिजली थी, न पानी था. क्या तुम प्रदेश को उसी जगह वापस ले जाना चाहते हो. नारंगी दुपट्टे वालों की बात सुनकर मां-पिताजी तो चिंता में पड़ जाते हैं. लेकिन मेरे सामने सवाल है कि क्या मुझे वोट केवल इसीलिए करना है कि हालात इससे भी बदतर न हो जाएं.

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डराने में तिरंगे दुपट्टे वाले भी कुछ कम नहीं. हर बार ये बताना नहीं भूलते की बलात्कार, किसान आत्महत्या और बाल अपराध में मेरा प्रदेश कितना आगे है. व्यापम घोटाले ने राज्य की कितनी भद पिटवाई है. लेकिन तिरंगी सरकार के समय इन मामले में हालात क्या थे, क्यों मध्य प्रदेश बीमारू था और क्यों मुख्यमंत्री को मि. बंटाधार का खिताब मिला था.? इन सवालों पर तिरंगे दुपट्टे वाले भी भड़क जाते हैं और सवाल करने वाले को ‘भक्त’ करार दे देते हैं.

ऊटपटांग बयानों की बाढ़ आई हुई है. किसी के पास अपनी उपलब्धियां या योजनाएं भले न हो, लेकिन विरोधी की कमियों और नाकामियों की लंबी फेहरिस्त है. जीत के दावे का आधार ही दूसरों का निकम्मापन है. ऐसे में कंफ्यूजन चरम पर है. उलझन ये है कि क्या मेरे पास केवल ‘बेहद खराब’ और ‘कम खराब’ में से ही किसी एक को चुनने का विकल्प है?

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