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मैं मंदसौर हूं, तुम्हें सुन रहा हूं....अब गोलीकांड मेरी पहचान बन गयी है...

मंदसौर गोलीकांड

मालवा निमाड़ की 65 सीटें जो एमपी की सत्ता का दरवाज़ा हैं.उस दरवाज़े पर लगे ताले की चाभी मज़बूती से थामें बैठा हूं.सियासी दल इस कोशिश में कि चाभी किसके हाथ आएगी

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    शिफाली

    मैं मंदसौर हूं...सुन रहा हूं,दावों-वादों का शोर, कर रहा हूं सियासी दलों पर गौर, और खामोश रहकर उस बदलाव को देख रहा हूं जिसमें मेरी नई शिनाख्त अब मंदसौर का किसान गोली कांड बन गया है.

    मैं नहीं चाहता था कि मेरे सीने पर लाल धब्बे आएं.मैं नहीं चाहता था कि मेरी ज़मीन पर अफीम लहसुन, राई उगाकर खुशहाल हुए किसान, इस कदर लाचार हों कि सड़कों पर दूध बहाएं. पर मैं बेबस देखता रहा. दूध भी बहा और खून भी.

    और फिर उर्वरा हुई सियासी ज़मीन ने देखा नेताओं का जुनून भी.कांग्रेस को उम्मीद जागी कि मंदसौर गोली कांड बनेगा दरवाज़ा और कांग्रेस एमपी में सत्ता का दरवाजा खोलने वाले मालवा के मज़बूत गढ़ में प्रवेश कर जाएगी.ये वो वक्त था कि जब मेरे साथ का गुमान लिए बैठी बीजेपी की सरकार को पहली बार अहसास हुआ कि इस किले की दीवारें हिल भी सकती हैं.

    मेरी ज़मीन पर हुए आंदोलन की आग शिवराज सरकार के लिए दहशत बन गयी. किसान पुत्र का ताज पहने रहे शिवराज को पहली बार इस ताज में कांटे तभी तो महसूस हुए. लेकिन उस कहावत की तरह कि डग-डग रोटी और पग-पग पर नीर देने वाली है मेरी ज़मीन.इस ज़मीन पर पैर जमाना जितना मुश्किल है,जड़ें उखाड़ पाना भी उतनी बड़ी चुनौती है.

    याद कीजिए संवेदनाओं के कितने सुर, सहानुभूति की कितनी आवाज़ें थीं. किसान गोली कांड में 6 किसानों की मौत पर जब सियासत शुरू हुई, तब भी तो मैं जान रहा था, मेरा किसान जैसे रबी खरीफ की फसल के लिए माटी की निंदाई गुड़ाई करता है, ठीक वैसे ही राजनीतिक दल कर रहे थे बुआई, कि डेढ साल बाद फसल काटेंगे.किसानों के लिए तो हमेशा उपजाऊ रही है मेरी ज़मीन लेकिन सियासी दलों ने इस पर वोटों की फसल भी भरपूर काटी.

    जनसंघ मेरी मज़बूत ज़मीन पर ही तो खड़ा हुआ था. बीजेपी की शक्ल लिए फिर बड़ा हुआ. इसी आंगन में फैली, चढ़ी-बढ़ी आरएसएस की भी शाखाएं, सुंदरलाल पटवा, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और कैलाश नाथ काटजू के तौर तीन मुख्यमंत्री मेरी ज़मीन से निकले और बालकवि बैरागी, कैलाश चावला जैसे कद्दावर नेता भी, लेकिन.मेरे किनारे बहने वाली शिवना नदी की तरह मैंने भी सियासत के नए नए घाट देखे पऱखे, बदली सियासी हवाओं के साथ अपना रुख़ भी बदला. 1971 और 1984 के चुनाव की याद है ना,जब मेरा हाथ कांग्रेस के साथ खड़ा था.

    लेकिन दोनों दल इस बार अपने ही दल-दल में फंसते दिखाई दे रहे हैं. मज़बूत ज़मीन होने के बावजूद बीजेपी के लिए उम्मीदवार का चयन आगे बड़ी चूक हो सकती है. मनासा में कैलाश चावला का टिकट काटकर बीजेपी के बागी अनिरुद्ध माधौ मारु को टिकट, मंदसौर में किसान नेता बंशीलाल गुर्जर को नाराज़ करके फिर यशपाल पर भरोसा और पूरे उज्जैन संभाग में बीते चुनाव में सिर्फ एक सुवासरा सीट जिनकी बदौलत हारे, बीजेपी नेता राधेश्याम पाटीदार पर फिर भरोसा, बीजेपी की बड़ी भूल ना साबित हो जाए. कांग्रेस भी मेरी ज़मीन पर नया नेतृत्व कहां खड़ा कर पाई, नरेन्द्र नाहटा से लेकर सुभाष सोजतिया तक बुज़ुर्ग नेता ही फिर खड़े हैं मैदान में.

    ये सही है कि सियासी समझ बदल रही है मेरी ज़मीन की, लेकिन अब भी जात भाई को देखकर वोटर थोड़ा भावुक तो हो ही जाता है. पाटीदार, जैन, धाकड़, गुर्जर और सौंधिया ये वो जातियां हैं, यूं ही तो वोट बैंक नहीं बनीं आखिर, खेती किसानी में रहने वाली मेरी माटी में जिनका जिक्र चुनाव के साथ आता है और जातिगत वोट बैंक के सवाल पर, हालांकि राजनीतिक लिहाज से मैंने इन दो दलों का ही दामन थामा हमेशा. तीसरे के लिए गुंजाइश कभी थी ही नहीं.

    मेरी खामोशी को अब अपने अपने अंदाज में पढ़ने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन मेरा सियासी इतिहास कहता है कि मंदसौर की ख़ामोशी जब भी टूटी तो हिसाब बराबर करती हुई. मंदसौर-नीमच दोनों ज़िलों यानि सात विधानसभा सीटों पर कई बार फैसला 7-0 जैसे बड़े अंतर वाला भी आया. ऐसा एक नहीं पांच चुनाव में हुआ है. मैंने तीन बार कांग्रेस को आईना दिखाया और दो बार बीजेपी को.

    मालवा निमाड़ की 65 सीटें जो एमपी की सत्ता का दरवाज़ा हैं.उस दरवाज़े पर लगे ताले की चाभी मज़बूती से थामें बैठा हूं.सियासी दल इस कोशिश में कि चाभी किसके हाथ आएगी ....

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