OPINION: चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान सभी को साधने की कला भूल गए!
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OPINION: चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान सभी को साधने की कला भूल गए!
चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में विभागों के बंटवारे को लेकर माथापच्ची जारी है (फाइल तस्वीर)

विभागों के बंटवारे के लिए जिस तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह (Shivraj Singh Chouhan) को दिल्ली (Delhi) में डेरा जमाना पड़ा, उससे यह संदेश जाना स्वाभाविक है कि बीजेपी (BJP) में भी कांग्रेस की संस्कृति पनपने लगी है

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भोपाल. शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) सबको साधने की अपनी खूबी के कारण ही मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में चौथी बार भी आसानी से मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन, मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद विभागों के बंटवारे (Portfolio Distribution) में संतुलन बनाने की उनकी कोशिश अब तक कामयाब नहीं हो पाई है. समस्या की बड़ी वजह उनके वो वरिष्ठ साथी हैं जो उनकी पिछली मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालते थे. कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने अपने साथियों के सम्मान की चिंता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को सौंप दी है. विभागों के बंटवारे के लिए जिस तरह शिवराज सिंह को दिल्ली (Delhi) में डेरा जमाना पड़ा, उससे यह संदेश जाना स्वाभाविक है कि बीजेपी (BJP) में भी कांग्रेस की संस्कृति पनपने लगी है.

मंत्रिमंडल में है 'महाराज' का दबदबा
नवंबर 2005 में शिवराज सिंह चौहान पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने से नाराज उमा भारती पार्टी छोड़कर चली गईं थीं. शिवराज सिंह ने विनम्रता और सहजता से विरोधियों को भी अपना बना लिया था. वर्ष 2008 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली सफलता से केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा शिवराज सिंह पर बढ़ा. 2013 के विधानसभा चुनाव में मिली एतिहासिक सफलता के बाद पार्टी के भीतर शिवराज के समक्ष (सामने) कोई चुनौती बची नहीं. लेकिन, अब चौथी पारी में उन्हें हर कदम पर चुनौती मिलती दिखाई दे रही है.

बरकतुल्ला विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष रहे प्रोफेसर एच.एस यादव कहते हैं कि मौजूदा सरकार शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता का परिणाम नहीं है. आम चुनाव में वोटर के बीच उनका करिशमा काम नहीं कर पाया था. प्रोफेसर यादव जोड़ते हैं कि शिवराज सिंह को चौथी पारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के कारण मिली है, इसलिए उनको साधकर चलना मुख्यमंत्री की मजबूरी है.
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कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को शिवराज सिंह के मंत्रिमंडल गठन में तवज्जो दी गई है (फाइल फोटो)




वरिष्ठता को सम्मान देना भी है चुनौती भरा
मंत्रिमंडल का विस्तार तीन महीने के लंबे इंतजार के बाद दो जुलाई को हुआ था. विभागों का बंटवारा पांच दिन में भी नहीं हो पाया. सात जुलाई को दिल्ली से लौटने के बाद विभागों के बंटवारे पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वो आज और वर्कआउट करेंगे. मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद बीजेपी में असंतोष के स्वर सुनने को मिल रहे हैं. हालांकि कोई भी नेता नेतृत्व के निर्णय को खुलकर चुनौती देने की स्थिति में नहीं है. अजय विश्नोई ने जरूर मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर मंत्रिमंडल में विंध्य और महाकौशल क्षेत्र की उपेक्षा पर आपत्ति दर्ज कराई है. विश्नोई ने अपने पत्र में सीएम शिवराज को सलाह दी है कि वो मौजूदा राजनीतिक स्थिति में जबलपुर और रीवा जिले का प्रभार अपने पास रखें.

शिवराज सिंह के मंत्रिमंडल में आधा दर्जन से अधिक चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता. उन्हें महत्वपूर्ण विभाग भी देने होंगे. उन चेहरों को भी महत्व देना होगा, जिन्हें विधानसभा के उपचुनाव मैदान में उतरना है. ये वो चेहरे हैं जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए हैं. इनमें प्रमुख महेंद्र सिंह सिसोदिया, इमरती देवी, प्रभुराम चौधरी और प्रद्युमन सिंह तोमर हैं. इन चारों के पास कमलनाथ मंत्रिमंडल में भी महत्वपूर्ण विभाग थे.

