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दिग्विजय की Inspirational स्टोरी, 27 साल से बिस्तर पर रह कर दूसरों को दे रहे हौसला

भले ही जिंदगी ने इन्हें धोखा दिया हो लेकिन वो लोगों में जिंदगी जीने का जज्बा पैदा कर रहे है. अपने गमों को भूलाकर वो लोगों को खुश होकर जिंदगी में आगे बढ़ने प्रेरित कर रहे है. शारीरिक अक्षमता के बाद भी राजधानी भोपाल के दिग्विजय सिंह लोगों को मोटीवेट कर रहे है. कई सालों से लाइलाज बीमारी से लड़ने के बाद भी लोगों को अपने दुखों को भूलकर मोटिवेट करने नई मिसाल पेश कर रहे है.

भले ही जिंदगी ने इन्हें धोखा दिया हो लेकिन वो लोगों में जिंदगी जीने का जज्बा पैदा कर रहे है. अपने गमों को भूलाकर वो लोगों को खुश होकर जिंदगी में आगे बढ़ने प्रेरित कर रहे है. शारीरिक अक्षमता के बाद भी राजधानी भोपाल के दिग्विजय सिंह लोगों को मोटीवेट कर रहे है. कई सालों से लाइलाज बीमारी से लड़ने के बाद भी लोगों को अपने दुखों को भूलकर मोटिवेट करने नई मिसाल पेश कर रहे है.

भले ही जिंदगी ने इन्हें धोखा दिया हो लेकिन वो लोगों में जिंदगी जीने का जज्बा पैदा कर रहे है. अपने गमों को भूलाकर वो लोगों को खुश होकर जिंदगी में आगे बढ़ने प्रेरित कर रहे है. शारीरिक अक्षमता के बाद भी राजधानी भोपाल के दिग्विजय सिंह लोगों को मोटीवेट कर रहे है. कई सालों से लाइलाज बीमारी से लड़ने के बाद भी लोगों को अपने दुखों को भूलकर मोटिवेट करने नई मिसाल पेश कर रहे है.

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भले ही जिंदगी ने इन्हें धोखा दिया हो लेकिन वो लोगों में जिंदगी जीने का जज्बा पैदा कर रहे है. अपने गमों को भूलाकर वो लोगों को खुश होकर जिंदगी में आगे बढ़ने प्रेरित कर रहे है. शारीरिक अक्षमता के बाद भी राजधानी भोपाल के दिग्विजय सिंह लोगों को मोटीवेट कर रहे है. कई सालों से लाइलाज बीमारी से लड़ने के बाद भी लोगों को अपने दुखों को भूलकर मोटिवेट करने नई मिसाल पेश कर रहे है.

राजधानी के दिग्विजय सिंह हमेशा मस्तमौला और हर पल को एंजाय करने वाले थे. लेकिन अचानक हुए एक हादसे ने उनकी जिंदगी ही बदल दी. आज से 27 साल पहले एक हादसे के बाद दिग्विजय सिंह की जिंदगी बस एक बेड पर ही सिमट कर रह गई है. गणपति उत्सव के दौरान तैयारियां करते समय अचानक पैर फिसलने से छत से नीचे गिरने से बाद से दिग्विजय सिंह को लाइलाज क्वाटर पीलिज्या बीमारी हुई. जिसके बाद देश भर के अस्पतालों में इलाज कराने के बाद भी अब तक बीमारी ठीक नहीं हुई है.

दिग्विजय सिंह ने अपनी जिंदगीं में जो कड़े अनुभव महसूस किए. वो नहीं चाहते थे कि लोगों भी उनसे गुजरे. इसके बाद उन्होंने लोगों को मोटिवेट करने की शुरूआत की. लोगों को उनके दुखों से उबारने की नायाब पहल शुरू की.

2010 से फेसबुक और सोशल साइट्स के जरिए दिग्विजय सिंह ने उन लोगों से बात करना शुरू की जो अपनी जिंदगी से हताश हो चुके है. लोगों में जीवन जीने उमंग और उत्साह भरने की शुरूआत की, ताकि लोग हारे नहीं बल्कि अपने जीवन में खुशी से लगातार आगे बढ़ते रहे.

फेसबुक पर मोटिवेट करने के साथ ही लोगों से फोन पर बात कर उनकी परेशानियों को हल्का करने की कोशिश करते है. भले ही दिग्विजय सिंह की अंगुलियां काम नहीं करती है लेकिन वो अपने मुट्ठी से ही मैसेज टाइप करते है. उनकी परेशानियों को सुनकर हर तरह से मदद करते है.

दिग्विजय सिंह अपने बिस्तर से चल फिर नहीं पाते है, लेकिन उनका जिंदगी जीने और दूसरे की जिंदगी पटरी पर लाने का जज्बा काबिले तारीफ है.

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