राजनीति में अब जनतांत्रिक शान नहीं दिखती, हम अपने रास्ते पर चले रहे हैं : मेधा पाटकर

गांधीजी के 150वें जन्मवर्ष पर देश भर में संविधान सम्मान यात्रा पर निकलीं पाटकर ने न्यूज 18 से विशेष से कई मुद्दों पर विशेष बातचीत की

Jayshree Pingle | News18Hindi
Updated: October 13, 2018, 10:15 PM IST
राजनीति में अब जनतांत्रिक शान नहीं दिखती, हम अपने रास्ते पर चले रहे हैं : मेधा पाटकर
मेधा पाटकर
Jayshree Pingle | News18Hindi
Updated: October 13, 2018, 10:15 PM IST
नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि उन्होंने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव के साथ नई राजनीतिक जमीन का सपना देखा था. उनका कहना है, 'हम आंदोलन की राह को संसद में मजबूती देना चाहते थे. इस उम्मीद से हम आप पार्टी में शामिल हुए. मुंबई नार्थ-इस्ट से मैंने चुनाव भी लड़ा. लेकिन बहुत जल्दी समझ में आ गया कि देश की राजनीति में अब वह जनतांत्रिक शान नहीं है. एक नाउम्मीदी के साथ हम अपने रास्ते पर लौट आए.'

जबरदस्त अंडर करंट है
गांधीजी के 150वें जन्मवर्ष पर देश भर में संविधान सम्मान यात्रा पर निकलीं पाटकर ने न्यूज 18 से विशेष से कई मुद्दों पर विशेष बातचीत की. पिछले 33 साल से मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में तथा नर्मदा क्षेत्र में काम कर रहीं पाटकर का कहना है कि मध्यप्रदेश का यह चुनाव इस बार चुनावी मुद्दा नर्मदा और उसका तटीय इलाका और आदिवासी, मछुआरे, किसान और श्रमिकों के आसपास है.

उनका कहना है कि यह लोग किसी भी राजनीतिक दल की जीत तय करेंगे. एक जबरदस्त अंडर करंट और चेतना है. जिसका अनुमान इन राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को नहीं है. सदियों से उपेक्षित यह वर्ग अब अपने अधिकारों को लेकर सजग है. जिसका जवाब इन चुनाव में मिल जाएगा.

सरकार को आदिवासियों से सब चाहिए
पाटकर कहती हैं कि विकास के मॉडल पर चल रही राजनीति ने इस वर्ग को पूरी तरह उपेक्षित, बेदखल कर दिया है. जमीन इनकी है, जंगल इनके हैं. सरकारें विकास के नाम पर इनसे छीन रही है. एक पूरी संस्कृति नष्ट हो रही है. आज पूरे विश्व में बड़े बांधों के नाम स्थापित किए गए विकास के मॉडल फेल साबित हो गए हैं. पर्यावरण संरक्षण के लिए जीवन प्रणाली बदलने पर जोर दिया जा रहा है.

हमें प्रकृति को बचाने के लिए आदिवासियों की ओर लौटना होगा. प्रकृति आधारित जीवन ही सभ्यता को बचाएगा. लेकिन इतना गहरा चिंतन राजनीति के धरातल से गायब है
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वोट के लिए नर्मदा
'मध्यप्रदेश में आज हर उम्मीदवार वोट के लिए नर्मदा का पानी अपने जिले तक ले जाने के वादे कर रहा है. शिवराज सरकार ने नर्मदा- शिप्रा लिंक योजना के नाम पर पाइप लाइन सप्लाई का जो मंहगा मॉडल खड़ा कर दिया है. वह एक बुरी शुरूआत है. नर्मदा में पानी नहीं है. और राजनेता उसे खींचकर अपने शहरों में ले जाने की बात कर रहे हैं. नर्मदा के पानी पर वह अपनी जीत के सपने देख रहे हैं.

यह शहादत है या हत्या
पाटकर इस बात से आहत हैं कि गंगा सफाई अभियान परे बैठें पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल इस तरह हमारे बीच से चले गए हैं. वे सवाल उठाती हैं कि इसे शहादत कहें या हत्या. वे पिछले चार महीनों से अनशन पर थे लेकिन किसी सरकारी, प्रशासनिक तंत्र ने इसकी चिंता नहीं की. किसी ने उनके साथ संवाद नहीं किया. कोई सुनवाई नहीं हुई. दरअसल, इस सरकार में संवाद का दौर खत्म हो गया है. अग्रवाल विश्व हिंदू परिषद के करीबी थे. उनके साथ ऐसा व्यवहार जनआंदोलनों के लिए चिंता का विषय है. देश की नदियां और उनका प्रदूषण एक बड़ी चिंता का ‌विषय है. जिसे सरकारों को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा.

हमेशा हेलीपैड पर मिले
'मध्यप्रदेश की बात करू तो यहां भी ऐसा ही माहौल है. हमने जितने आंदोलन किए जितनी बार मुद्दें उठाए, हमें एक बार भी मुख्यमंत्री ने चर्चा के लिए नहीं बुलाया. शिवराज सिंह हमेशा हेलीपैड पर मिले. यह आदिवासी की आवाज को अनसुना करने जैसा है. शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं नर्मदा परिक्रमा की है. लेकिन यह हवाई थी. जिसका धरातल से कोई सरोकार नहीं था. एक इवेंट था.

दिग्विजय सिंह ने निराश किया
उनका कहना है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और उनकी पत्नी अमृता सिंह ने भी परिक्रमा की. यह बहुत ही जमीनी और हकीकत से रूबरू होने वाली यात्रा थी. बहुत ही संवेदनशीलता के साथ उनकी पत्नी और उन्होंने नर्मदा के हालात और वहां की जीवनशैली की कठिनाइयों को देखा. लेकिन मुझे अफसोस है कि राज्यसभा में जब उन्होंने इस पर अपना वक्तव्य दिया, तो उसमें उस दर्द की झलक नहीं थी. पाटकर बताती हैं कि मैंने उनके वक्तव्य के बाद उन्हें इस पर पत्र भी लिखा है.

उन्होंने छह माह की परिक्रमा में नर्मदा के साथ एक रिश्ता कायम किया था. 35 हजार परिवारों की बेदखली, अनगिनत गावों में पसरे सन्नाटे, नर्मदा में अवैध उत्खनन के नाम पर हो रही नाइंसाफी ये तमाम मुद्दे आक्रामक अंदाज में आने चाहिए थे


जातिवाद का असर
पाटकर इस बात से भी असहज है कि इस चुनाव में गांव-गांव तक जातिवाद का मुद्दा घिर रहा है. इसका चुनावी फायदा देखा जा रहा है. लेकिन यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए बहुत ही घातक है. इसका जवाब गांव का गरीब आदिवासी समुदाय ही देगा.

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