स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री बनाना भी देरी की वजह
मंत्रियों को विभाग देने में हो रही देरी पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तंज कसते हुए कहा कि सौदेबाजी चल रही है. सरकार भी तो सौदेबाजी से बनी है. इस पर कांग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा भी चुटकी लेने से पीछे नहीं रहे. उन्होंने ट्वीट कर कहा कि मध्य प्रदेश बीजेपी तीन खेमों में बंट गई है- महाराज, नाराज और शिवराज. मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य गोपाल भार्गव कहते हैं कि मंथन में मक्खन निकलता है. भागर्व कहते हैं कि वरिष्ठता और अनुभव को भी ध्यान में रखा जा रहा है.

शिवराज सिंह के सामने सिर्फ विभाग देने की चुनौती होती तो शायद वो अपने अनुभव के आधार पर बंटवारा भी कर देते. लेकिन चुनौती राज्य मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार देने की भी है. मंत्रिमंडल में आठ राज्य मंत्री हैं. इनमें चार वो हैं, जो कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में आए हैं. शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री नहीं रखना चाहते. दिल्ली यात्रा के दौरान उन्होंने अपने मन की बात केंद्रीय नेतृत्व को बता दी. साथ ही विभागों के वितरण में फ्री हैंड देने का आग्रह भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने किया. 24 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को देखते हुए बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व सिंधिया के महत्व को कम नहीं करना चाहता. यही वजह है कि विभागों के वितरण में भी केंद्रीय नेतृत्व दखल दे रहा है.

गृह विभाग पर वरिष्ठ मंत्रियों की दावेदारी से हो रही देरी
दो जुलाई से पहले अप्रैल में शिवराज सिंह चौहान ने पांच सदस्यों वाला अपना मंत्रिमंडल बनाया था. इस मंत्रिमंडल में नरोत्तम मिश्रा को गृह के साथ-साथ लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग दिया गया था. मंत्रिमंडल के विस्तार में गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह जैसे चेहरे आ जाने के बाद गृह विभाग के दावेदारों की संख्या बढ़ गई है. भूपेंद्र सिंह पहले भी शिवराज सरकार में गृह मंत्री रह चुके हैं. वहीं गोपाल भार्गव का भी दावा गृह विभाग पर है. वो सरकार बनने से पहले प्रतिपक्ष के नेता थे. मंत्रिमंडल में सबसे वरिष्ठ हैं.

बिसाहूलाल सिंह और ऐंदल सिंह कंसाना भी वजनदार विभाग चाहते हैं. दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में बिसाहूलाल सिंह लोक निर्माण मंत्री थे. कांग्रेस की राजनीति में ये दोनों नेता दिग्विजय सिंह गुट के माने जाते थे. गृह एवं स्वास्थ्य के अलावा वाणिज्यिक कर, उद्योग, नगरीय प्रशासन एवं विकास, लोक निर्माण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसे विभागों को लेकर भी खींचतान है. शिवराज सिंह चौहान ये विभाग अपने करीबियों को देना चाहते हैं. केंद्रीय नेतृत्व विभागों के वितरण में भी संतुलन बनाने पर जोर दे रहा है. गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि किसे कौन सा विभाग देना है, यह मुख्यमंत्रा का विशेष अधिकार है.

संघ के करीबियों की भी दमदार विभागों पर दावेदारी
डेढ़ दशक की बीजेपी सरकार में जब भी मंत्रिमंडल का गठन या विस्तार किया गया, दो दिन के भीतर ही  विभागों का बंटवारा कर दिया जाता था. विभागों का वितरण पहली बार लंबा खींचा है. शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाए गए अरविंद भदौरिया ने कहते हैं कि योग्य व्यक्तियों को योग्य काम देने के लिए मुख्यमंत्री चिंतन-मनन कर रहे हैं. शिवराज सिंह मंत्रिमंडल का विस्तार टाले जाने के लिए बदनाम रहे हैं. इस बार वो चाहते हुए भी विभागों का बंटवार नहीं कर पा रहे हैं. मंत्रिमंडल में शामिल हर चेहरे के पीछे कोई न कोई ताकत महत्वपूर्ण विभाग के लिए जोर लगा रही है.

राज्य बीजेपी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े मंत्रियों को वजनदार विभाग दिलाना चाहते हैं. इन चेहरों में ऊषा ठाकुर, मोहन यादव, अरविंद भदौरिया का नाम प्रमुख है. शिवराज सिंह के सामने बड़ी समस्या वित्त विभाग को लेकर है. मंत्रिमंडल में शामिल जितने भी चेहरे हैं, वो वित्त विभाग लेने के इच्छुक नहीं हैं. वरिष्ठता के आधार पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, गोपाल भार्गव को यह विभाग देना चाहते हैं. विजय शाह की प्राथमिकता आदिम जाति कल्याण विभाग है. विजय शाह की पटरी भी सीएम शिवराज सिंह से नहीं बैठती है.
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