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एक छोटे से गांव से लेकर माउंट एवरेस्ट तक....ऐसा है मेघा परमार का सफरनामा

Ranjana Dubey | News18 Madhya Pradesh
Updated: June 1, 2019, 7:55 AM IST
एक छोटे से गांव से लेकर माउंट एवरेस्ट तक....ऐसा है मेघा परमार का सफरनामा
मेघा परमार

माउंट एवरेस्ट की इस ऊंची चोटी पर पहुंचकर उन्होंने एक नया संकल्प लिया. ऑक्सीजन की उन्होंने कीमत समझी और ज़्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का संकल्प लिया

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एवरेस्ट पर विजय पाना आसान नहीं. लेकिन इस मुश्किल काम पर मध्य प्रदेश की एक नहीं बल्कि दो बेटियों ने विजय पा ली. तामिया की भावना डेहरिया के बाद 15 दिन के अंदर ही सीहोर की मेघा परमार ने भी माउंट एवरेस्ट पर फतह पा लिया. माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली वो मध्य प्रदेश की सबसे कम उम्र की महिला पर्वतारोही बन गयी हैं. माउंट एवरेस्ट की इस ऊंची चोटी पर पहुंचकर उन्होंने एक नया संकल्प लिया. ऑक्सीजन की उन्होंने कीमत समझी और ज़्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का संकल्प लिया.

ऐसे शुरू हुआ सफर-सीहोर के छोटे से गांव से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट तक हौसलों की उड़ान, अपने सपने को सच करने का साहस, खतरों से दो चार होने के बाद भी एवरेस्ट पर फतह और मौत को मात देकर एवरेस्ट से सकुशल लौटकर आने की कहानी है मेघा परमार के विजेता बनने का ये सफर.
मेघा सीहोर ज़िले के एक छोटे से गांव भोज नगर की रहने वाली हैं. एवरेस्ट पर विजय पाना उनका बचपन का सपना था. मेघा को ये कामयाबी उनके दूसरे प्रयास में मिली.2016 में वो पहली बार इस रोमांचक और ख़तरों से भरे खेल में आगे बढ़ी थीं लेकिन उस वक्त मौसम और हिम्मत ने साथ नहीं दिया. मेघा एवरेस्ट तो नहीं जीत पायीं, लेकिन हिम्मत भी नहीं हारीं. उन्होंने दोबारा और जी-जान लगाकर एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए तैयारी शुरू कर दी.
3 साल की सख़्त ट्रेनिंग- खेल विभाग के सहयोग से उन्होंने कड़ी ट्रेनिंग शुरू की. करीब तीन साल तक उन्होंने अपने आप को इसके लिए तैयार किया और फिर वो दिन आया जब मेघा ने दोबारा हिमालय की चढ़ाई शुरू की. हिमालय की दुनिया में सबसे ऊंची इस चोटी पर विजय पाने का उनका ये सफर 50 दिन में पूरा हुआ.

वो जोख़िम भरा सफर -अपने सफर का रोमांच और ख़तरे से भरा हर पल वो याद करती हैं. बेस कैंप से ही कठिनाई शुरू हो जाती है. दरअसल जोख़िम भरे इस सफर में इच्छाशक्ति की असली परीक्षा होती है. बर्फ से ढंकी पहाड़ी पर चढ़ना आसान नहीं होता. रास्ते में पड़ने वाली तमाम नदियां भी पार करना होती हैं. जैसे-जैसे उंचाई बढ़ती जाती है, सफर और मुश्किल भरा होता जाता है. ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ ऑक्सीजन लेवल कम होता जाता है. सिर दर्द, सन बर्न होने लगता है. बर्फ के कारण हांथ-पैर में गलन होने लगती है. सबसे कठिन वो पल होता है जब साथ चल रहे पर्वतारोही हिमालय की उन ऊंचाइयों पर दम तोड़ने लगते हैं और साथ चलने वाले शेरपा भी एक हद तक बेहद रूड हो जाते हैं. वो रास्ता दिखाने के सिवाय किसी और तरह की मदद नहीं करते.
हर पल जान का ख़तरा - सबसे पहले 9 घंटे का सफर तय करके कैंप वन जाना होता है. ये सफर पूरी रात चलकर पूरा होता है. यहीं से असली परीक्षा शुरू हो जाती है. कैंप-वन के बाद कैंप-02 फिर कैंप-03 और आखिर में सबमिट पुश. 8 घंटे का सबमिट फुश का सफर सबसे कठिन होता है.अगर इसे पार कर लिया तो मानो हिमालय फतह कर लिया. ज़्यादातर पर्वतारोही यहां आकर अपनी ज़िंदगी तक हार जाते हैं.
मेघा याद करती हैं वो दिन, जब कैंप 04 जाते समय तेज़ बर्फीले तूफान में वो घिर गयी थीं.
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बर्फीले तूफान में बीते वो पल - वो उनके सफर का 21वां दिन था. तूफान की वजह से उन्हें अपने सफर का एक दिन बढ़ाना पड़ा. रास्ते में उनका चश्मा गिर गया. उन्हें स्नो ब्लाइंडनेस हो गई. और उसी वक़्त मेघा के सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म हो गई. एक पल के लिए लगा कि सब कुछ खत्म.मौत को बिलकुल करीब से देखा. ऐसा लगा मानो यमराज ने हाथ पकड़ लिया. पीछे से आ रहे शेरपा से मदद मांगी. शेरपा ने चढ़ाई के दौरान रास्ते में मृत पड़े किसी पर्वतारोही का सिलेंडर उठाने के लिए कहा. सिलेंडर में बस इतनी ही ऑक्सीजन बची थी कि उससे जान बचायी जा सके. वही सिलेंडर मेरे लिए वरदान साबित हुआ.
एवरेस्ट पर लिया संकल्प- मेघा कहती हैं माउंट एवरेस्ट पर पहुंचकर मुझे ऑक्सीजन की कीमत समझ आई है. ऑक्सीजन नहीं होता तो क्या होता. उन्होंने अपनी ज़िंदगी पर आए ख़तरे से सबक लिया. उन्होंनें संकल्प लिया कि वो ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएंगी.और दूसरे लोगों को भी पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करेंगी.
माउंट एवरेस्ट फतह करने में उन्हें जो मुश्किलें आयीं, उससे भी उन्होंने कई बातें सीखीं. जो दिक्कतें उन्हें आयीं वो किसी और को ना हों इसलिए अब मेघा खेल विभाग के साथ सहयोग करके बच्चों को क्लाइमिंग और एवरेस्ट फतह करने के गुर सिखाएंगी.

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First published: June 1, 2019, 7:52 AM IST
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